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भावनाओं से खेलने पर बैन होना ही चाहिए...
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पब्लिक के बीच के इन पॉलिटिशियन से जरा बच के...।
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वो जिस आग को बुझाने के लिए रो रही थी, बाबा तो उसे ही हवा देने निकले हैं...
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इतना भी 'सोशल' न हो जाइए कि अपना कुछ रहे ही नहीं
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यहां तो नेता और बलात्कारी एक जैसे नजर आते हैं...।
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कुछ रुपयों के लिए मौत बांटना कहां तक जायज?
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आयोग बताए, ऐसे में कैसे मुमकिन है निष्पक्ष चुनाव?
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हमीं चुनते हैं नेता! हमें तो यकीन नहीं, क्या आपको है?
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लो आ गए राहुल भैया, नाचो ता थईया ता थईया ता थईया...
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'जैसा दाम, वैसा काम' शिक्षकों के साथ क्यों नहीं?
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शिक्षा की पाठशाला या योजनाओं का अखाड़ा ?
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