कुछ रुपयों के लिए मौत बांटना कहां तक जायज?


गोरखपुर में कच्ची पीकर कल तीन लोग मर गए और कई गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराए गए। भर्ती व्यक्तियों में से एक ने आज दम तोड़ दिया। पिछले साल भी कच्ची से यूपी में कई मौतें हुईं थीं...। 
        कल बिहार में नीतीश कुमार ने एक साहसी फैसला लिया और शराब बिक्री पर रोक लगाने की घोषणा की। कई लोगों ने इस फैसले को आर्थिक क्षति बताया लेकिन हमारा मानना है कि लोगों की जिंदगियों से सौदा कर उन्हीं में से कुछ को सुविधाएं मुहैया कराना ठीक बात नहीं! यदि शराब से रुपए आते भी हैं और उनसे किसी का भला भी होता है तो भी इसे बंद ही होना चाहिए क्योंकि इससे भला कुछ का ही होता है, क्षति व्यापक है। शराब से क्षति बस ये चंद मौतें ही नहीं है, इससे भी बड़ी क्षति इससे होने वाला सामाजिक पतन है। उसके पीछे होने वाले अपराध हैं। घरेलू अपराध की भी मुख्य वजह शराब ही है। अभी गोरखपुर की हालत यह है कि मॉडल शॉप के कारण रात में परिवार के साथ लोग निकलना नहीं चाहते। मॉडल शॉप पर दर्जनों की संख्या में बाइकें, लक्जरी गाड़ियां खड़ी रहती हैं और उनसे भी अधिक पीने वाले। वे भले ही रायफल लेकर न खड़े हों, लेकिन मॉडल शॉप के सामने से गुजरने वाला व्यक्ति डरकर ही जाता है।
       बिहार की हालत इससे भी बुरी है। जिस नीतीश ने कल शराब बंदी की घोषणा की, उसी नीतीश ने पिछले शासन में पंचायतवार शराब के लाइसेंस बांट दिए थे। गलियों तक में शराब की दुकानें खुल गईं। शराब सुलभ हुआ, तो कारोबारी भी बढ़े और शराबी भी। बिहार में कोई ऐसा चौराहा नहीं, जहां शराब की दुकान न हो। यूपी में कच्ची नाम से जानी जाने वाली शराब वहां चुआठ नाम से दियारा क्षेत्रों में कहर बरपा रही है। छपरा जिले में तो एक गांव ऐसा है, जहां आपको कोई वृद्ध नजर ही नहीं आएगा। ऐसा इसलिए कि वहां कच्ची से असमय ही लोग काल के गाल में समा जाते हैं। यदि इस तरह के गांव या टोले बिहार के सभी जिलों में एक भी हों तो स्थिति की भयावहता समझी जा सकती है। शराब के रुपयों से बहुतेरे लोगों को सुविधाएं देना तो ठीक है, लेकिन उनके लिए कुछ को मौत बांटना कहां तक जायज है? शराब बंदी के बाद नीतीश सरकार के सामने चुनौती है चुआठ धंधेबाज और उन पर तब तक रोक नहीं लगाई जा सकती जबतक कि बिहार के पुलिस महकमे में भ्रष्टाचार खत्म या कम न हो जाए।

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