चुनाव के पहले ही तूफान बीच लालटेन

कभी बिहार की सबसे बड़ी पार्टी रही राष्‍ट्रीय जनता दल की लालटेन अब तूफान बीच आ गयी है। इसकी लौ चुनाव के पहले ही बुझने के कगार पर है। नहीं, बिल्‍कुल नहीं, यह किसी चैनल या अखबार की सर्वे रिपोर्ट नहीं है। यह तो खुद चुनाव आयोग कह रहा है। दरअसल पिछले विधानसभा चुनाव में राजद के खराब प्रदर्शन को देखते हुए चुनाव आयोग उसके राष्‍ट्रीय पार्टी होने के तमगे को वापस लेने पर विचार कर रहा है, साथ ही वह इस फैसले पर भी विचार कर रहा है कि क्‍यों न पार्टी के राष्‍ट्रीय चिह़न लालटेन को वापस ले लिया जाए। यानी, 15 सालों तक आंधियों में भी पूरे शान से जलने वाली लालटेन की लौ अब बगैर हवा के टिमटिमाने लगी है। यह लालू प्रसाद के लिए चुनाव से पहले बहुत बड़ा झटका है। जनता की आंखों में धूल झोंक 15 वर्षों तक शासन करने वाले लालू को अब जनता के एक ही फैसले ने कहीं का नहीं छोड़ा है। बता दें कि 15 वर्षों तक बिहार में लगातार राजद की सरकार रही। इस दौरान बिहार में विकास की गति काफी धीमी रही, कुछ ऐसी जैसे विकास ही नहीं हुआ हो। सड़कें ऐसी हो गयी थी कि गाडि़यों में बैठने वाले पहाड़ पर चढ़ने-उतरने का मजा लेते थे, बिजली की स्थिति तो ऐसी थी कि यूपी-बिहार के पहचान की प्रतीक ही बिजली हो गयी थी। बिहार का पश्चिमी छोर उत्‍तर प्रदेश को छूता है। जब उत्‍तर प्रदेश से गाडि़या बिहार में प्रवेश करती थी और सड़के जर्जर दिखती थीं तो लोग समझ जाते थे कि अब बिहार की सीमा में प्रवेश कर चुके हैं। वैसे ही जब रात में गाडि़यां अंधेरे में प्रवेश करती तो अंदाजा हो जाता कि अब वे बिहार की सीमा में है। इतना ही नहीं 15 वर्षों के अपने शासन काल में लालू ने बिहार को इतना कुख्‍यात कर दिया था कि बिहार के लोग जहां कहीं भी मजदूरी के लिए जाते उन्‍हें खदेड़ दिया जाता। हालांकि अब भी यदा-कदा ऐसी घटनाएं हो जाती हैं। लेकिन उस समय कुछ और ही बात थी। विदेशी तो छोड़ दें, अपने ही देश के अन्‍य प्रदेशों के लोग बिहार आने से कतराते थे, डरते थे। जनता ने जैसे-तैसे जेपी के चेले के नाम पर लालू को 15 वर्षों तक बर्दाश्‍त किया लेकिन जब उन्‍होंने अपनी आदत नहीं छोड़ी तो जनता को फैसला लेना ही पड़ा। फिर क्‍या था, बिहार में लगातार डेढ़ दशक तक सत्‍तासीन रहे लालू प्रसाद की पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। बिहार में जेपी के ही दूसरे चेले नीतीश कुमार की सरकार बन गयी। जनता लालू से इतना खफा थी कि उसने उन्‍हें करारी शिकस्‍त दिलवायी। अपने वोटिंग हथियार से जनता ने लालू को शर्मनाक स्थिति मे ला खड़ा किया। अब जनता के उसी फैसले के परिणाम स्‍वरूप लालू की कुंडली में एक बार फिर दोष आ गया है। पिछले चुनाव में उनके पार्टी के शर्मनाक प्रदर्शन को लेकर चुनाव आयोग ने ऐसा विचार जताया है कि उनकी पार्टी से राष्‍ट्रीय पार्टी व चुनाव चिह़न लालटेन वापस लिया जा सकता है। यदि ऐसा हो गया तो पहले से ही बिहार की राजनीति में हाशिये पर चल रहे लालू का राजनीतिक कैरियर दांव पर लग सकता है। बिहार में लालटेन को इतने दिनों में लोग लालू का पर्याय समझने लगे हैं। ऐसे में यदि पार्टी का चुनाव चिह़न बदल गया तो गांवों में रहने वाले गंवार व अशिक्षित वोटरों का वोट स्‍वत: ही प्रभावित हो जाएगा। जबकि लालू की जीत में इन वोटरों का खास महत्‍व है। खैर, कुछ भी हो लेकिन लालू को उनके किए का फल लगातार मिल रहा है। जनता के विश्‍वास को तोड़ने का नतीजा उन्‍हें कुछ इस कदर चुकाना पड़ सकता है, शायद लालू ने भी नहीं सोचा होगा। लेकिन जब हाय लगती है तब फिर दुआएं भी बेअसर हो जाती हैं। लालू भी कुछ इसी स्थिति से गुजर रहे हैं।

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