कांग्रेस : परिवारवाद की जद में पार्टी तो हर मोर्चे पर विफल सरकार

कांग्रेस पार्टी न तो अपनी पार्टी की मर्यादा कायम रख पायी है और न ही पूर्व में जनता की जिस सेवा भावना के कारण वह जानी जाती रही, उसे ही कायम रख पायी है। पार्टी कार्यकर्ताओं में जहां राहुल गांधी के रोज-रोज की नौटंकी को लेकर रोष है वहीं शासन के दोषों को लेकर जनता में बेहद आक्रोश है। अब पार्टी की नीति परिवार का लड़का तय कर रहा है तो शासन का कार्य रिमोट के दम पर हो रहा है। पार्टी और सरकार दोनों ही मोर्चों पर विफल रही इस पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

पुरानी कहावत है इश्‍क और जंग में सबकुछ जायज है। आज की राजनीति ने उस समय के इस कहावत को प्रासंगिक बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। राजनीति में 80 साल का पार्टी का कोई कार्यकर्ता अपने पूरे जीवन-काल में केवल पार्टी-समारोहों में कुर्सियां रखने-उठाने का काम करता रह जाता है तो कोई विदेशों में पढ़ाई करने के बाद यहां आकर उन्‍हीं पुराने कार्यकर्ताओं पर अपना हुक्‍म सुनाता है। वैसे, हुक्‍म देने वाला यह व्‍यक्ति भी अपने को पार्टी का कार्यकर्ता ही बताता है। लेकिन, वह यह शायद ही बता सके कि उसने ऐसा क्‍या किया कि उसे अपने पिता के उम्र वाले कार्यकर्ताओं पर भी हुक्‍म सुनाने का अधिकार मिल गया। लेकिन, हम बता सकते हैं और आप जानते भी हैं। यह अधिकार उसे सिर्फ इसलिए प्राप्‍त है क्‍योंकि वह परिवार की पार्टी के मुखिया का बेटा है। क्‍या खूब समझे आप। हम कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी की ही बात कर रहे हैं। राहुल ने न तो भारत में अपनी शिक्षा पूरी की और न ही भारतीय परिवेश में पले-बढ़े। पार्टी से तो उनका दूर-दूर तक नाता नहीं था। बल्कि हाल तक तो वे राजनीति से तौबा-तौबा करते फिरते थे। लेकिन जब राजनीति में आये तो वाह, क्‍या राजनीति करते हैं। पार्टी के ही कार्यकर्ताओं पर उनकी राजनीति भारी पड़ रही है। जब पार्टी सुप्रीमो सोनिया गांधी के इस पुत्र ने इस क्षेत्र में कदम रखा तो पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं ने किसी राजकुमार की तरह उनका स्‍वागत किया, उन्‍हें बगैर किसी विरोध के राजनीति में जगह दी, हमेशा बेदाग बनाए रखा लेकिन अब जबकि राहुल बाबू को राजनीति समझ में आ गयी है तो उन्‍हीं कार्यकर्ताओं को वे अपनी जागीर समझने लगे हैं। वे खुद पदाधिकारी की भूमिका में हैं और कार्यकर्ताओं को कर्मचारी समझते हैं। ऐसा कर्मचारी जिसे वे भुगतान करते हैं, मनचाहा काम लेते हैं और जब चाहे नौकरी से निकाल सकते हैं। ऐसा हम नहीं कह रहे, यह सबकुछ तो आये दिन जारी हो रहे उनके बयानों से ही साफ हो रहा है। हालांकि राहुल की इस नौटंकी को लोग भी समझते हैं, कार्यकर्ता भी और विरोधी पार्टियां भी। कहीं ऐसा न हो कि जिस पार्टी ने उन्‍हें आश्रय दिया, चर्चित किया, उसी पार्टी के लिए वे नुकसानदायक साबित हो जायें। राहुल ने अब तक कोई ऐसा कार्य नहीं किया जिसकी चर्चा राष्‍ट्रीय स्‍तर पर आवश्‍यक हो, फिर भी वे पार्टी के सबसे चर्चित नेता हैं। उन्‍हें पार्टी में प्रवेश से पहले एक सवाल तक नहीं किया गया लेकिन अब वे पार्टी के पुराने और निष्‍ठावान कार्यकर्ताओं का बाकायदा इंटरव्यू ले रहे हैं। वे भी कार्यकर्ता नहीं रहे सीधे कार्यकर्ताओं के मालिक बन गए- महासचिव बन गये और जो सालों से पार्टी के प्रति समर्पित रहे हैं उन्‍हें वे अपनी वेस्‍टर्न स्‍टाइल का शिकार बना रहे हैं। कार्यकर्ताओं का इंटरव्यू ले उन्‍हें छंटनी की धमकी दे रहे है। हालांकि यह भी सत्‍य है कि राहुल कई मायनों में कांग्रेस के लिए शुभ हैं लेकिन उनके आचरण उन्‍हें पार्टी कार्यकर्ताओं में कुख्‍यात बनाने वाले हैं।
पिछले दिनों जब राहुल गांधी बिहार आए तो यहां के लोगों ने उन्‍हें पलकों पर बिठाया। लोगों ने अखबारों में देखा था राहुल को टोकरी उठाते, दलितों के घर उठते-बैठते। वे खुश थे कि उनके पास आज कोई नेता नहीं, बेटा सरीखा युवक आया है। लेकिन उनकी यह उम्‍मीद काफूर हो गई जब राहुल बिहार की गरीब जनता से नहीं मिलकर, लड़कियों से मिलने पटना वोमेन्‍स कॉलेज जा पहुंचे। घंटों तक लड़कियों से हंस-हंस के बात की, हाथ मिलाया और वाहवाही भी लूटे। लेकिन जितना समय उन्‍होंने ईसाईयों के इस कॉलेज में बिताया था उतने समय में वे गांवों के किसी भूमिहीन-भवनहीन विद्यालय में आसमान के नीचे पढ़ रहे बच्‍चों से भी मिल सकते थे। लेकिन उन्‍हें तो सिर्फ ख्‍याति पानी थी। वह तब भी मिल गयी जब वे गर्ल्‍स कॉलेज में गए। हालांकि दरभंगा जाकर उन्‍होंने अपनी राजनीति खूब चमकाई। लेकिन यहां के समारोह में जब युवकों ने उनसे यह सवाल दागा कि क्‍या आप इंटरव्यू देकर कांग्रेस में आये थे जो दूसरों का इंटरव्यू ले रहे हैं, तो उनकी बोलती बंद हो गयी थी और बगैर जवाब दिये ही वे वहां से चल दिए थे। राहुल के इस आगमन से लोगों को शायद दिली खुशी नहीं हुई और इसलिए ही बिहार में उनकी पार्टी को पाप लग गया। वे उधर पटना से दिल्‍ली गए और इधर बिहार कांग्रेस में घमासान छिड गया। पार्टी अध्‍यक्ष अनिल शर्मा और बिहार मामलों के प्रभारी जगदीश टाइटलर आपस में ही भिड गए। विवाद इतना बढ़ा कि आलाकमान को दोनों को हटाना पड़ा। इसके बाद राहुल गांधी बिहार में नजर नहीं आये।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ परिवारवाद के कारण ही कांग्रेस की फजीहत हो रही है। सरकार चलाने की उसकी नीति भी उसे बदनाम कर रही है। यह बयान हर माह में किसी न किसी विरोधी पार्टी के नेता द्वारा आ ही जाता है कि मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की कठपुतली हैं। पार्टी अध्‍यक्ष होना और बात है लेकिन सरकार के प्रधानमंत्री पर अपनी नीतियां थोपना, अपने आदेश लादना कहीं न कहीं सत्‍ता की बागडोर को अपने हाथ में लेने वाली स्थिति की ओर इंगित करता है। एक बात और है जो कांग्रसियों द्वारा अपनी सोनिया मैडम के बारे में कही जाती है। वह यह कि सोनिया गांधी ने सत्‍ता का त्‍याग किया है, वे चाहतीं तो खुद प्रधानमंत्री बन सकती थीं लेकिन उन्‍होंने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। लेकिन, ऐसा करके सोनिया गांधी ने कोई त्‍याग किया हो, यह नजर नहीं आता। यदि उन्‍होंने सत्‍ता का त्‍याग कर दिया होता तो फिर वे मनमोहन को रोबोट बनाकर रिमोट की तरह उन्‍हें नहीं चलाती। वे सत्‍ता से अलग रहकर पार्टी के लिए काम कर सकती थीं। लेकिन वे ऐसा नहीं कर रही हैं। प्रधानमंत्री के हर शासनादेश में या तो उनका समर्थन होता है या फिर यह आदेश ही उन्‍हीं का होता है। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद काफी सोची-समझी नीति के तहत मनमोहन को दिया। यदि वे खुद प्रधानमंत्री बनी रहतीं तो उन्‍हें सरकारी कार्यों से ही फुरसत नहीं मिलती और वे पार्टी के लिए समय नहीं दे पाती। फिर पार्टी में अंतर्कलह, विवाद उत्‍पन्‍न होते। यही नहीं सरकार की गलत नीतियों के छींटे प्रत्‍यक्ष रूप से सोनिया गांधी पर पडते और इसका सीधा असर पार्टी पर होता। इससे भी वे बच गईं। एक बात और, सोनिया यदि खुद प्रधानमंत्री बनतीं तो फिर विपक्षी उन्‍हें चैन से जीने नहीं देते। बार-बार विदेशी मूल का मुद़दा उठाया जाता। एक बात और, यदि उन्‍होंने खुद सत्‍ता का प्रत्‍यक्ष सुख लिया होता तो फिर आम लोगों के दिलों मे जो उन्‍होंने त्‍याग की प्रतिमूर्ति बने रहने की छवि बनाई है, वह कभी नहीं बनती। खैर, जिस कारण भी उन्‍होंने मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाया हो लेकिन यह तो तय है कि उनके प्रधानमंत्री, सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है। जिन मुद़दों को लेकर यह सरकार सत्‍ता में आयी, जनता से जिन वादों के बदले में वोट बटोरे, उन्‍हें इस सरकार ने अब तक पूरा नहीं किया है। हम अब से 20 वर्ष पहले चलते हैं। डॉ. मनमोहन सिंह ने 1991 में वित्तमंत्री के रूप में भारत की आर्थिक नीति पूरी तरह से बदल दी। आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का रास्ता सा़फ कर उन्होंने यह भरोसा दिलाया था कि 2010 तक देश में बेरोज़गारी खत्म हो जाएगी, सारी सड़कें पक्की हो जाएंगी, बिजली की समस्या खत्म हो जाएगी, किसान खुशहाल हो जाएंगे, मज़दूरों की सारी ज़रूरतें पूरी हो जाएंगी और देश विकसित देशों की कतार में खड़ा हो जाएगा। बीस साल बीत गए। मनमोहन सिंह वित्तमंत्री से प्रधानमंत्री बन गए। लेकिन ग़रीब पहले ज़्यादा ग़रीब और अमीर पहले से कई गुना ज़्यादा अमीर बन गए। गांव और शहर में इतना फासला पैदा हो गया है कि नेताओं के झूठे वादों से भी भरोसा उठ गया। विकास की रोशनी चंद महानगरों में सिमट कर रह गई और बाकी देश अंधेरे के दलदल में फंसकर सिसक रहा है। मनमोहन सिंह ने पिछले एक साल में उन्हीं नीतियों को अपनाया, जिस नीति की उन्होंने 1991 में शुरुआत की थी। मनमोहन सिंह ने पूरे साल भर देश की जनता को नव उदारवाद की आग में झोंक दिया। नव उदारवाद का असर हमारे देश पर ऐसा हुआ है कि 80 फीसदी लोग विकास की धारा से अलग हो चुके हैं। सरकार की नीतियों का फायदा इन 80 फीसदी तक नहीं पहुंच पा रहा है। पिछले साल जब मनमोहन सिंह की सरकार बनी तो दुनिया मंदी की चपेट में थी। लेकिन यूपीए की सरकार पिछले एक साल में आम आदमी से ज़्यादा खास लोगों के साथ नज़र आई। सरकार ने अमीरों के कर में ज़्यादा छूट देने की रणनीति पर काम किया। 2009-2010 के दौरान 502299 करोड़ रुपये की छूट दी गई। इसमें से 79554 करोड़ रुपये की छूट कॉरपोरेट सेक्टर को दी गई और 40929 करोड़ रुपये की छूट इनकम टैक्स देने वालों को मिली। इन आंकड़ों से सा़फ है कि सरकार ने मंदी के नाम पर देश के कॉरपोरेट सेक्टर और अमीरों को भारी फायदा पहुंचाया। पिछले एक साल में भारत ने महंगाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। आम आदमी ने महंगाई की ऐसी मार कभी नहीं झेली थी। खाने-पीने के सामानों के दाम आसमान छूने लगे। 2009 में महंगाई की दर 20 फीसदी तक पहुंच गई, जो अभी भी लगभग 17 फीसदी है। इस रिकॉर्ड तोड़ महंगाई की वजह यह है कि सरकार ने कृषि को अनदेखा कर दिया। पिछले साल भीषण सूखे की वजह से किसानों ने दोहरी मार झेली। बाकी कसर सरकार ने कृषि क्षेत्र का सरकारी खर्च कम करके पूरा कर दिया। किसानों की मदद करने के बजाय सरकार ने फूड सब्सिडी में 400 करोड़ और खाद सब्सिडी में 3000 करोड़ रुपये की कमी कर दी। यह कैसी विचारधारा है कि अमीरों और कॉरपोरेट सेक्टर की मदद के लिए सरकार अपनी तिज़ोरी खोल देती है, लेकिन ग़रीब किसानों की मदद के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है। इस नीति का क्या मतलब निकाला जाए। क्या यह मान लिया जाए कि सरकार पूरी तरह उद्योगपतियों, कॉरपोरेट सेक्टर और अमीरों के हाथों की कठपुतली बन गई है।
पिछले एक साल में जितने घोटाले सामने आए, वह यूपीए की पिछली सरकार के पांच सालों में नहीं आए। आईपीएल की काली दुनिया का जब भंडाफोड़ हुआ तो उसके छींटों ने सरकार के कई मंत्रियों को दागदार कर दिया। यह बात आम हो गई है कि क्रिकेट की आड़ में उद्योगपतियों, नेताओं, फिल्म स्टारों, खिलाड़ियों, अधिकारियों और अंडरवर्ल्ड का एक खतरनाक नेटवर्क देश में फल-फूल रहा है। आईपीएल मनी लाउंडरिंग, अंडरहैंड डीलिंग, भाई-भतीजावाद, हवाला और काले धन का केंद्र बन चुका है। यूपीए के महत्वपूर्ण मंत्री शशि थरूर का इस्ती़फा लेकर सरकार ने इस मामले की लीपापोती करने की कोशिश तो ज़रूर की, लेकिन कई और मंत्री एवं नेता शक़ के घेरे में हैं। यह कैसी सरकार है, जिसकी नाक के नीचे उसके मंत्री और नेता पिछले तीन सालों से इतना बड़ा घोटाला करते रहे, लेकिन उसे इसका पता तक नहीं चला। कहने को तो जांच हो रही है, लेकिन जनता को पूरी तरह यह विश्वास हो चुका है कि विपक्ष के साथ मिलकर सरकार आईपीएल घोटाले के सभी गुनहगारों को बचा ले जाएगी।
जब सरकार बनी थी, तब मनमोहन सिंह ने सौ दिनों के एजेंडे की घोषणा की थी. संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण के ज़रिए सरकार ने यह वादा किया था कि सौ दिनों के अंदर महंगाई पर लगाम लगेगी, किसानों को राहत मिलेगी, मज़दूरों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत होगी और भ्रष्टाचार खत्म होगा। राष्ट्रपति के अभिभाषण में महिला आरक्षण विधेयक पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया गया था। इसके साथ-साथ सरकार ने घोषणा की थी कि अगले 5 सालों में झुग्गी-झोपड़ी को ख़त्म कर दिया जाएगा और ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वालों को हर महीने 3 रुपये किलो की दर से 25 किलो अनाज दिया जाएगा। यूपीए सरकार ने रोज़ाना 20 किलोमीटर और हर साल 700 किलोमीटर सड़क बनाने का भी लक्ष्य रखा था। फिलहाल देश में हर रोज़ दो किलोमीटर से भी कम सड़क बन पा रही है। बिजली के क्षेत्र में 5653 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी फिलहाल अधूरा ही है। सौ दिन का वादा था, पूरा साल बीत गया।
आतंकवाद मुद़दे पर तो जो किरकिरी कांग्रेस की इस बार हुई है वह कभी किसी पार्टी की नहीं हुई। खुद कांग्रेस की भी इससे पहले ऐसी किरकिरी नहीं हुई। वोट बैंक की राजनीति को ले अफजल की फांसी रूकने का मामला हो या फिर मुम्‍बई में आतंकी हमला या फिर आतंकवाद से जुड़ा कोई भी मुद़दा हो, सरकार अपनी इज्‍जत बचाने में विफल रही है।
कांग्रेस पार्टी न तो अपनी पार्टी की मर्यादा कायम रख पायी है और न ही पूर्व में जनता की जिस सेवा भावना के कारण वह जानी जाती रही, उसे ही कायम रख पायी है। पार्टी कार्यकर्ताओं में जहां राहुल गांधी के रोज-रोज की नौटंकी को लेकर रोष है वहीं शासन के दोषों को लेकर जनता में बेहद आक्रोश है। कांग्रेस सरकार ने जनता से जो वादे किए थे वे पूरे नहीं हो सके हैं। अपने पांच सालों के शासन काल में कांग्रेस ने जनता को हजारों सपने दिखाए लेकिन कितने सपनों को पूरा किया यह जनता भी जानती है और खुद सरकार भी। कांग्रेस को लोगों ने उसकी पुरानी नीतियों, पुरानी कार्यशैली के कारण वोट दिया था लेकिन न तो पार्टी की नीति ही पुरानी रही और न ही कांग्रेस सरकार के वे काम ही रहे जो पहले थे। अब पार्टी की नीति परिवार का लड़का तय कर रहा है तो शासन का कार्य रिमोट के दम पर हो रहा है। पार्टी में कार्यकर्ताओं का सम्‍मान घटा है तो सरकार में जनता से किए वादे झूठे साबित हो रहे हैं। पार्टी और सरकार दोनों ही मोर्चों पर विफल रही इस पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। सरकार को सशक्‍त बनाने के लिए जहां सत्‍ता से पार्टी का अनावश्‍यक दबाव खत्‍म करना होगा वहीं पार्टी को सशक्‍त करने के लिए परिवारवाद की संकीर्ण भावना से उपर सोचना आवश्‍यक है। राहुल को भी वेस्‍टर्न सोच को छोड़कर भारतीय संस्‍कृति की पुरानी मान्‍यताओं, सभ्‍यताओं का आदर करना चाहिए और इसी के अनुसार आचरण भी करना चाहिए। सही मायनों में तभी वे यहां के लोगों के दिलों के राजकुमार-युवराज बन सकते हैं, वरना हमेशा पार्टी में ही युवराज बने रह जाएंगे।
(आंकड़ें : साभार चौथी दुनिया )

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