वे कत्ल भी करें तो चर्चा नहीं होती...
पुरानी शायरी है। टूटी-फूटी लाइनें ही स्मृति में हैं। हम सांस भी लेते हैं तो खबर बन जाती है, वे कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती...। यह शायरी कब, किसने और क्यों कही, इस बारे में हमें कुछ भी नहीं मालूम बल्कि जो लाईन हमने लिखी है वह भी पूरी तरह ठीक है कि नहीं- नहीं कह सकते, बावजूद इसके हम इसका उपयोग करने जा रहे हैं। यह शायरी हम चुनाव आयोग के लिए चुने हैं। चुनाव आयोग की गलती के कारण एक आम आदमी विधायक बनने-बनते रह गया। एक ऐसा व्यक्ति अब कम से कम इस चुनाव में विधायक नहीं बन सकेगा जिसमें एक विधायक बनने के सारे गुण हैं। वह सिर्फ इसलिए चुनाव के लिए अपना नामांकन नहीं कर सका क्योंकि मतदाता सूची में उसका नाम ही गलत प्रकाशित कर दिया गया है।
आपने आम लोगों के नाम गलत हो जाने से वोट देने में हुई परेशानी तो कई बार सुनी होगी, पढ़ा भी होगा पर ऐसा शायद ही सुना हो कि कोई व्यक्ति नामांकन करने गया हो और निर्वाचन कार्यालय ने अपनी गलती की ही सजा उसे दे डाली हो। सीधी सी बात है सूची ठीक किया अधिकारियों ने, नाम चढ़ाया अधिकारियों ने और फिर नामांकन भी ले रहे हैं अधिकारी। तो इसमें उस व्यक्ति की क्या गलती जिसे नामांकन से वंचित कर दिया गया? यह तो वही बात हुई उल्टे चोर कोतवाल को डांटे।
आज हमारे कार्यालय में डा. वर्मा अपनी व्यथा लेकर पहुंचे थे। उनके कागजातों, बचनों और साक्ष्यों से जो कहानी बनी वह आपको हम सुनाते हैं। डा. विनोद कुमार वर्मा लोकतांत्रिक सर्वजन समाज पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। जाहिर सी बात है कि अपने पार्टी में तो उनका कद बड़ा है ही, नेतागिरी भी अभी-अभी शुरू नहीं की है। क्षेत्र का विधायक बनने और जनता का प्रतिनिधित्व करने की चाह में उन्होंने भी चुनाव लड़ने का फैसला लिया। हालांकि उनके शब्दों में जनता के दबाव और अपनों के कहने पर वे चुनाव लड़ने को तैयार हुए। डा. वर्मा ने सारी तैयारी कर ली। जमकर पोस्टर, बैनर लगवाए। क्षेत्र में दौरा किया। आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद पोस्टर, बैनर हटवाए और जनसंपर्क में लगातार जुटे रहे। वे तो वे, उनके कई कमासुत सगे-संबंधी भी छुट़टी लेकर उन्हें जिताने के लिए मैंदान में आ डटे। सभी अपने धन और तन से उनके साथ्ा लग गए। (मन से भी लगे होंगे, पर यह हम नहीं कह सकते क्योंकि मन की बात तो वे ही जानते होंगे, हमने धन और तन से लगे हुए उन्हें देखा है, इसलिए कह रहे हैं।)
ज्योतिष, पंडितों से वह तिथि भी निकलवा ली, जिस दिन नामांकन करने पर विजयश्री मिलने की अधिक उम्मीद रहेगी। निर्धारित तिथि- 7 अक्टूबर को डा. विनोद कुमार वर्मा पार्टी का सिम्बल लेकर स्थानीय निर्वाचन कार्यालय में नामांकन करने पहुंचे। वे अपने साथ सोनपुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र की निर्वाचक नामावली 2008 भाग संख्या 130 और निर्वाचक नामावली 2010 भाग संख्या 43 की मतदाता सूची भी अपने साथ ले गए। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा जारी पहचान पत्र संख्या डीक्यूवी 5249263 भी साथ ले जाना नहीं भूले। विभिन्न जरूरी दस्तावेजों के साथ जब डा. वर्मा नामांकन के लिए पहुंचे तो आरओ ने गौर से कागजों का निरीक्षण किया। आरओ ने पाया कि 08 की मतदाता सूची में उनका नाम डा. विनोद कुमार वर्मा है जबकि वर्ष 10 की मतदाता सूची में उनका नाम डा. बिलेन्द्र कुमार वर्मा हो गया है। बस फिर क्या था, आरओ ने नामांकन करने से डा. वर्मा को मना कर दिया। (दरअसल, निर्वाचन आयोग ने बिहार में इस वर्ष फोटोयुक्त मतदाता सूची जारी की है। यह मतदाता सूची पिछली सूची से इस बात में भिन्न है कि इसमें मतदाताओं के नाम के साथ उनकी तस्वीर भी लगी है। आयोग का तर्क है कि इससे जाली वोटरों को पकड़ने में आसानी होगी। लेकिन, इस नयी फोटो युक्त मतदाता सूची बनाने के चक्कर में अधिकारियों-कर्मचारियों के कितने के नाम बदल दिए, कितनों के पिता बदल गए हैं। किसी की पत्नी किसी और के साथ दिखा दी गयी है तो किसी के पति का नाम पड़ोस वाली औरत के साथ जुटा है। यही नहीं फोटो किसी और का नाम किसी और का है। कही-कही तो हद ही कर दी गयी है। नाम है सुनीता कुमारी और फोटो राजीव रंजन का है। गलतियों की इसी लंबी फेहरिस्त में डा. वर्मा का भी नाम शामिल है। जिसमें विनोद को बलिन्द्र बना दिया गया है।) डा. वर्मा को तो मानो काटो तो खून नहीं, बेचारे इतने दिनों से जिस चुनाव की खातिर लगे रहे, एक पल में लड़ने से ही वंचित कर दिए गए।
आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन न हो, इसलिए रात-दिन सावधानी बरतते हुए जनसंपर्क किए, फिर भी...? पर डा. वर्मा को क्या मालूम कि वे अपनी गलतियां रोक सकते हैं, लेकिन वर्षों से चली आ रही सरकारी प्रणाली अपने ही ढर्रे पर चलती है। क्या नजीर पेश हुआ है- जिन्होंने गलती की, वही सजा सुना रहे हैं? आयोग की गड़बड़ी और खुद वही कह रहा है कि आप नामांकन नहीं कर सकते? जबकि उसी आयोग के द्वारा जारी वर्ष 08 की मतदाता सूची में उनका नाम सही है। पर, क्या हो सकता है? लोकतंत्र है यहां तो? जैसा कि नि:सहाय आम जनता करती है, डा. वर्मा ने भी किया। तुरंत उसी क्षण शिकायत लेकर, अपने दस्तावेजों के साथ सारण के जिलाधिकारी सह जिला निर्वाचन पदाधिकारी कुलदीप नारायण के पास पहुंचे। तुरंत नाम सुधार का आवेदन भी भरा और मतदाता सूची में नाम सुधारने का पुरजोर अनुरोध किया। पर, क्या आप मान सकते हैं कि हमारे देश की इतनी बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई बगैर किसी पावर के किसी अधिकारी से कुछ अनुरोध करे और वह तुरंत कार्रवाई कर दे? जवाब आपका हां हो या ना, पर सच्चाई तो यही है कि बगैर पावर या मनी के यहां एक बार में कुछ भी नहीं होता। जिला निर्वाचन पदाधिकारी जैसे बड़े अधिकारी ने भी डा. वर्मा की पीड़ा नहीं सुनी। पुन: 9 अक्टूबर को डा. वर्मा ने जिलाधिकारी को स्मारित किया। पर, जिस व्यवस्था में कनीय अधिकारी बगैर किसी पैरवी के आम जनता की बात अनसुना करते हों, यहां तो ब्यूरोक्रेट़स की बात थी? लिहाजा, मतदाता सूची न सुधरनी थी, नहीं सुधरी। 11 अक्टूबर को नामांकन की अंतिम तिथि के साथ ही डा. विनोद की अंतिम आस भी जाती रही।
हमें मालूम है कि निर्वाचन आयोग को इस समय बेशुमार पावर मिला है। इसलिए, उस पर अंगुली उठाने की अपनी धृष्टता के लिए हम माफी मांग रहे हैं। यह माफी इसलिए नहीं मांग रहे क्योंकि हम उस पर अंगुली उठाकर कोई गुनाह कर दिए है, माफी तो सिर्फ इसलिए मांग रहे हैं कि आयोगजी इस समय पावर में हैं। और पावर को तो हमारा लोकतंत्र सदा से सलाम करता आया है। आखिर, डा. वर्मा इस जैसे ही किसी पावर का शिकार तो हुए हैं? हम आयोग के अधिकारियों से बिना टीका-टिप्पणी के एक ही सवाल पूछ रहे हैं, यदि जवाब देना मुनासिब समझें तो हम उनके जवाब के इंतजार में हैं- देश का एक नागरिक विधायक बनते-बनते रह गया, इसमें गलती किसकी है? क्या यह एक नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है? जो लोग इसके लिए दोषी हैं, उन पर कार्रवाई कौन करेगा?... (कार्रवाई तो उसी पर हो गई जो निर्दोष था, कार्रवाई भी उन्हीं लोगों ने कर दी जिन्होंने गलतियां की थीं। बहुत खूब, हमारा लोकतंत्र वाकई विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां सबके लिए बहुत गुंजाइश है, पर आम जनता के लिए कोई गुंजाइश शेष नहीं रहती...।)
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