शर्म करो! लौट आए हम बिना वोट दिए
सारण जिल के मांझी विधानसभा क्षेत्र के दाउदपुर प्रखंड स्थित कुमना गांव के करीब 50-60 युवा-बुजुर्ग आज वोट से वंचित कर दिए गए। बूथ पर गए पर वोट नहीं दे पाए। ये वैसे लोग हैं जो रोज कमाते और रोज खाते हैं। फिर भी लोकतंत्र के इस महापर्व में भाग लेने के लिए अपना कामकाज छोड़कर बूथ संख्या 127 पर पहुंचे थे। मगर, उन्हें यह कहने से वोट से रोक दिया गया कि उनके नाम मतदाता सूची में नहीं है। ऐसे लोग बिना कोई खेद प्रकट किए चुपचाप बूथ से लौट फिर अपने काम में मशगूल नजर आए। लोकतंत्र के इन नागरिकों को किसी से कोई शिकायत नहीं पर, हमें हैं उन लोगों के प्रति जो इसके लिए जिम्मेवार हैं। नंदकिशोर बिंद, जुगेश्वर बिंद, लालमती, चम्पा आदि बताती हैं कि वे कुमना की स्थायी निवासी हैं और यहां दशकों से रह रही हैं। चम्पा तो काफी बुजुर्ग नजर आयीं, पूछने पर उम्र बताया- 60 वर्ष। आश्चर्य- कि 60 वर्ष की होने के बावजूद वह अब तक एक बार भी वोट नहीं कर सकी थी। कारण पूछने पर इन लोगों ने बताया कि हर साल वोटर लिस्ट में नाम चढ़ाने की बात की जाती है पर कभी चढ़ाया नहीं जाता। इस बार भी चुनाव के ऐन पूर्व अधिकारी लोग आए थे तो उन्हें लगा कि अब उनका नाम वोटरलिस्ट में शामिल हो गया होगा। सुबह से ही काफी खुश थे सभी। पहली बार वोट देने का मौका मिलेगा। इनमें से कई ऐसे भी थे जो पिछले या इसी वर्ष 18 के हुए थे- उनमें कुछ अधिक ही उत्साह था। लेकिन इन लोगों का सारा उत्साह बूथ पर जाने के बाद काफूर हो गया। करीब 50-60 की संख्या में देश के नागरिक बूथ से लौट आए, इसके लिए जिम्मेदार कौन है? एक तरफ घटती वोटिंग पर पदाधिकारियों से लेकर नेता तक इस समय चिंता में डूबे हैं, लेकिन इन लोगों की खबर कौन लेगा जो वोट तो देने गए, वोट देने की योग्यता भी रखते हैं पर सिर्फ इसलिए वोट नहीं दे पाए क्योंकि उनके नाम मतदाता सूची में नहीं। मतदाता सूची में उनके नाम नहीं जुड़ने के लिए आखिर कौन जिम्मेवार है? चुनाव आयोग, सरकार या फिर ये नेता? चाहे जो कोई भी हो, लेकिन बूथ से लौटे ये लोग और इनके चेहरे की मायूसी बताती है कि आज भी बिहार में व्यवस्था की क्या तस्वीर है। विकास का ढिंढोरा पीटने वाली नीतीश सरकार यदि इस बात को लेकर गुमान में है कि 15 वर्षों के राजद के शासनकाल से अधिक विकास उसने अपने 5 साल के कार्यकाल में कर दिया तो फिर उसे भी शर्म आनी चाहिए। सड़के बन जाएं, अस्पताल बन जाएं, विद्यालय भी खोल दिये जाएं मगर वह अधिकार ही ना मिले जो लोकतंत्र की मील है तो फिर कैसा विकास? ऐसे लोग जो देश के नागरिक होते हुए भी मतदान से बहिष्कृत कर दिए जाए, उस सूबे का विकास...? खैर, ऐसे लोग सिर्फ यही नहीं थे, कई जगहों से ऐसी शिकायतें आयी हैं कि वोटरलिस्ट में नाम नहीं होने के कारण वे लोग वोट से वंचित कर दिए गए। हम तो बस इतना पूछना चाहते हैं आयोग से कि इसके लिए किसकी जवाबदेही बनती है और फिर क्या चुनाव बाद उसे दंडित किया जाएगा? इन लोगों को तो अब यह अधिकार 5 सालों बाद ही मिल सकेगा लेकिन वे लोग जो इनके 5 साल बर्बाद कर गए, उनके खिलाफ क्या कोई कार्रवाई होगी? एक बात और, आज जो लोग मतदान से वंचित हुए हैं, वे आज भी उसी तरह की जिंदगी बसर कर रहे हैं, जैसा कि वर्षों पूर्व करते थे। ऐसे लोगों की बस्तियों में न तो चापाकल है, न ही कोई इंदिरा आवास से निर्मित मकान नजर आता है। शौचालय की व्यवस्था के लिए आस-पास की सड़कें हैं? क्यों नहीं हुआ इनका विकास, इसका कुछ हद तक कारण आज हमें मिल चुका है। आज के इस दौर में जब वोट बैंक के लिए ही नेता सबकुछ करते हों, यहां तक कि विकास भी उस दौर में इनका विकास हो भी भला क्यों? ये बेचारे नेताजी को दे भी क्या सकते हैं? स्थानीय नेताजी को यदि चापाकल भी लगवाना होगा तो वे उस इलाके में लगवाएंगे जहां से उन्हें वोट की उम्मीद हो, यहां किसलिए लगाएंगे? खैर इस समय हम सरकार, नेता या किसी पर भी दोषारोपण के लिए नहीं लिख रहे हैं, बस इसलिए कि हमें दु:ख पहुंचा है एक नागरिक के नाते कि हमारे देश के कुछ नागरिक प्रशासनिक गलतियों के चलते महापर्व के हिस्सेदार नहीं बन सके।
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