कहां गुम हो गयी पी की आवाज?
जैसा कि आपको बता चुके हैं अभी हम सारण में हैं। बिहार का यह जिला बहुत प्रमुख है। यहां के एक विधानसभा क्षेत्र सोनपुर से प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी खड़ी हैं तो एक अन्य विधानसभा क्षेत्र परसा से चन्द्रिका राय हैं। चन्द्रिका राय पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा राय के पुत्र हैं। दो विधानसभा चुनावों को छोड़कर परसा विस क्षेत्र में 1955 के बाद सिर्फ इन्हीं के परिवार के लोग विधायक बनते आए हैं, इसलिए इनकी राजनीतिक और सामाजिक रसूख का अंदाजा लगाया जा सकता है। अन्य कई दिग्गज भी सारण के विस क्षेत्रों में अपना भाग्य आजमाने के लिए हाजिर हुए हैं। पर, सबकुछ होने के बावजूद यहां जो उल्लास दिखना चाहिए, वहीं कही खो गया। सुबह हुई और लोगों ने जब मतदान करना शुरू किया तो लगा जैसे यह चुनाव अभूतपूर्व रहेगा लेकिन आशाओं पर अब तक पानी फिर चुका है। जिन मतदान केन्द्रों पर वोट के लिए लंबी लाइनें लगती थीं, आज मीडिया के छायाकार कतार की फोटो के लिए बूथों पर भटकते रहे पर कहीं कतार नजर नहीं आ रही थी। एकाध बूथों पर अवश्य मतदाताओं की संख्या प्रशंसनीय रही लेकिन ज्यादातर बूथ मतदाताओं की उदासी के गवाह बने। कुछ ही देर बाद यानी 5 बजे तक वोटिंग समाप्त हो जाएगा लेकिन अब तक जो वोटों का प्रतिशत देखने को मिला है, वह काफी निराशाजनक है। मीडिया के लोगों से लेकर आम लोग तक चौक-चौराहों पर इस बात की चिंता में मशगूल हैं कि आखिर क्यों मतदाता बूथों तक जाने से कतरा रहे हैं? लोकतंत्र के इस महापर्व में मुख्य भूमिका निभाने वाली जनता की इस उदासीनता ने इस महापर्व को फीका-सा कर दिया। प्रत्याशी भी पेशोपेश में पड़ गए हैं। हर बूथ पर उम्मीद से कम वोटिंग हुयी है। लोग कारणों के विमर्श में लगे हैं, पर स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि इसके पीछे कारण क्या है? जहां तक पिछले चुनावों तक दहशत के कारण बूथों तक नहीं पहुंचने की बात थी, उसे इस चुनाव में नहीं माना जा सकता। क्योंकि दहशत जैसी कोई बात नहीं इस चुनाव में। हर जगह सुरक्षा की चाक-चौबंद व्यवस्था है और लोग पूरी तरह खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इसके साथ ही अशिक्षा को भी इसके लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। क्योंकि पिछले चुनाव की अपेक्षा इस चुनाव में, यानी पिछले पांच वर्षों में शिक्षा व्यवस्था कहीं अधिक सुदृढ हुई है। जो छात्राएं कभी आठवीं से अधिक नहीं पढ़ पाती थीं, उन्होंने हाईस्कूल, इंटरमीडिएट कर अब बीए में भी नामांकन लिया है। पोशाक योजना, साइकिल योजना और विभिन्न तरह की छात्रवृत्तियों के कारण पढ़ाई काफी आसान हुयी है, और सस्ती भी। इसके बावजूद, लोग बूथों तक नहीं पहुंचे, आखिर क्यों? आंकड़े कह रहे हैं कि बिहार से पलायन भी बहुत हद तक कम हुआ है, यानी यहां के लोग यही हैं, कहीं गए नहीं, फिर वोट की संख्या तो बढ़नी चाहिए थी, कम क्यों? सारण के ही कुछ क्षेत्रों में वोट की प्रतिशत कम होने की बात स्वीकारी जा सकती हैं, जैसे- मकेर में चुनाव के दो ही दिन पूर्व नक्सलियों ने वहां के प्रखंड प्रमुख का घर डायनामाइट लगाकर उड़ा दिया। यहां की पुलिस थाने में जमी रही और जाने की जहमत तक नहीं उठायी। बेखौफ सशस्त्र नक्सली सैकड़ों की संख्या में शाम में ही घंटों तांडव मचाते रहे और लाल सलाम के नारे के साथ चले गए लेकिन पुलिस अपनी बिल में छुपी रही। ऐसे में यहां के लोगों का दहशत में होना स्वाभाविक है। जहां विस्फोट हो और पुलिस जानते हुए भी ना पहुंचे तो वहां के लोग तो असुरक्षित महसूस करेंगे ही। हो सकता है कि वहां के मतदाताओं ने ऐसा सोच लिया हो कि यदि चुनाव के दिन ही नक्सली कोई वारदात कर दें तो फिर आज उनकी सुरक्षा करने में नाकाम रही पुलिस, उस दिन क्या सुरक्षा करेगी? नक्सलियों ने यहां लोगों को चुनाव बहिष्कार की धमकी भी दी थी। इसलिए यहां के वोट प्रतिशत में आयी कमी को नक्सलियों का खौफ करार दिया जा सकता है। लेकिन यदि वोटिंग में आयी कमी का कारण नक्सली खौफ है तब भी इसके लिए प्रशासन ही जिम्मेदार होगा। क्योंकि उसी की कार्यशैली के कारण लोगों में खौफ पैदा हुआ। खैर, यहां के लिए हम नक्सली कारणों को वोटिंग में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराकर मुक्ति पा सकते हैं, लेकिन अन्य विधानसभा क्षेत्रों में? वहां क्यों नहीं पहुंचे मतदाता बूथों तक? वहां तो ऐसी कोई वारदात नहीं हुई? निश्चित ही पूरे जिले में मतदाताओं की निराशा का कारण कुछ और है नक्सली खौफ नहीं..। इसलिए हमें अन्य बातों की ओर भी गौर करना होगा। जिले के मुख्यालय शहर छपरा में अभी-अभी आधे घंटे पहले नगरपालिका चौक पर खड़े हुए। वहां चाय पीते समय लोगों की बातें सुनीं। हर एक की चिंता इसी बात की थी कि वोट कम क्यों? हमें जानकर सुखद अनुभूति हुई कि लोग वोटिंग के कम प्रतिशत पर अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं। खास बात यह कि इसमें चाय बेचने वाले से लेकर चाय पीने वाले तक सभी शामिल थे। कुछ चाय पीने वाले रिक्शा चालक आदि जैसे अशिक्षित और ग्रामीण परिवेश के लोग भी थे, लेकिन इनकी भी चिंता अन्य लोगों की चिंताओं से इतर नहीं थी। इसे देखकर तो यही लगा कि जनता वोट के लिए जागरूक है। फिर भी वोट में कमी क्यों आ गयी? एक रिक्शा वाला कह रहा था- वोट में कमी क्यों नहीं आएगी। मेरे बगल के डाक्टर साहब आज सोये रहे, लेकिन वोट देने नहीं गए। तभी दूसरे ने- सही कहते हो, मेरे यहां भी यही स्थिति है। बगल में एक प्रोफेसर साहब रहते हैं। उनके परिवार से कोई भी सदस्य वोट डालने नहीं गया। यहां, मेरे साथ दैनिक जागरण के पत्रकार कुमार धीरज, प्रभात खबर के ब्यूरो चीफ ठाकुर संग्राम सिंह, द ट्रिब्यून के राकेश कुमार सिंह, कौमी तंजीम के नदीम अहमद आदि भी चाय की चुस्किया ले रहे थे। हमारी भी चिंता यही थी कि आज अखबार में खबर क्या होगी। कहीं कुछ नहीं, मतदाताओं के उत्साह वाली कोई तस्वीर नहीं...। हम सबने उस रिक्शे वाले व उसके साथ आए एक अन्य की वह बातें सुनीं। तब हमने भी ध्यान देना शुरू किया। सबने पाया कि सबसे अधिक उदासीन सबसे अधिक पढ़े-लिखे लोग हैं। ये वैसे लोग हैं जो अपने आसपास रहने वाले लोगों को अपने समाज का हिस्सा नहीं मानते। इनकी दोस्ती इंटरनेट पर इंग्लैंड, अमेरिका के लोगों से हैं। या फिर मुम्बई और दिल्ली में बैठे अपने दोस्तों से चैट करने वाले हैं। फिर चर्चा हुई कि आखिर ऐसे लोग मतदान करने क्यूं नहीं जाते, क्यों नहीं गए..? प्रभात खबर के ठाकुर संग्राम सिंह ने कुछ यूं अपनी राय रखी- दरअसल ऐसे लोगों को यह स्वीकार नहीं कि वे लल्लू के पीछे खड़े हों। यहां उन्होंने लल्लू के रूप में एक काल्पनिक नाम का सहारा लिया जो छोटे तबके के लोगों के लिए था। वे आगे जारी रहे.. मान लीजिए कोई डाक्टर साहब वोट डालने गए और वहां उनसे पहले कतार में लल्लू खड़ा है, तो यही वह जगह है जहां लल्लू उनसे पहले वोट करेगा और डाक्टर साहब को उसके पीछे लाइन में खड़ा होना ही पड़ेगा। यह वह लल्लू है जो घंटों डाक्टर साहब के क्लिनिक में लाइन में खड़े होकर अपना इलाज कराता है, वही लल्लू आज एक कतार में डाक. साहब के आगे खड़ा है। भला डाक्टर साहब यह कैसे स्वीकार कर लेंगे? यहां उपस्थित अधिकतर पत्रकार व अन्य लोग भी श्री सिंह की बातों से सहमत नजर आए। क्या हम अब भी ऐसी मानसिकता से घिरे हैं कि वोट देने के समय भी उच-नीच से उबर नहीं पाते? और सिर्फ इसलिए कि हमें लाइन में खड़ा होना पड़ेगा या फिर हमें अपने से निम्न लोगों के साथ खड़ा होना होगा, क्या हम अपने सबसे बड़े अधिकार से चूक जाएंगे? वह भी तब जबकि हम इस समाज के सबसे प्रबुद़ध्ा लोगों में गिने जाते हैं? हम वोट करने नहीं जाएंगे और जब सरकारें बन जाएंगी तो हम उसे भला-बुरा कहेंगे? यानी, हम जो भी करेंगे अपनी बातों में, अपनी लेखनी में, धरातल पर कुछ नहीं? कोई दायित्व नहीं बनता हमारा? क्या हमारा दायित्व नहीं बनता कि यदि कम पढ़े-लिखे लोग किसी गलत प्रतिनिधि का चुनाव कर रहे हैं तो उन्हें समझायें? यदि नहीं भी समझाते हैं तो कम से कम हम सही प्रतिनिधि को अपना वोट दें ताकि गलत प्रतिनिधि को आगे चलकर समाज के प्रतिनिधित्व का मौका न मिल जाए..? नहीं- हम तो बुदिधमान वर्ग के लोग हैं। हम कहीं नहीं जाते। जो करते हैं बस बैठे-बैठे। यदि बिहार में इस चुनाव में घटे वोट प्रतिशत का यही कारण है तो फिर शर्म आनी चाहिए ऐसे पढ़े-लिखे लोगों को। बहरहाल, लेकिन इतना अवश्य कहना चाहेंगे कि यदि चुनाव परिणाम आए और फिर कोई गलत, दबंग या अनपढ़ प्रतिनिधि चुन लिया जाये तो ऐसे लोग बैठे-बैठे बयानबाजी करने के हकदार नहीं हैं..। वे यदि हकदार हैं तो सिर्फ दण्ड के, लोकतंत्र की व्यवस्था को बिगड़ाने के अपराधी हैं ऐसे लोग। हां, लोकतंत्र में मिली स्वतंत्रता में इनकी भी स्वतंत्रता है इसलिए इसके लिए इन्हें कोई दण्ड नहीं दिया जा सकता, लेकिन हकदार तो वे इसी के हैं...।

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