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दिल्ली के इस दिल को प्रणाम!

इतना भी न डराओ कि कहना पड़े- "प्रभु, इन नेताओं से देश बचाओ"

हम हैरान रह गए यह देखकर कि छपरा तो कुछ बदला ही नहीं था...

हम भी भक्त है, हाँ, तुम बड़े वाले हो!

अपनी हद न भूले आदमी, खुदा न बने आदमी...!

कुछ रुपयों के लिए मौत बांटना कहां तक जायज?

'जैसा दाम, वैसा काम' शिक्षकों के साथ क्यों नहीं?

हैरान न हों, यह रोग पुराना है

दिल्ली चुनाव परिणाम के बहाने

शिक्षा की पाठशाला या योजनाओं का अखाड़ा ?