दिल्ली के इस दिल को प्रणाम!

दिल्ली छठ नहीं मनाती लेकिन दिल्ली में बसा बिहार इतने धूम-धाम से यह पर्व मनाता है कि इसका पता नहीं चलने देता...। हमने तो पटना, छपरा, गोपालगंज का छठ देखा है। गंगा, सरयू के छठ घाटों का उल्लास देखा है। उस हिसाब से तो यहां कुछ भी नहीं लेकिन फिर भी दिल्ली अपने हिसाब से कोई कोर-कसर भी नहीं छोड़ रखी है। दिल्ली छठ नहीं मनाती, लेकिन दिल्ली अपना दिल खोल देती है ताकि पूर्वांचल वालों को अपना पर्व मनाने में किसी तरह की दिक्कत न हो। इस पर्व पर घर नहीं जा पाने का मलाल तो फिर भी सबको रहता है लेकिन इसमें दिल्ली का नहीं, हमारे उस दिल का दोष है जो पर्व-त्योहारों पर अपने घर से दूर नहीं रहना चाहता है...।
    
     दीपावली के बाद से ही यहां सबकुछ छठ के हिसाब से चल रहा है। प्रवासियों के निमंत्रण पर कल मालिनी अवस्थी आईं थीं। छठ गीतों से धूम मचाकर गईं। नोएडा स्टेडियम में भीड़ कितनी हुई, इसका अंदाजा इसी से लगाइए कि रोड पर ट्रैफिक डायवर्ट करना पड़ा...। अर्घ्य के लिए सैकड़ों जगह पोखरे तैयार हैं। साफ-सफाई का कार्य चल रहा है। अखबारों में छठ की खबरें छप रही हैं। बिहारी भाई जहां हैं छठ गीत गुनगुना रहे हैं। कहीं-कहीं ऑटो में भी छठ गीत सुनने को मिल जा रहे हैं...। माहौल में कहीं कोई कमी नहीं, बस अपनों की कमी है...।

     अच्छा लग रहा है कि लोक आस्था के इस महापर्व से काफी हद तक अनजान होने के बाद भी दिल्ली ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखी है व्रतियों की सेवा में और इस पर्व के सम्मान में। दिल्ली में अधिकतर लोगों को तो यह भी नहीं पता कि छठ कब है क्योंकि वे होली, दीपावली की तरह इसे एक निश्चित तिथि में सुनना चाह रहे हैं। चार दिन में चारों दिन छठ के हैं, यह समझना अभी कई के लिए बाकी ही है। बहुतों को नहाय-खाय, खरना, पहला, दूसरा अर्घ्य सब मालूम है तो कई इससे इस हद तक अनजान हैं कि छठ मनाया क्यों जाता है और इसमें किसकी आराधना होती है, यह तक पता नहीं। लेकिन, जो कुछ भी है, जो है, जैसा भी है, यह सबको पता है कि यह पर्व बिहारियन की आत्मा में बसता है। प्रवासी संगठनों के नेतृत्व में इस पर्व पर दिल्ली जितना कर सकती है, वह कर रही है। वाकई, दिल्ली को अपने पर्व मनाना आता है तो दूसरों के पर्व-त्योहारों का सम्मान करना भी आता है।

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