प्लीज, छोड़ दीजिए आदमी को शैतान बनाने वाली यह 'दवा'

मेरठ में वह हुआ, जिसे सुनकर यदि आप होश में हों तो होश उड़ जाएंगे, यदि नशे में होंगे तो नशा फट जाएगा। 100 साल की वृद्ध महिला बीमार खाट पर पड़ी थीं। इतनी उम्र तक कोई जी जाए यही बहुत है। बीमारी न भी हो तो खाट पकड़ ही लेनी है। पड़ोस के 23 साल के युवक ने पी रखी थी। जब नशा चढ़ता है तो सबसे पहले आदमी विवेक खो देता है। चूंकि विवेक ही आदमी को आदमी बनाता है और जब वही खत्म हो जाता है तो आदमी को तो जानवर ही होना है। वह युवक भी जानवर बन गया। असहाय महिला जो न चल सकती थी, न भाग सकती थी, न विरोध कर सकती थी, उनके साथ नशे में धुत युवक ने दुष्कर्म किया। उनकी चीख सुन घर वाले दौड़े तो नशेड़ी युवक वहां से भाग गया। घर वाले वृद्ध महिला को हॉस्पिटल ले गए लेकिन उन्होंने दम तोड़ दिया। अब जीकर भी क्या क़रतीं भला इस तरह के समाज में? ईश्वर ने बुला लिया उन्हें। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में डॉक्टर ने रेप की पुष्टि कर दी है। केस दर्ज है, पुलिस आरोपी को ढूंढ रही है...। लेकिन, क्या यह सिर्फ कानून का मामला है? इस समाज में 100 साल की महिला से रेप! बचा कौन फिर? क्या हमें अपनी मासूम बेटियों के साथ घर की बूढ़ी औरतों को भी बंद कमरे में रखना होगा? क्योंकि हर तरफ भेड़िए हैं? कभी सोचिए, कैसे, कहाँ पहुंच गए हम?

     हम जब भी कहते हैं कि मांस-मदिरा एक व्यसन है, लत है और यह आदमी के लिए नहीं है तो लोग नाराज हो जाते हैं। मेरी उम्र में बड़े मुझे आधुनिकता का पाठ पढ़ाने लग जाते हैं जबकि हम इसी आधुनिक युग के हैं, और वे बीते युग के। हमारे आस-पास के विद्वान और युगपुरुष शराब को खान-पान की स्वतंत्रता और स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग बताते हैं। इनमें वैसे पत्रकार भी हैं जिनकी मानें तो जो पीता नहीं वह कभी बड़ा पत्रकार हो ही नहीं सकता...। खैर, हमें कब दिक्कत है कि कोई क्या खाता-पीता है, यह वाकई उसकी स्वतंत्रता है लेकिन उसके पीने के बाद क्या बात उसी तक सिमट कर रह जाती है? स्वतंत्रता के अहसास में आदमी कब नशे का गुलाम बन जाता है, आदमी से शैतान बन जाता है, और कब यह शैतान आदमखोर हो जाता है, इसका अहसास तो उसे भी नहीं होता। पीने से पहले जब वह आदमी होता है, जब विवेकशील होता है तो खुद को पीने से नहीं रोक पाता तो  जब वह पीकर विवेकहीन हो जाता है, आदमी से शैतान बन जाता है तब आप उससे आदमीयत की उम्मीद भी कैसे कर सकते हैं? अब फिर यह न कहिएगा कि दवा की तरह लें तो दिक्कत नहीं क्योंकि शुरुआत सभी की दो पैग से ही होती है...। नशे के बचाव में आपके सारे तर्क पता है हमें इसलिए अब कुछ नहीं कहना! बस इतना कहना है कि यदि आप होश में रहते हुए खुद को पीने से नहीं रोक सकते तो नशे में होने के बाद आप कुछ भी कर सकते हैं इसलिए आग्रह है कि न पीएं...। हो सके तो छोड़ दीजिए। अब भी देर नहीं हुई। अब भी सम्भव है, करके देखिए...। वह सुख मिलेगा जो इस पीने में नहीं है। खिल उठे पत्नी का चेहरा, खिलखिला उठें बेटियां, गर्व करे बेटा, फख्र से सीना चौड़ा हो जाए मां-बाप का... सहमा-सहमा न रहे समाज... प्लीज छोड़ दीजिए शराब, बन जाइए मिशाल...। प्लीज...! इतना तो कर दीजिए खुद-परिवार-देश-समाज के लिए... देना किसी को कुछ नहीं, बस छोड़ देना है...।

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