कांग्रेस न आ जाए, यह डर काफी है भाजपा की जीत के लिए...

जब भी बात केंद्र सरकार की आती है, जेहन में कांग्रेस-भाजपा ही आती है; चाहें बाकी पार्टियां और उसके नेता जितनी उछल-कूद लें, धरातल पर हकीकत यही है। 2019 में भी प्रधानमंत्री पद के लिए जब कहीं नुक्कड़ से लेकर एसी वाले रूम तक में चर्चा होती है तो एक तरफ नरेंद्र मोदी तो दूसरी तरफ राहुल गांधी ही दिखते हैं। यानी कुल मिलाकर भाजपा को हराने का मतलब कांग्रेस को विजयी बनाना है, अथवा मोदी को हराने का मतलब राहुल को प्रधानमंत्री बनाना है...।
    
     बात को यहीं छोड़कर 2014 में चलते हैं। नारा विकास का ही दिया गया था लेकिन असली मुद्दा यह कभी था ही नहीं। मैंने जमीन पर रहकर सबकुछ देखा है इसलिए हम न तो उनलोगों के दावे को मानते हैं जो यह कहते हैं कि हम विकास के मुद्दे पर सत्ता में आए हैं, और ना ही उन लोगों की मानते हैं जो कहते हैं कि वोट विकास के नाम पर दिया था। चूंकि मुद्दा विकास था ही नहीं इसलिए इस चुनाव में इसका कोई हिसाब नहीं होगा। प्रमुख मुद्दे थे पाकिस्तान, हिंदुत्व, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कांग्रेस से मुक्ति के। इसमें यदि विकास था भी तो सबसे पीछे कहीं खड़ा था सहयोगी मुद्दे के तौर पर, ना कि मुख्य मुद्दे के रूप में।
    
     अब इन मुद्दों पर बात करते हैं कि सरकार कहाँ तक कामयाब-नाकामयाब रही। पहले पाकिस्तान से शुरू करते हैं...। सर्जिकल स्ट्राइक से बहुत हद तक मोदी ने पाक को उसकी औकात बता दी। न भी बताई हो तो इसे भुनाने में काफी हद तक कामयाब रहे। यूएनओ में खुलकर पाकिस्तान के खिलाफ आवाज उठाई गई। चीन आंखें तरेरता रहा लेकिन डोकलाम से उसे हटना ही पड़ा। भारतीय सेना ने आतंकियों को म्यांमार में घुसकर मारा...। इतने से हम ना भी संतुष्ट हों तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि 2014 में जिन्होंने वोट किया था, उनमें से अधिकतर देश के स्वाभिमान, स्वायत्तता मुद्दे पर मोदी कृत्य से संतुष्ट हैं।
    
     अब हिंदुत्व पर आते हैं। राम मंदिर का वादा था, भाजपा ने पूरा नहीं किया लेकिन भाजपा के पढ़े-लिखे समर्थकों को इस मुद्दे पर संतोष करने के लिए इतना जानना ही काफी है कि यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में है। वह कोर्ट जो सुप्रीम है, जिसके खिलाफ जाने के लिए कोई और कोर्ट भी नहीं है। यानी सरकार का कोई दोष नहीं यदि मंदिर नहीं बना...। जो कम पढ़े-लिखे हैं, उनके लिए योगी का मुख्यमंत्री बनना, अयोध्या में पहली बार भव्य तरीके से दीपावली मनाया जाना, अमरनाथ यात्रा के लिए पहली बार अनुदान मिलना (अन्य सरकारों में सिर्फ हजयात्रियों को अनुदान हासिल था), वर्षों बाद बिना भेदभाव दशहरा-मुहर्रम एक साथ मनना (हाल के दिनों में मुहर्रम के जुलूस के लिए मूर्ति विसर्जन जुलूस रोकना प्रशासन के लिए सबसे आसान कदम हो गया था), ममता बनर्जी सरकार की तुष्टिकरण पर हाईकोर्ट से रोक लगना (श्रेय मोदी को ही जा रहा), झटके वाले तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला (यह भी भुनाने में भाजपा कामयाब)...कोई कम उपलब्धि नहीं है।

     अब बारी भ्रष्टाचार मुद्दे की। नोटबन्दी का जनता के हित में कोई सार्थक परिणाम अभी तक भले ही नहीं आया लेकिन इसने तमाम राजनीतिक पार्टियों की कमर तोड़ दी। कई पार्टियां जिनके नेता गाहे-बगाहे प्रधानमंत्री पद के दावेदारी की बात करते थे, मुख्यमंत्री की दावेदारी लायक नहीं बचे। यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा की इतनी आसान और शानदार जीत के पीछे एक बड़ी वजह नोटबन्दी भी थी। इन पार्टियों को बर्बाद होता देख जनता ने यह सोचकर संतोष किया कि हमें भले कुछ न मिला, इनकी तो 'हराम की कमाई' चली गई...। बाकी इसमें कोई दोराय नहीं कि नोटबन्दी के बाद कैशलेस बढ़ा है और इसके जरिए टैक्स बढ़ा है। इससे जनता को अभी कोई फायदा नहीं लेकिन आंकड़े खुशफहमी में डालने के लिए कम भी नहीं हैं। जीएसटी भी नाकामयाब है अभी तक लेकिन अब लोगों को यह पता चल चुका है कि जैसे भी हो, व्यवस्था का डिजिटल हो जाना उसका पारदर्शी हो जाना है। इसमें अच्छी बात यह है कि सरकार हठ नहीं कर रही। जहां बदलाव की जरूरत है, बहुत हद तक कर रही है। वैसे यह कोई बड़ा मुद्दा इसलिए भी नहीं कि हर आदमी पहले से ही अधिकतर वस्तुओं पर टैक्स देता आ रहा है, थोड़ा कम या ज्यादा इसलिए मोदी का आकर्षण भंग करने के लिए यह काफी नहीं है। नोटबन्दी या जीएसटी की वजह से जीडीपी का घटना-बढ़ना सिर्फ कुछ युवाओं तक ही रह जाएगा। इसके नुकसान की भरपाई आधार और डिजिटलीकरण से हो जाती है। सबकुछ आधार से लिंक होने से जनता की परेशानी तो बढ़ी लेकिन जालसाजी खत्म हुई है। तमाम फर्जी राशन कार्ड पर रोक लगी, तमाम फर्जी छात्रवृत्ति पर रोक लगी, तमाम योजनाओं में फर्जीवाड़ा रुका है। वहीं डिजिटलीकरण से सबकुछ आसान हो गया है। इस बीच कोई बड़ा घोटाला भी सामने नहीं आया है जबकि पिछली सरकार में इसकी झड़ी लग गई थी...।

     अब आखिर में विकास की बात, जो मुद्दों में सबसे पीछे था। युवाओं को रोजगार देने के मामले में यह सरकार बुरी तरह नाकाम है। ज्यादातर भर्तियों पर उल्टे जांच बिठा दी गई है। लेकिन इसे छोड़ दें तो अन्य क्षेत्रों में काफी विकास कार्य भी हुए हैं।

    ...अब वापस चलते हैं जहां बात छोड़ी थी। एक तरफ भाजपा है, दूसरी तरफ कांग्रेस। एक तरफ मोदी हैं, दूसरी तरफ राहुल। एक तरफ कांग्रेस का हालिया 10 साल का कार्यकाल है, दूसरी तरफ भाजपा का सिर्फ तीन साल का। एक तरफ भाजपा युवाओं को रोजगार देने में फिसड्डी रही है लेकिन इसके कार्यकाल में एक भी चर्चित घोटाला सामने नहीं आया, तो वहीं कांग्रेस के कार्यकाल का कहना ही क्या? तब कांग्रेस ने कितने रोजगार दिए, किसी को याद नहीं। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर भाजपा ने रोहिंग्या को आने नहीं दिया, जबकि  कांग्रेस उसकी हिमायती बनी हुई है। भाजपा ने जम्मू के अलगाववादी नेताओं की बोलती बंद कर दी, जबकि कांग्रेस आवभगत करती रही। भाजपा कहती है कि गुलाम कश्मीर भी हमारा है, अभी-अभी कांग्रेस के चिदंबरम जी ने कहा कि कश्मीर को भारत से 'आजाद' कर देना चाहिए। जेएनयू मामले में कन्हैया भले ही अभी दोषी साबित न हुए हों लेकिन राहुल गांधी ने उनका समर्थन तब किया जब यह बात सिद्ध नहीं थी, बल्कि यह बात ज्यादा पुष्ट थी कि कन्हैया ने देश विरोधी नारे लगाए। यानी राहुल ने जानते हुए भी उनका समर्थन किया; यानी वे ऐसा कर सकते हैं...।

     अब निष्कर्ष। भाजपा सत्ता में जिन मुद्दों पर आई उसमें वह ज्यादा नहीं तो कुछ हद तक सफल है लेकिन कांग्रेस से जिसके चलते सत्ता छीन ली गई वह उन आदतों से जरा सी भी बाज नहीं आई। आप इस देश का मिजाज अभी भी नहीं जान पाए। देश की सारी परेशानियां एक तरफ और राष्ट्रहित एक तरफ। यह नेताओं के खून में हो, न हो, यहां की जनता के खून में है। बात जब जमीन की आती है तो कुछ नजर नहीं आता। कहावत भी है कि जर, जोरू, जमीन जान पर खेलकर भी बचाना चाहिए। यहाँ जमीन माँ नहीं भी समझी जाए तो प्रतिष्ठा का सवाल तो होती ही है। एक-एक इंच जमीन के लिए अपनों का खून इसलिए नहीं बहता क्योंकि वह महंगी है, इसलिए बहता है क्योंकि वह हक है, प्रतिष्ठा है। जहां यह भाव हो, वहां के लोगों से जब कहां जाए कि देश से कश्मीर आजाद कर देना चाहिए तो सोचिए इसका क्या प्रभाव होगा? वह कश्मीर जिसके लिए हर कुछ गांव-शहर से एक-दो जानें गई हैं। इसलिए भाजपा की सारी नाकामियां एक तरफ और कांग्रेस की कश्मीर की 'आजादी' का समर्थन किया जाना एक तरफ। इतना ही काफी है कांग्रेस का सत्ता में न आने के लिए...। आप मानें या न मानें। मसला यह नहीं कि लोग भाजपा से संतुष्ट कितने है या परेशान कितने हैं, मसला तो यह है कि लोग कांग्रेस न आ जाए, इससे डरे हुए कितने हैं। कांग्रेस के यह बोल, उसके हाव-भाव इतने डरावने हैं कि मानो वह सत्ता में आई तो कश्मीर पाक का हिस्सा हो सकता है। पहले से ही जनसंख्या विस्फोट की स्थिति व तमाम समस्यायों से जूझ रहे भारत में रोहिंग्या नागरिक का दर्जा पा सकते हैं और आशंका यह भी है कि फिर से कहीं वह सरकारी खजाना खाली न हो जाए जो जनता के टैक्स से बमुश्किल भरा है...। भाजपा इसलिए आनी है क्योंकि कांग्रेस आ गई तो क्या होगा? यह डर है जो खुद कांग्रेस पैदा कर रही है...। अब भाजपा-कांग्रेस से इतर एक प्रधानमंत्री के रूप में यदि मोदी और राहुल को ही देखें तो क्या नजर आता है? एक तरफ 18-20 घंटे काम करने वाला नेता, दूसरी तरफ सदन में भी बमुश्किल उपस्थित रहने वाला सांसद, एक तरफ ऐसा नेता जो अपने सारे फैसले खुद लेने की क्षमता रखता है, दूसरी तरफ मां के सहारे चलने वाला एक बेटा, एक तरफ सबकुछ मोदी के इशारे पर होता है, दूसरी तरह राहुल को इशारा करने वाले बहुत हैं...। यानी राहुल प्रधानमंत्री बनें भी तो वही देश चलाएंगे, कहना मुश्किल है। कुल मिलाकर कहीं फिर कांग्रेस न आ जाए, यह डर काफी है भाजपा के सत्ता में बने रहने के लिए...। इसलिए गुजरात में भी भाजपा जीत रही है, 2019 में केंद्र में भी। हम न चाहें तो भी, आप न मानें तो भी...। 

(मेरा यह उन लोगों से बातचीत पर आधारित है जिन्होंने भाजपा को वोट दिया था। चूंकि उन्हीं के वोट से भाजपा सत्ता में आई है, इसलिए वह सत्तामुक्त भी तभी होगी जब यह वोट बिखरे लेकिन यह वोट जमा हुआ है, थोड़ी शिकायतों के बाद भी अडिग है। अतः अगली बार- फिर भाजपा सरकार।)

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