वह मां मर गई, क्योंकि उसके बेटे की आत्मा मर चुकी थी...


दो बेटों और चार बेटियों की माँ अचानक घर में पराई हो गईं। घर में उनकी हालत बेटी से न देखी गई तो वह उन्हें अपने घर ले गई लेकिन वह उन्हें अपने पति के घर में कब तक रखती? अब भी वैसे हालात नहीं बने, वह समाज नहीं बना जिसमें बेटियों को अपने घर में माँ को रखने की इजाजत हो। हां, वह समाज हमने जरूर बना लिया है जिसमें बेटे अपनी माँ को घर से निकाल सकें...।
कुछ दिनों तक बेटी ने मां की सेवा की। जब लगा कि अब वह ठीक हैं तो उन्हें अपने पिता के घर छोड़ दिया और वापस चली गई। उधर बेटी चली गई, इधर माँ को घर में जगह नहीं मिली। वह भटकती रहीं। इधर-उधर से मांगकर खाती रहीं। छोटी बहू पहले ही अलग होकर दूसरे घर में रहती थी। उसने एक दिन माँ को भटकते देखा तो उनकी यह हालत देख सत्र रह गई। माँ को अपने साथ ले गई। उनकी खराब हालत के बारे में अपनी ननद को बताया।
बेटी तो बेटी है ना! माँ के बारे में सुना तो अपने घर से भागी आई। यहां माँ की हालत देखी तो उसे बहुत दुख हुआ। अब वह जान गई थी कि भाई अब वह भाई न रहा इसलिए आज वह माँ को लेकर थाने पहुंची। माँ की तरफ से तहरीर लिख रही थी ताकि पुलिस उन्हें उनके ही घर में रहने की व्यवस्था कराए। लेकिन, तहरीर पूरी होती, उससे पहले ही माँ की साँसों ने उनका साथ छोड़ दिया...।
यह गोरखपुर के गगहा की घटना है। इलाका गंवई है इसलिए यह कहकर आप नहीं निकल सकते कि शहरों में तो ऐसा होता ही है...। यह ऐसी बीमारी है जिसने शहर-गांव में कोई फर्क नहीं रखा है। आदमी जिंदा है लेकिन इंसानियत मरती जा रही है...।

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