प्रधानमंत्री जी, जनता पर टैक्स आखिरी विकल्प है, पहले अन्य उपायों पर विचार कीजिए...
हमारे पास हर तरह की आर्थिक समस्या, मंदी का एक ही इलाज है, जो अचूक है- "जहां टैक्स नहीं, वहां लगा दो; जहां टैक्स है, वहां बढ़ा दो।" पहले जनता की सम्पूर्ण आय पर एक मुश्त कर (आयकर) लो, फिर बचे रुपए जब वह अपनी जरूरत पर खर्च करे तो उस पर थोड़ा-थोड़ा करके बार-बार टैक्स लो (जीएसटी), जब तक उसके रुपए खत्म न हो जाएं...।
हम देश के अनन्य सेवक हैं, जनता के नहीं। देश रहेगा तो जनता तो दूसरे देश से भी आ जाएगी। कुछ नहीं तो रोहिंग्या को बसा लेंगे लेकिन देश ना रहा तो जनता किस काम की? इसलिए हमें हर पल चिंता है देश की, देश के खजाने की। चूंकि मेरे पास हर मर्ज की एक ही दवा है इसलिए हमने सरकारी खज़ाना भरने के लिए भी अपनी दवा नहीं बदली है। जनता की जेब खाली हो तो उसका सिरदर्द कि कहाँ से भरे, हमें तो देश के खाली खजाने की चिंता है और जनता की जेब काटकर उसे भरने से आसान रास्ता भला मेरे लिए और क्या हो सकता है? अब आसान राह छोड़कर, कठिन राह चुनना कहां की बुद्धिमानी है?
हम तो कहते हैं, वह सरकारें मूर्ख थीं जो मंडी खत्म करने या खाली खजाना भरने के लिए अन्य उपायों पर विचार करती थीं। इसलिए वे सफल भी नहीं हो पाईं। सच में मूर्ख थीं, सामने जनता की भरी पड़ी थी और वह काट नहीं पाती थीं। अरे भाई, उद्योग लगाने में काफी समय लग जाएगा, यह काम सरकार का थोड़ी है, यह तो उद्योगपतियों के हैं। वस्तु उत्पादन और फिर उसकी बिक्री करके आय प्राप्त करना भी कितना कठिन है, यह कोई बनिया ही करे। खेती की पैदावार बढ़ाना और उसे बेचकर आय प्राप्त करने वाला काम तो किसान ही करें। अच्छी सुविधा देकर उसका मूल्य लेना तो सभी जानते हैं, हम तो दूसरे की गाढ़ी कमाई से अपना खज़ाना भर लेने को ही सबसे आसान तरीका समझते हैं और वह भी इस हुनर के साथ कि सामने वाला अपनी जेब कटने पर फख्र महसूस करे।
सच है, नाम हमने अपना प्रधानसेवक ही रखा है लेकिन तब भी हैं तो हम राजा ही ना! राजा का काम है टैक्स लेना और जनता का धर्म है उसे चुकाना। हमें क्या चिंता कि हमने आय के कोई और स्रोत विकसित न किए तो सिर्फ़ जनता के टैक्स के भरोसे देश कब तक चलेगा; हमें वैसे भी कौन सा युगों तक जीना या सरकार चलानी है। जब तक जी रहे हैं तब तक राज करेंगे फिर आगे की चिंता जो आएं वो करें। हमसे पीछे की सरकार जनता का जेब छोड़ गई लेकिन सरकारी खजाना खाली कर गई क्योंकि वह देशभक्त नहीं, जनता भक्त थी। हम देशभक्त हैं, इसलिए जनता की जेब खाली कर रहे हैं लेकिन सरकारी खजाना भर रहे हैं। आने वाले समय में जनता की जेब न रहेगी, लेकिन आने वाली सरकार के लिए सरकारी खजाना तो रहेगा ही...! अरे भाई, इतना भरोसा किया है आप सबने हम पर, अब मेरी और बाकी सरकार में कुछ तो अंतर रहेगा ही...।
प्रधानमंत्रीजी, अब तक देश और जनता एक ही रही है लेकिन अभी के कुछ फैसलों को देखकर ऐसा लग रहा है मानो देश अलग है और जनता अलग। देशहित अलग है और जनता का हित अलग। समझ नहीं आता कि टैक्स के माध्यम से कौन सा देशहित हो रहा है क्योंकि इसमें जनता का हित तो नहीं है। वह लगातार टैक्स के बोझ से दबी जा रही है। सरकारी खजाना भरने के लिए जनता पर टैक्स आखिरी विकल्प होना चाहिए, न कि यही सबकुछ होना चाहिए। प्रधानमंत्रीजी से आग्रह है कि वे अन्य विकल्पों पर विचार करें और जनता को टैक्स से कुछ राहत दें।

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