यह पर्व-त्योहार न रहे तो वह भावना न रहेगी जिसे गरीबों की चिंता होती है...
हर पर्व-त्योहार, उत्सव को दिखावा समझने वालों को अब छठ भी दिखावा लग रहा है। इस पर्व पर होने वाला खर्च, अपव्यय; परेशानियां नाहक लग रही हैं। यह लग रहा है इतना गरीबों, असहायों के लिए कर देते तो कितना अच्छा होता...।
निश्चित ही बहुत अच्छा होता लेकिन क्या कभी तब का सोचा है जब यह सब न होगा...? जब कोई पर्व न होगा, कोई त्योहार न होगा, कोई उत्सव न होगा, कोई मंदिर न होगा, मस्जिद न होगा, गिरजाघर न होंगे? तब... जब कोई धर्म न होगा? कोई तीज-त्योहार न होंगे... तब क्या कोई गरीब न होगा?
जब यह सब न होगा, तब भी गरीब होंगे, लेकिन जानते हो क्या होगा? तब आदमी सिर्फ खाने-पीने और गोबर फैलाने वाला एक जीव होगा। वह फिर वापस पशु हो जाएगा, उसे किसी का डर न होगा, अपने अलावा किसी की चिंता न होगी। तब जब धर्म न होगा, त्योहार न होंगे, तब सिर्फ भीड़ होगी, कोई समाज न होगा। तब भी गरीब होंगे लेकिन यदि सरकार ने मदद न की तो उनकी मदद के लिए कोई और न होगा...।
पशुओं को देख लो। वे पर्व-त्योहार, उत्सव-मातम कुछ नहीं मनाते, यह सब इंसान ही मनाता है। क्योंकि इंसान को सिर्फ खाने-पीने तक चिंता नहीं रहती, वह अपने उत्थान, अपनी पहचान, स्वाभिमान, सम्मान के साथ जीना पसंद करता है। वह अपने दुःख बांटना जानता है तो पर्व-त्योहार पर अपनी खुशियां भी बांटता है। यही इंसान है और यदि वह जीवित है तो यह होना ही है...।
इंसान को ही अपने धर्म की चिंता होती है, कर्म की होती है, अपनी होती है, दूसरों की भी होती है। उसे पाप-पुण्य की चिंता रहती है। उसे इस बात का डर सताता है कि आज यदि उसने बुरा किया तो कल उसके साथ भी बुरा होगा। वह अपने बुजुर्गों का सम्मान करता है ताकि आगे उसे भी सम्मान मिले। अपने पितरों को भी याद रखता है, उन्हें नमन करता है। उसमें प्रतीकों तक का सम्मान करने की भावना होती है इसलिए सजीव का भी अनादर नहीं करता...।
जो ईश्वर को मानता है-पूजता है वही यह भी मानता है कि किसी की आत्मा को चोट नहीं पहुंचनी चाहिए, किसी की हाय नहीं लेनी चाहिए। जिसे इस जन्म के बाद अगले जन्म की भी चिंता है वह कहीं अधिक सावधान होता है अपने कर्मों को लेकर, उसे कहीं अधिक चिंता होती है इस बात की कि सबकुछ यहीं नहीं है; उसने यदि बुरा किया तो अगले कई जन्मों तक उसे इसके परिणाम भोगने होंगे...।
सबकुछ नहीं तो बहुत कुछ इसलिए ही सही है क्योंकि धर्म है, जो अच्छा करने की प्रेरणा देता है, बुरा करने से रोकता है। त्योहार हैं जो हमें संदेश देते हैं। यह धर्म है जो सीधे प्राणों में उतरता है और इसलिए पाप करने से सीधे आत्मा रोकती है और पुण्य करने के लिए प्रेरित करती है। सीधे आत्मा से आवाज आती है परोपकाराय पुण्याय...। इसी भावना से हर व्यक्ति, दूसरे की मदद करता है। यह भावना खत्म हो जाएगी तो कुछ न बचेगा इसलिए इस भावना के उद्गम स्थल, इसके स्रोत पर चोट करने की कोशिश मत करो।
हर धार्मिक अनुष्ठान को ढोंग, उस पर होने वाले खर्च को अपव्यय मानने वालों यह भी समझ लो; जिस दिन दुनिया से धर्म का लोप हो जाएगा, आदमी को दानव बनते देर न लगेगी। यदि इतने नास्तिक हो कि मानते हो कि ईश्वर नहीं है तो भी मान लो कि सृष्टि सुन्दर बनी रहे, शेर के होने पर भी बकरी जिंदा रह सके, बलवान के होने पर भी कमजोर आदमी जीवित रहे और अमीर के होने पर भी गरीब को अपने अस्तित्व का डर न हो, तो इसके लिए जरूरी है कि ईश्वर है, कहीं ना कहीं है, सब देख रहा है; यह भावना बनी रहे, यह डर बना रहे। यह बात हमेशा मन में रहनी चाहिए कि हमारी जो गलतियां छुपी हुई हैं, वह भी कहीं ना कहीं दर्ज हो रही हैं, उसका भी कहीं ना कहीं हिसाब होगा और सजा मिलेगी...।
धर्म का होना, धार्मिक होना, पर्व-त्योहारों का होना, उन्हें मनाना हमारी रग-रग में है। यही हमारी संस्कृति है, यही हमारी पहचान है। यही देश ही नहीं, हमारी भी आत्मा है। गरीबों की सेवा की जो भावना हमारे अंदर है, वह भी इसी कारण है कि हमारी संस्कृति में परोपकार ही सबसे बड़ा पुण्य है। इसलिए, गरीबों को देखकर दुखी होने वालों, धार्मिक उत्सवों की महत्ता भी समझो, उसका मर्म जानो, और उसके उत्सव में शामिल हो आनंदित भी हो लो। यूं ना समझो कि दीपावली पर दीप जलाने वाले, होली पर रंग खेलने वाले, छठ पर अर्घ्य देने वाले, शिवरात्रि पर जलाभिषेक करने वाले, नवरात्रि पर प्रतिमा स्थापित करने वालों को गरीबों की चिंता नहीं है; इनमें से प्रत्येक को कहीं तुमसे अधिक चिंता है गरीबों की। तुम क्या जानो, हमारे हर पर्व-त्योहार में 'दरिद्र नारायण' की चिंता सबसे पहले शामिल होती है...।
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