हम हैरान रह गए यह देखकर कि छपरा तो कुछ बदला ही नहीं था...
लालू जी से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है और दोस्ती हो नहीं सकती ऐसे आदमी से। उम्र का फासला तो कोई मायने नहीं रखता लेकिन चरित्र का फासला इतना ज्यादा है कि एक ही स्कूल में पढ़ने के बाद भी लालू से मेरी दोस्ती नहीं हो पाई। फिर भी, अच्छा नहीं लगता जब कोई उनकी बुराई करता है। सच बताएं तो खुद हमें भी उनके बारे में कुछ बुरा कहते हुए बहुत बुरा लगता है लेकिन क्या करें, उन्होंने अच्छे काम इतने कम किए कि ढूंढना पड़ जाए और इसीलिए जब उनका जिक्र हम करते हैं तो 'उनके लोगों' को लगता है कि उनकी बुराई हो रही है...।
अभी हम लालू के संसदीय क्षेत्र छपरा में हैं। उनके किस्से यहां के लोगों की जुबां पर हैं, और उनके कारनामे खुद शहर कहता है। लालू और छपरा का नाता इसी से समझ लीजिए कि हम छपरा को देखते हैं तो हमें रुड़ी नहीं, लालू ही नजर आते हैं। ऐसे में हम यदि कुछ इस शहर के बारे में बोलें तो लालू इसमें जरूर आएंगे इसलिए पहले ही लालू और अपनी दोस्ती के बारे में स्पष्ट कर देना जरूरी है ताकि आप यह भ्रम त्याग सकें कि मेरी-लालू की पटती नहीं।
लालू के बारे में मेरी राय पर अपनी राय बनाने से पहले यह जान लीजिए कि लालू को जानने का जितना दावा आप कर सकते हैं (कुछ को छोड़कर) उतना हम जानते हैं उनके बारे में, एक ही स्कूल में पढ़े जो हैं। इसीलिए लालूजी को हम लालू भी कह दें तो वे बुरा नहीं मानते। अब देखिए ना, लालू ने पटना के मिलर हाईस्कूल में आठवीं में एडमिशन लिया, हमने भी इसी क्लास में इस स्कूल में एंट्री ली। आप वर्षों के फासले को भूल जाइए, इस संयोग को संजोइए। मिलर स्कूल क्रांतिकारियों, मेधावियों का स्कूल है। लालू भी कम क्रांतिकारी नहीं हैं। जेपी आंदोलन में अहम भूमिका निभाई, जेल गए लेकिन सत्ता मिलने के बाद क्रांति भूल परिवार की तरक्की में ऐसे उलझे कि प्रदेश की तरक्की पीछे छूट गई। लालू मेधावी भी कम नहीं। यदि मेधा न होती तो गाँव से जाकर प्रदेश के सिंहासन पर काबिज न हो पाते लेकिन काबिज होने के बाद वह अपना ज्ञान निजी स्वार्थ में इस्तेमाल करने लगे जिससे जेपी के चेले की छवि से अलग चारा वाले लालू बन गए।
हमारे उस स्कूल से निकले थे लालू, जिस स्कूल की नौंवी कक्षा के छात्र देवी पद चौधरी ने अंग्रेजी हुकूमत में पटना में तिरंगा फहराया और अंग्रेजों की गोलियां अपने सीने पर झेल ली। आप जब पटना जाएंगे तब आर. ब्लॉक चौराहे पर अन्य सपूतों के साथ हमारे स्कूल के क्रांतिवीर की प्रतिमा दिख जाएगी। इस स्कूल की दरों दीवार में क्रांति है, उसका असर लालू में खत्म हो गया, मुझमें अब भी थोड़ी बाकी है। खैर, संयोग मिलाइए आप हमारे और लालू की तकदीर में। जब हम इस स्कूल में थे तब स्कूल के ठीक सामने लालू राजद कार्यालय में होते थे। मिलर का खेल मैदान हम लोगों के खेलने के कम, उनकी रैलियों के ज्यादा काम आता था। रैली खत्म होती और बांस बल्ली उखाड़कर टेंट वाले चले जाते, छोड़ जाते वो गढ्ढे जो हम बच्चों से लालू को गालियां दिलवाते थे। खैर, आगे बढ़ते हैं। लालू मिलर से निकलकर बीएन कॉलेज पटना चले गए और हम बिछड़ गए। वे पढ़ाई के दौरान पटना कॉलेज के इलेक्शन में खड़े हो गए लेकिन हमने अलग राह चुनी और हम पत्रकारिता में आ गए। अब हम साथ-साथ की जगह आमने-सामने हो गए। लेकिन, 4 जनवरी 2005 को हम पहली बार दैनिक जागरण, छपरा पहुंचे और फिर लालू से सामना हो गया। उनका संसदीय क्षेत्र मेरा कार्य क्षेत्र बना और 30 नवम्बर 2014 तक हम लालू के साथ बने रहे। 1 दिसम्बर से हिंदुस्तान गोरखपुर जाना हुआ और एक बार फिर लालू और मेरी तकदीर अलग हो गई लेकिन यकीन मानिए हमारी स्कूल वाली दोस्ती कभी नहीं टूटने वाली।
... हम हैरान रह गए यह देखकर कि छपरा तो कुछ बदला ही नहीं था। 2005 में जब हम यहां आए थे, 2014 में जैसा छोड़कर गए और आज 2017 में जब हम पुनः छपरा को देख रहे हैं, कुछ भी नहीं बदला है। थोड़ी खुशी इस बात की हुई कि शहर घूमते हुए लगा ही नहीं कि हम यहां से गए हैं, लेकिन दुख इस बात का कि इतना ठहर क्यों गया यह शहर? कुछ दिनों पहले तक लालू के बेटे की सत्ता थी तो वर्षों तक लालू यहां के सांसद रहे। छपरा ने उन्हें बहुत कुछ दिया लेकिन उन्होंने छपरा को क्या दिया? हम शहर घूमते रहे और शहर हमसे कहता गया- देखो हम आज भी वैसे ही हैं, जैसे तुम छोड़ गए थे। गांधी चौक के गड्ढे वैसे ही पड़े हैं। 'मुसपल्टी' चौक के गड्ढे भी मुंह बना रहे थे। समाहरणालय पथ के बीच में कुछ फूल लग गए हैं, थाना चौक का टॉवर अच्छा दिखने लगा है लेकिन वहां से पंकज सिनेमा तरफ वाली गली का बुरा हाल है। पहले से ही ठीक डीएम कोठी वाली रोड के चौड़ीकरण का कार्य हुआ है लेकिन किनारे नाले पर बने फुटपाथ चलने लायक नहीं हैं। हॉस्पिटल चौक से रतनपुरा जाने वाली सड़क का तो कहना ही क्या? रोड पर हॉस्पिटल के बीच में सुअर पालन बहुत ठीक ठाक तरीके से हो रहा है।
भगवान बाजार का जाम दिन नहीं देखता, इसलिए रविवार को भी यहां थोड़ी देर जाम में फसना ही पड़ा। सावन का महीना है। धर्मनाथ मंदिर से अधिक पूजनीय स्थल नहीं है इस समय छपरा में लेकिन उस तरफ जाने वाली रोड श्रद्धालुओं से कह रही है कि दूसरे तरफ से चले जाइए, अभी मेरी तबियत ठीक नहीं है। गुदरी की गंदगी वैसी ही है कि नाक पर रुमाल रखिए तो कुछ देर बाद उससे भी सड़े टमाटर की बदबू आए। ब्रम्हपुर तक सबकुछ वैसा ही है, कुछ भी नहीं बदला। जहां पानी लगता था वहां पानी है, जहां गढ्ढे थे, वहां दो-चार और हो गए हैं शायद उन्हें परिवार नियोजन का उपाय न पता हो! जयप्रकाश विश्वविद्यालय से भी पुराने प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू के नाम वाले कॉलेज जाने वाली रोड आज भी रो रही है।
राजेन्द्र कॉलेज के पास DrSunil Prasad मिल गए। थोड़ी गुफ़्तगू के बाद यहां से निकले तो फिर वापस 'मुसपल्टी चौक' पहुंच गए। तभी एक दुकानदार चिल्लाया- अबे बिजली आ गई, जेनरेट बंद कर। हमें वो चुटकुला याद आ गया कि हम बिहारी तो हर एक-दो घंटे पर उत्सव मनाते हैं कि बिजली आ गई-बिजली आ गई..। हां, एक अच्छी बात छपरा में यह नजर आई कि हर कोई हेलमेट में दिखा। हमें भी मौसी की स्कूटी हेलमेट के साथ ही मिली थी। पता चला नई एसपी कड़क है। फिलहाल पुलिस तो नहीं मिली, हेलमेट का फायदा यह हुआ कि हम शहर घूमते रहे लेकिन हमें किसी ने टोका नहीं।
अब तक के छपरा को घूमकर मन उचट गया तो यहां के लोगों से मिलने निकले। शहर की जितनी दुर्दशा है, लोग उतने ही अच्छे हैं। 'मुसपल्टी चौक' पर हमें Aman Kumar Singh मिल गए। हमने उनसे प्रो. कृष्ण कुमार द्विवेदी से मिलने की इच्छा जाहिर की। वे एक किताब लिख रहे हैं। पता चला कि वे अभी रामकृष्ण मिशन में मिलेंगे। हम वहीं चले गए। मिशन के सभागार में प्रायाणिक और हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से तुलसी जयंती पर कार्यक्रम चल रहा था। Brajendra Kumar Sinha मिल गए। द्विवेदी सर ने नए सिरे से परिचय कराया, इतने दिन बाद मिलने पर वे पहचान नहीं पाए। Kashmira Singh सफल संचालन कर रही थीं। वक्ता इतने उत्साहित थे कि उन्हें बार-बार कहना पड़ रहा था समय का ख्याल रखें। यहां आकर हमने संतोष किया कि चलो कुछ तो अच्छा हो रहा है अपने छपरा में लेकिन माफ कीजिए इस एक अच्छे में लालू जी की कोई भूमिका नहीं है।
अभी हम लालू के संसदीय क्षेत्र छपरा में हैं। उनके किस्से यहां के लोगों की जुबां पर हैं, और उनके कारनामे खुद शहर कहता है। लालू और छपरा का नाता इसी से समझ लीजिए कि हम छपरा को देखते हैं तो हमें रुड़ी नहीं, लालू ही नजर आते हैं। ऐसे में हम यदि कुछ इस शहर के बारे में बोलें तो लालू इसमें जरूर आएंगे इसलिए पहले ही लालू और अपनी दोस्ती के बारे में स्पष्ट कर देना जरूरी है ताकि आप यह भ्रम त्याग सकें कि मेरी-लालू की पटती नहीं।
लालू के बारे में मेरी राय पर अपनी राय बनाने से पहले यह जान लीजिए कि लालू को जानने का जितना दावा आप कर सकते हैं (कुछ को छोड़कर) उतना हम जानते हैं उनके बारे में, एक ही स्कूल में पढ़े जो हैं। इसीलिए लालूजी को हम लालू भी कह दें तो वे बुरा नहीं मानते। अब देखिए ना, लालू ने पटना के मिलर हाईस्कूल में आठवीं में एडमिशन लिया, हमने भी इसी क्लास में इस स्कूल में एंट्री ली। आप वर्षों के फासले को भूल जाइए, इस संयोग को संजोइए। मिलर स्कूल क्रांतिकारियों, मेधावियों का स्कूल है। लालू भी कम क्रांतिकारी नहीं हैं। जेपी आंदोलन में अहम भूमिका निभाई, जेल गए लेकिन सत्ता मिलने के बाद क्रांति भूल परिवार की तरक्की में ऐसे उलझे कि प्रदेश की तरक्की पीछे छूट गई। लालू मेधावी भी कम नहीं। यदि मेधा न होती तो गाँव से जाकर प्रदेश के सिंहासन पर काबिज न हो पाते लेकिन काबिज होने के बाद वह अपना ज्ञान निजी स्वार्थ में इस्तेमाल करने लगे जिससे जेपी के चेले की छवि से अलग चारा वाले लालू बन गए।
हमारे उस स्कूल से निकले थे लालू, जिस स्कूल की नौंवी कक्षा के छात्र देवी पद चौधरी ने अंग्रेजी हुकूमत में पटना में तिरंगा फहराया और अंग्रेजों की गोलियां अपने सीने पर झेल ली। आप जब पटना जाएंगे तब आर. ब्लॉक चौराहे पर अन्य सपूतों के साथ हमारे स्कूल के क्रांतिवीर की प्रतिमा दिख जाएगी। इस स्कूल की दरों दीवार में क्रांति है, उसका असर लालू में खत्म हो गया, मुझमें अब भी थोड़ी बाकी है। खैर, संयोग मिलाइए आप हमारे और लालू की तकदीर में। जब हम इस स्कूल में थे तब स्कूल के ठीक सामने लालू राजद कार्यालय में होते थे। मिलर का खेल मैदान हम लोगों के खेलने के कम, उनकी रैलियों के ज्यादा काम आता था। रैली खत्म होती और बांस बल्ली उखाड़कर टेंट वाले चले जाते, छोड़ जाते वो गढ्ढे जो हम बच्चों से लालू को गालियां दिलवाते थे। खैर, आगे बढ़ते हैं। लालू मिलर से निकलकर बीएन कॉलेज पटना चले गए और हम बिछड़ गए। वे पढ़ाई के दौरान पटना कॉलेज के इलेक्शन में खड़े हो गए लेकिन हमने अलग राह चुनी और हम पत्रकारिता में आ गए। अब हम साथ-साथ की जगह आमने-सामने हो गए। लेकिन, 4 जनवरी 2005 को हम पहली बार दैनिक जागरण, छपरा पहुंचे और फिर लालू से सामना हो गया। उनका संसदीय क्षेत्र मेरा कार्य क्षेत्र बना और 30 नवम्बर 2014 तक हम लालू के साथ बने रहे। 1 दिसम्बर से हिंदुस्तान गोरखपुर जाना हुआ और एक बार फिर लालू और मेरी तकदीर अलग हो गई लेकिन यकीन मानिए हमारी स्कूल वाली दोस्ती कभी नहीं टूटने वाली।
... हम हैरान रह गए यह देखकर कि छपरा तो कुछ बदला ही नहीं था। 2005 में जब हम यहां आए थे, 2014 में जैसा छोड़कर गए और आज 2017 में जब हम पुनः छपरा को देख रहे हैं, कुछ भी नहीं बदला है। थोड़ी खुशी इस बात की हुई कि शहर घूमते हुए लगा ही नहीं कि हम यहां से गए हैं, लेकिन दुख इस बात का कि इतना ठहर क्यों गया यह शहर? कुछ दिनों पहले तक लालू के बेटे की सत्ता थी तो वर्षों तक लालू यहां के सांसद रहे। छपरा ने उन्हें बहुत कुछ दिया लेकिन उन्होंने छपरा को क्या दिया? हम शहर घूमते रहे और शहर हमसे कहता गया- देखो हम आज भी वैसे ही हैं, जैसे तुम छोड़ गए थे। गांधी चौक के गड्ढे वैसे ही पड़े हैं। 'मुसपल्टी' चौक के गड्ढे भी मुंह बना रहे थे। समाहरणालय पथ के बीच में कुछ फूल लग गए हैं, थाना चौक का टॉवर अच्छा दिखने लगा है लेकिन वहां से पंकज सिनेमा तरफ वाली गली का बुरा हाल है। पहले से ही ठीक डीएम कोठी वाली रोड के चौड़ीकरण का कार्य हुआ है लेकिन किनारे नाले पर बने फुटपाथ चलने लायक नहीं हैं। हॉस्पिटल चौक से रतनपुरा जाने वाली सड़क का तो कहना ही क्या? रोड पर हॉस्पिटल के बीच में सुअर पालन बहुत ठीक ठाक तरीके से हो रहा है।
भगवान बाजार का जाम दिन नहीं देखता, इसलिए रविवार को भी यहां थोड़ी देर जाम में फसना ही पड़ा। सावन का महीना है। धर्मनाथ मंदिर से अधिक पूजनीय स्थल नहीं है इस समय छपरा में लेकिन उस तरफ जाने वाली रोड श्रद्धालुओं से कह रही है कि दूसरे तरफ से चले जाइए, अभी मेरी तबियत ठीक नहीं है। गुदरी की गंदगी वैसी ही है कि नाक पर रुमाल रखिए तो कुछ देर बाद उससे भी सड़े टमाटर की बदबू आए। ब्रम्हपुर तक सबकुछ वैसा ही है, कुछ भी नहीं बदला। जहां पानी लगता था वहां पानी है, जहां गढ्ढे थे, वहां दो-चार और हो गए हैं शायद उन्हें परिवार नियोजन का उपाय न पता हो! जयप्रकाश विश्वविद्यालय से भी पुराने प्रथम राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू के नाम वाले कॉलेज जाने वाली रोड आज भी रो रही है।
राजेन्द्र कॉलेज के पास DrSunil Prasad मिल गए। थोड़ी गुफ़्तगू के बाद यहां से निकले तो फिर वापस 'मुसपल्टी चौक' पहुंच गए। तभी एक दुकानदार चिल्लाया- अबे बिजली आ गई, जेनरेट बंद कर। हमें वो चुटकुला याद आ गया कि हम बिहारी तो हर एक-दो घंटे पर उत्सव मनाते हैं कि बिजली आ गई-बिजली आ गई..। हां, एक अच्छी बात छपरा में यह नजर आई कि हर कोई हेलमेट में दिखा। हमें भी मौसी की स्कूटी हेलमेट के साथ ही मिली थी। पता चला नई एसपी कड़क है। फिलहाल पुलिस तो नहीं मिली, हेलमेट का फायदा यह हुआ कि हम शहर घूमते रहे लेकिन हमें किसी ने टोका नहीं।
अब तक के छपरा को घूमकर मन उचट गया तो यहां के लोगों से मिलने निकले। शहर की जितनी दुर्दशा है, लोग उतने ही अच्छे हैं। 'मुसपल्टी चौक' पर हमें Aman Kumar Singh मिल गए। हमने उनसे प्रो. कृष्ण कुमार द्विवेदी से मिलने की इच्छा जाहिर की। वे एक किताब लिख रहे हैं। पता चला कि वे अभी रामकृष्ण मिशन में मिलेंगे। हम वहीं चले गए। मिशन के सभागार में प्रायाणिक और हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से तुलसी जयंती पर कार्यक्रम चल रहा था। Brajendra Kumar Sinha मिल गए। द्विवेदी सर ने नए सिरे से परिचय कराया, इतने दिन बाद मिलने पर वे पहचान नहीं पाए। Kashmira Singh सफल संचालन कर रही थीं। वक्ता इतने उत्साहित थे कि उन्हें बार-बार कहना पड़ रहा था समय का ख्याल रखें। यहां आकर हमने संतोष किया कि चलो कुछ तो अच्छा हो रहा है अपने छपरा में लेकिन माफ कीजिए इस एक अच्छे में लालू जी की कोई भूमिका नहीं है।
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