जिसने सिखाया या जिनसे सीखा, सभी को प्रणाम!
जीवन चक्र ऐसा घूमा है कि हर रिश्ता सिर्फ मतलब तक सिमट कर रह गया है। जब तक जिसकी जरूरत रही तब तक उससे रिश्ता रहा। गुरु-शिष्य का रिश्ता भी इससे अछूता न रहा। हमें याद नहीं कि कब हम किसी गुरु से उसके द्वारा दिए ज्ञान के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए मिले हों। आज यह अवसर मिला है तो हम खोना नहीं चाहते।
यूं तो अब तक पापा जी के अलावा ना तो मेरा कोई स्थायी गुरु है और ना ही हम किसी के शिष्य हैं। क्योंकि उनके अलावा किसी में ऐसी क्षमता न दिखी कि मन कहे कि चलो इनका शिष्य बन जाएं। बस वही थे कि जो थे वही दिखते थे, जो दिखते थे वही थे। ... तो गुरु पूर्णिमा पर परम पिता से भी बड़े अपने पिता व गुरु के चरणों में प्रणाम!
लेकिन, इसके साथ एक सच यह भी है कि हर कदम पर हमें गुरु मिले, जिनसे कुछ न कुछ सीखा। अम्मा की गोद से सीखने का शुरू क्रम अब तक जारी है। प्रथम गुरु अम्मा को प्रणाम! फीस लेकर पढ़ाने वाले शिक्षकों से लेकर निशुल्क ज्ञान देने वाले सभी बड़ों को प्रणाम!
... मामाजी (Brijesh Dhar Dwivedi) को प्रणाम जिन्होंने हमें पढ़ाया। तभी टाइपिंग सीखा दी जब हम आठवीं में थे। पटना के मंदिरी में कम्युनिस्ट पत्रिका 'फिलहाल' में हमने तब काम किया जब हाईस्कूल में थे। वहां अमित भैया मिले। श्री Amit Sinha ने गुरु बनकर कम्प्यूटर सिखाया तो उनकी मां, दीदी ने बेटे जैसा मेरा खूब ख्याल रखा। और लोग भी मिले, सबने सिखाया, सभी को प्रणाम!
दैनिक जागरण से करियर की शुरुआत हुई तो पेजिनेशन की जरूरत पड़ी। नौकरी के पहले से अधिक उसके बाद सीखा हमने। मॉडेम युग से ऑनलाइन सर्वर तक, पेजमेकर, क्वार्क से लेकर इनडिजाइन तक की यात्रा में लगातार सीखना जारी है...। इस दौरान तकनीकी शिक्षा देने वाले गुरुओं को प्रणाम! की- बोर्ड पर तबले की थाप देने वाले Manish, Krishna मामा, कलम के जादूगर Shashi Bhushan, Madhuresh, Suvigya मामा के साथ ही दैनिक जागरण पटना के सभी मामाओं को प्रणाम, जिन्होंने अपार प्यार दिया, मेरे लिए अपने ज्ञान और स्नेह का सागर उड़ेल दिया।
दैनिक जागरण छपरा में पहली खबर लिखने में सहयोग करने वाले रविन्द्र भैया (Chana Bowo Bhaad Fodo) और उसे पब्लिश करने वाले शैलेन्द्र भैया ( Shailendra Sharma) को प्रणाम! उस खबर की पहली बार सराहना करने वाले उदय भैया (Uday Narayan Singh) का आभार।
पत्रकारिता में ईमानदारी की शिक्षा और उसके लिए अडिग रहने की शक्ति देने श्री Krishnakant Ojha को प्रणाम!
...जब 5 हजार तनख्वाह थी मेरी, 500 के कमरे में छपरा में रहते थे हम। तब गड़खा के देवराहा बाबा डिग्री कॉलेज के भ्रष्टाचार के खिलाफ मेरे द्वारा चलाए जा रहे खबरों के अभियान को रोकने के लिए 70 हजार के ऑफर मिले। यह तब बहुत बड़ी रकम थी लेकिन हमने एक झटके में मना कर दिया। प्रिंसिपल इसके पहले धमकी दे चुका था। रिश्वत पर बात न बनी तो उसने पैरवी के हथियार इस्तेमाल किए। श्री कृष्णकांत ओझा के पास तमाम कॉल आए, लोग आए लेकिन उन्होंने हमसे कहा कि तुम तब तक लिखो जब तक हालात बदल न जाएं। राजभवन से जांच बैठ गई और हमने लिखना बन्द किया। यदि कोई और बॉस होता तो इतने दबाव के बाद शायद ही टिक पाता और उस हालात में मेरी ईमानदारी की कोई कीमत न होती। तब से अब तक किसी के दबाव में या लालच में यदि कलम कभी नहीं रुकी तो वह शक्ति देने वाले उस गुरु को प्रणाम।
...जब 5 हजार तनख्वाह थी मेरी, 500 के कमरे में छपरा में रहते थे हम। तब गड़खा के देवराहा बाबा डिग्री कॉलेज के भ्रष्टाचार के खिलाफ मेरे द्वारा चलाए जा रहे खबरों के अभियान को रोकने के लिए 70 हजार के ऑफर मिले। यह तब बहुत बड़ी रकम थी लेकिन हमने एक झटके में मना कर दिया। प्रिंसिपल इसके पहले धमकी दे चुका था। रिश्वत पर बात न बनी तो उसने पैरवी के हथियार इस्तेमाल किए। श्री कृष्णकांत ओझा के पास तमाम कॉल आए, लोग आए लेकिन उन्होंने हमसे कहा कि तुम तब तक लिखो जब तक हालात बदल न जाएं। राजभवन से जांच बैठ गई और हमने लिखना बन्द किया। यदि कोई और बॉस होता तो इतने दबाव के बाद शायद ही टिक पाता और उस हालात में मेरी ईमानदारी की कोई कीमत न होती। तब से अब तक किसी के दबाव में या लालच में यदि कलम कभी नहीं रुकी तो वह शक्ति देने वाले उस गुरु को प्रणाम।
जगदम कॉलेज छपरा के पूर्व प्राचार्य प्रो. कृष्ण कुमार द्विवेदी को प्रणाम जिनके सानिध्य में दो- दो पुस्तके लिखने का सुअवसर मिला। भोजपुरी लोक कथा संग्रह 'भरबीतन' को लिखने में तो हमने सिर्फ उनका सहयोग ही किया था लेकिन उनकी उदारता, सहजता ऐसी कि हमें उस किताब का संपादक बन जाने का न्यौता दे बैठे। उनके कितने ही शिष्य संपादक, प्रोफेसर हैं। उन विद्वान की लिखी हुई पुस्तक के संपादक के रूप में मुझ जैसे नए लड़के का नाम किसी पैबंद की तरह ही तो लगता! हमने मना किया तो उन्होंने मेरा नाम भी लेखक में ही डाल दिया। इतना प्यार देने वाले गुरु को प्रणाम।
पहली बार हिंदुस्तान गोरखपुर में डेस्क पर काम करने और सीखने का मौका मिला। सबने भरपूर साथ दिया, ज्ञान दिया। श्री Dinesh Pathak, Shiv Prasad, Harshvardhan Shahi, Rakesh Pal आदि के साथ ही भाई जैसा स्नेह देने वाले साथी Bhupendra Singh, Deep Pandey, Skand Shukla, Sanjeev Chand, Rakesh Kumar Dwivedi, Vatsaly Bhardwaj और अन्य को प्रणाम। आई नेक्स्ट गोरखपुर में एक पोस्ट के लिए हुए इंटरव्यू में यदि 10-12 लोगों में से हम अकेले चुने गए तो निश्चित ही यह हिंदुस्तान के इन्हीं साथियों संग डेस्क पर किए कार्यानुभव के कारण हुआ।
पहली बार वेब रिपोर्टिंग के हुनर सिखाने वाले श्री Ravindra Pathak Rajan और Deepak Mishra को प्रणाम। डेस्क इंचार्ज के कार्य से परिचित कराने और सिखाने वाले श्री Varun Rai को प्रणाम।
जीवन जारी है। हर पल किसी न किसी से हमने कुछ न कुछ सीखा है और आगे भी सीखना है। जिनसे सीखा लेकिन जिक्र न कर सका, क्षमा के साथ उनको प्रणाम। आगे मिलने वाले गुरुओं को भी प्रणाम।

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