मीलॉर्ड! इसे फैसला कह सकते हैं, न्याय नहीं!
![]() |
| गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर के सामने सोमवार को प्रदर्शन करते शिक्षामित्र |
मीलॉर्ड!
शिक्षा मित्र सड़क पर आ गए हैं। उनके आंदोलन से पूरा शहर परेशान है। हम भी किसी-तरह जाम से बचते-बचाते एक किमी दूर क्वार्टर पर एक घंटे में पंहुचे हैं। लेकिन, जाने दीजिए, मेरी परेशानी से उनकी परेशानी ज्यादा है। रोजी छीन गई है उनकी। जब उन्हें नौकरी दी गई तो काबिलियत पूछी नहीं गई, वोट लेना था उनसे। वे जब नाश्ते के लिए भी कम पड़ने वाले मानदेय पर पढ़ाते रहे तो कोई दिक्कत नहीं थी। आपने भी नहीं पूछा सरकार से कि इतनी कम सैलरी देते हो, कैसे रोजी-रोटी चलेगी इनकी? अब जब वे अच्छी सैलरी लेने लगे तब याद आया कि शिक्षा में गुणवत्ता कितनी जरूरी है!
मीलॉर्ड! हम आपके फैसले पर प्रश्न नहीं उठा रहे। आप तो सर्वोच्च हैं, सर्वज्ञ भी! हमें तो इतनी जानकारी भी नहीं कि हम क्या कह दें तो आपकी अवमानना हो जाए इसलिए कुछ कहने से हिचकते हैं, डरते हैं। आम आदमी हैं ना! हमें तो अपने भी पूरे अधिकार पता नहीं, कभी मिले ही नहीं। लेकिन आपके बारे में इतना पता है कि आपके फैसले सही समझते हुए उसे मान लेना चाहिए। लेकिन देखिए ना, हम आपके हर फैसले मानते हैं तब भी कितने दुखी हैं, हमारी सरकारें आपके फैसलों की अवहेलना करती हैं, तब भी उन्हें कहां कोई फर्क पड़ता है? खैर, हमें पता है, हमारे बारे में आपसे अच्छा सोचने वाला, आपसे बेहतर फैसले देने वाला यहां कोई नहीं है। और आपके बाद कोई और है भी नहीं। इसलिए गुस्ताखी माफ वाले अंदाज में आपसे ही कहना है!
मीलॉर्ड! सही किया आपने। नियमविरुद्ध कुछ भी नहीं होना चाहिए। शिक्षा मित्र को सहायक शिक्षक बनाना तो दूर, पियून भी सही नियुक्ति प्रक्रिया के तहत ही बहाल होना चाहिए। और शिक्षक तो देश का भविष्य गढ़ते हैं, वे ठीक नहीं हुए तो देश का भविष्य कैसे ठीक होगा? उनकी नियुक्ति में गड़बड़ी भला आप क्यों बर्दास्त करेंगे! लेकिन मीलॉर्ड! एक लोचा इस आम आदमी की समझ में नहीं आया कि आपने शिक्षा मित्रों को शिक्षक पद के योग्य नहीं पाया, या वे पढ़ाने के ही लायक नहीं हैं? यह बात समझ नहीं आती कि जब वे पढ़ाने योग्य नहीं हैं तो वे शिक्षामित्र भी कैसे हो सकते हैं? उन्हें तो विद्यालय में ही नहीं होना चाहिए। और यदि वे पढ़ाने के योग्य हैं तो वे शिक्षक कहलाने के योग्य कैसे नहीं? यह वाकई बड़ा टेक्निकल है, इसे आप ही समझ सकते हैं। मेरे जैसे आम आदमी को तो बस इतनी सी बात पता है कि वे शिक्षामित्र कहलाएं या सहायक शिक्षक, मानदेय 2 हजार पाएं या वेतन 30 हजार, वे गढ़ते भविष्य ही हैं। उनका हर रूप में उतना ही योग्य होना जरूरी है जितना कि एक छात्र को पढ़ाने के लिए होना चाहिए।
मीलॉर्ड! चिंता शिक्षा के गुणवत्ता की तो है ही नहीं। चिंता तो है राजकोष बचाने की। कम से कम वेतन में किसी तरह शिक्षा की नैया पार लगाने की। फिर चाहे वह नैया डूबे या बचे, सरकार खेवनहार देकर अपनी ड्यूटी पूरी कर लेती है। मीलॉर्ड! यदि आपको लगता है कि शिक्षा में गुणवत्ता बहुत जरूरी है तब तो आपको भी पता है कि वे जब 30 हजार से ढाई-तीन हजार वाली सैलरी पर कर दिए जाएंगे तब भी वे भविष्य ही गढ़ेंगे अपने तरीके से। मीलॉर्ड! उनका पद चाहे जो हो, सैलरी चाहे जैसी मिले, स्कूल में वे काम तो अब भी वही करेंगे, उसी जानकारी, गुणवत्ता के साथ जो उनके पास है।
मीलॉर्ड! एक बात और बतानी है आपको। आम नागरिक हैं हम। योग्यता चाहे रहे न रहे, पेट के लिए नौकरी की जरूरत हर समय रहती है। जब, जहां, जैसे जुगाड़ लगता है, हम सब नौकरी पाने की चेष्टा करते हैं। जब आपको पता चलता है कि यह नौकरी नियम विरुद्ध है तो आप बर्खास्त करने का हुक्म सुना देते हैं। बहुत अच्छा करते हैं आप! न्याय करने वाले को कभी भावुक नहीं होना चाहिए लेकिन मीलॉर्ड हर फैसले की मार लोक पर ही पड़ती है, यही लोकतंत्र है क्या?
मीलॉर्ड! एक आम आदमी जब कोई अवैधानिक कार्य करता है तो कई बार इसलिए भी कर जाता है क्योंकि उसे नियमों की जानकारी नहीं होती लेकिन सरकारों के पास न तो कानून के किताबों की कमी होती है, ना वकीलों की। फिर जब वे कोई गलती करते हैं तो उनका भी खामियाजा सिर्फ पब्लिक ही क्यों भरती है? माना कि योग्यता ना होते हुए भी शिक्षा मित्र, सहायक शिक्षक बने रहे लेकिन उन्होंने अपना समायोजन खुद तो नहीं किया था ना? माना कि उन्होंने अच्छे वेतन से कुछ मजे भी किए होंगे लेकिन सरकार ने भी तो राजनीतिक लाभ लिया- उससे कैसे वसूल करेंगे? उसे तो कोई सजा नहीं सुनाई? कह दीजिए ना कि अगले 10-20 साल तक वे चुनाव नहीं लड़ सकते! समायोजन में शामिल सभी बड़े अफसर बर्खास्त किए जाएं! सरकार का निर्णय गलत था, यह जानते हुए भी उसकी पैरवी करने वाले वकील की मान्यता रद कर दी जाए! जो भी समायोजन के फैसले में शामिल रहा, थोड़ा चाबुक उन पर भी तो चले मीलॉर्ड!

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
आपकी टिप्पणियों का स्वागत है लेकिन फूहड़ शब्द निषेध हैं।