शाबाश! यह भी कोई कम नहीं
हम कोई क्रिकेट एक्सपर्ट नहीं जो जीत-हार की समीक्षा करें लेकिन फिर भी कुछ कहना है! निसंदेह मेरी क्रिकेट में कोई रुचि नहीं, लेकिन दिमाग में क्रिकेट हो, न हो, दिल में देश तो जरूर है। इसलिए जब भी कोई टीम जीतती या हारती है, वह चाहे मेन हो या वूमन, क्रिकेट टीम हो या कोई और, फर्क तो पड़ता है। हमें देश की किसी भी टीम के जीतने-हारने से फर्क पड़ता है। आज भी फर्क पड़ा है इसलिए कुछ कहना है!
हां, मेरी समझ में क्रिकेट नहीं आता, लेकिन टीम की जीत-हार से भावना वैसे ही जुड़ी होती है, जैसे किसी क्रिकेट फैन की। टीम जब जीतती है तो लगता है कि हमने अच्छा खेला, जब हारती है तो लगता है कि कहीं कमी रह गई शायद। इस जीतने और हारने के बीच में क्या—क्या हुआ, यह सब मेरे पल्ले कभी नहीं पड़ता। आज भी पल्ले नहीं पड़ा। लेकिन यह बात जरूर समझ में आई कि टीम हार गई तो कुछ तो कमी रही होगी। इसके साथ ही हार के इतने कम अंतर ने यह भी बताया कि जितने की आखिरी दम तक कोशिश की बेटियों ने।
बेटियों को इस हार के साथ नहीं, बल्कि उस विश्वास के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है, जिसने उन्हें यहाँ तक पहुंचाया। बेटियों ने भरपूर साथ दिया देश का, आखिरी तक लड़ीं, खुद के लिए भी—देश के लिए भी। इसके बाद भी वह हार गईं तो कमी उनकी नहीं, कुछ हमारी भी है— कुछ 'देश' की भी है। हमने दिया ही क्या था उन्हें? देने में भी तो भेदभाव करने से नहीं चूके। खुद की बदौलत बेटियों ने हमें चैम्पियन नहीं बनाया लेकिन चैंपियन बनने का ख्वाब देखने के स्तर तक ही पहुंचा दिया तो यह कम है क्या? उनकी कोशिश बताती है कि बिना स्त्री—पुरुष का भेदभाव किए, यदि हमने उन्हें प्रोत्साहित किया और 'देश' ने साथ दिया, अवसर दिया तो अगले वूमन वर्ल्ड कप में चैम्पियन इंडियन टीम ही होगी।
आज इस टीम की हार पर थोड़ी निराशा है लेकिन अगली चैंपियन यही टीम होगी— इसकी पूरी आशा है...।

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