शिक्षा की पाठशाला या योजनाओं का अखाड़ा ?

बिहार में सत्ता की दूसरी पारी खेल रही नीतीश सरकार की प्राथमिकता सूची में जो शब्द सबसे ऊॅचा स्थान रखता है, वह है शिक्षा। प्राथमिकता सूची में यह शब्द सबसे ऊपर इसलिए है, क्योंकि वास्तविकता में यह सबसे नीचे है। सरकार ने सूबे में शिक्षा का स्तर ऊंचा करने के लिए अपने तरीके से विभिन्न योजनाएं चला तो रखी हैं मगर, नतीजे सरकारी अदूरदर्शिता व नासमझी के परिचायक बन गए हैं। हालात यह है कि विद्यालयों के प्रधानाध्यापक ठेकेदार बन गए हैं और यहां छात्रों की जगह रंगदार पैदा हो रहे हैं। कभी पोशाक, तो कभी साइकिल, और कभी खिचड़ी के लिए भारत का भविष्य कहे जाने वाले बच्चे न सिर्फ सड़क पर उतर रहे हैं, बल्कि तोड़-फोड़ व मारपीट से भी बाज नहीं आ रहे। सारण जिले में तो छात्रों की यह हरकत एक बीमारी के रूप में उभर कर सामने आयी है जो महामारी का रूप लेती जा रही है। कभी वे सड़क जाम करते हैं तो कभी विद्यालय की कुर्सियां तोड़ते हैं और कभी-कभी तो वे अपने शिक्षकों से दुव्र्यवहार भी करते हैं। हालिया घटनाओं को देखकर सामाजिक चिंतकों, शिक्षाविदों से लेकर आम आदमी तक की जुबां से यह बात सुनी जा रही है कि जब ये बच्चे 10-15 वर्ष की उम्र में ट्रकें रोक रहे हैं, शिक्षकों से दुव्र्यवहार कर रहे हैं तो आगे चलकर ये क्या बनेंगे? बढ़ती उम्र के साथ यदि इनका यह व्यवहार और आक्रामक हुआ तो इनका भविष्य कैसा होगा? अभिभावक अपने बच्चों को किस उम्मीद के साथ विद्यालय भेज रहे हैं और ये किस साॅंचे में ढाले व ढलते जा रहे हैं? प्रश्न अति विचाणीय व विमर्श योग्य है।बता दें कि पिछले एक सप्ताह के अंदर सारण जिले के करीब 2 दर्जन विद्यालयों में पोशाक राशि के लिए मध्य विद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने पठन-पाठन बाधित किया, सड़क पर उतरे, यातायात ठप किया, गुरूजनों से दुव्र्यवहार किया, उनकी कुर्सियां तोड़ी और साथ ही तोड़ डाली शिक्षा के मंदिर की सारी मर्यादा। एक छात्र की शिक्षा में पोशाक, साइकिल, खिचड़ी कितनी जरूरी व सहायक है, यह अभिभावकों की समझ से भले ही परे की बात हो, पर सरकार इसे खूब समझती है। पोशाक से विद्यालय के बच्चों में एकरूपता आती है, खिचड़ी से उनका पेट भरता है और साइकिल से वे विद्यालय आते हैं। परंतु वे विद्यालय आते किसलिए हैं? जाहिर है, शिक्षा के लिए न कि इन चीजों के लिए। सरकारी बयान के मुताबिक ये चीजे इसलिए हैं ताकि विद्यालय तक बच्चे पहुंच सकें। अच्छी बात है। परंतु, क्या सरकार यह भूल गयी है कि विद्यालय बच्चे पहुंचते क्यों हैं? अथवा वह बच्चों को विद्यालय तक पहुंचाने के लिए इतनी इंतजाम क्यों कर रखी है? स्वाभाविक व सार्वजनिक बात है कि विद्यालय बच्चे शिक्षा के लिए पहुंचते हैं। पर, वह शिक्षा कहां है? विद्यालयों तक पहुंचने के लिए तमाम इंतजाम हैं पर विद्यालय में शिक्षा के क्या प्रबंध हैं? पढ़ाई में सबसे अधिक सहायक पुस्तकें न तो बाजार में उपलब्ध है और न ही सरकार द्वारा ही समय से बांटी जा रही है। शिक्षक क्या पढाए? छात्र क्या पढ़े? खाली दिमाग शैतान का घर...। दिमाग में शैतानी हरकतें जन्म ले रही हैं और बच्चे शिक्षा के लिए नहीं, योजनाओं के लिए आंदोलन कर रहे हैं। नतीजा यह है कि जो योजनाएं शिक्षा में सहायक बननी थीं, वही शिक्षा का दिवाला निकाल रही हैं। शिक्षा की पाठशाला, योजनाओं का अखाड़ा बन गयी है और लूट-खसोट का राज-सा हो गया है। या तो शिक्षकों का चरित्र अथवा छात्रों में अनुशासन का अभाव इतना बढ़ गया है कि छात्र अपने ही शिक्षकों पर तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं। ऐसे तमाम आरोप पिछले दिनों सारण के शहरी व ग्रामीण विद्यालयों के बच्चों द्वारा अपने शिक्षकों पर लगाए गए, जो शिक्षकों के चरित्र पर एक नहीं कई-कई दाग छोड़ गए, जिन्हें धोने के लिए शिक्षक सफाई नामक साबुन का प्रयोग कर रहे हैं। विद्यालयों का माहौल या सरकार की योजना ने कुछ ऐसा गुल खिलाया है कि छात्र शिक्षा से भटककर योजना को मूल उद्देश्य मान चुके हैं। इसका प्रमाण यह है कि पिछले एक सप्ताह के अंदर विभिन्न मध्य विद्यालयों में जो भी हो-हंगामा हुए, उनकी जड़ में पैसे की भूख थी, न कि शिक्षा की। भवन निर्माण व अन्य योजनाओं ने प्रधानाध्यापकों को ठेकेदार के रूप में बदल दिया है जबकि शिक्षक योजनाओं का लेखा-जोखा रखने में परेशान हैं। सरकार की वही योजनाएं, जो कि शिक्षा में सहायक कहकर चलायी जा रही हैं, कुछ ऐसे दुष्परिणाम दे रही हैं कि वे शिक्षा में बाधक बनती नजर आने लगी हैं। इस पर शिक्षाविद्ों, चिंतकों में बहस छिड़ गयी है। जगदम कालेज के पूर्व प्राचार्य प्रो. कृष्ण कुमार द्विवेदी कहते हैं कि शिक्षक व विद्यालयों का उपयोग केवल शिक्षा-दान में ही होना चाहिए। सरकार जो भी योजनाएं संचालित कर रही हैं, उसके लिए विभाग का सहयोग लिया जाना चाहिए न कि इसमें शिक्षकों को लगाया जाना चाहिए। इससे समाज में शिक्षकों की मर्यादा घट रही है और उन पर लूट-खसोट के आरोप लगने लगे हैं। एक शिक्षक की प्रतिष्ठा व मर्यादा जितनी अधिक होती है, उसकी शिक्षा का प्रभाव भी उतना ही अधिक होता है। अतः प्रबंध कुछ ऐसे होने चाहिए, जिससे समाज में शिक्षकों की प्रतिष्ठा बची रहे। प्रतिष्ठा खोकर कैसी भी शिक्षा नहीं दी जा सकती, अतः यह जिम्मेदारी शिक्षकों की भी बनती है कि वे अपनी मर्यादा में रहें। जहां तक छात्रों की बात है तो वे तो अभी कच्चे घड़े हैं, जैसे ढाले जाएंगे, वे ढल जाएंगे। हां, इस पर कुम्हार की मंशा व उसके प्रयास का बड़ा प्रभाव होता है। अतः सरकार प्रयास करे कि इस कच्ची मिट्टी को सांचा सही मिले और शिक्षक प्रयत्न करें कि वे उस सांचे में पूरी ईमानदारी के साथ छात्रों की प्रतिभा को सही आकार मिले।

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