मदद का ऐसा सिला, करें किससे गिला???


बाढ़ की आपदा के समय अपनी नावों के साथ बाढ़पीडि़तों की मदद करने का सिला जिला प्रशासन नाव मालिकों, नाविकों व मजदूरों को कुछ यूं दे रहा है, गोआ मदद करना कोई जुर्म हो। वर्ष 2010 व 2011 की बाढ़ में अपनी नाव, मांझी व मजदूर देने वाले नाव मालिक भुगतान के लिए तभी से अंचल कार्यालय का चक्कर काट रहे हैं और हालत यह है कि अब इनमें से कुछ नाव मालिक कसम खाने लगे हैं कि आगे से वे ऐसी मदद नहीं करेंगे, जिसकी कीमत इस तरह चुकानी पड़े। पद के नशे में मगरूर अंचल के अंचलाधिकारी व सीआई का गैर जिम्मेदाराना अंदाज ऐसा है कि वे रोज ही नाव मालिकों को कल भुगतान करने का आश्वासन देते हैं और उनका वह कल आज तक नहीं आया। अंचल के अधिकारियों व कर्मियों की बेहयाई कुछ ऐसी है कि सदर अनुमंडल के अनुमंडलाधिकारी का आदेश भी इन पर बेअसर है और अब तो एसडीओ भी आदेश करते-करते थक चुके हैं।
बता दें कि बाढ़ की दृष्टि से सारण संवेदनशील है। गंगा, सरयू व सोन सहित कई छोटी नदियां सारण से होकर गुजरती हैं। खासकर, सारण के दियारा इलाकों में बाढ़ हर वर्ष आता है। बाढ़ की इस विपदा में पीडि़तों को राहत पहुंचाने के लिए जिला प्रशासन के लिए न तो पर्याप्त नावों का प्रबंध है और न ही नाविकों का। ऐसे में, जब भी बाढ़ आती है, पीडि़त लोग बचाव व राहत के लिए जिला प्रशासन का मुंह ताकते हैं तो जिला प्रशासन नाव मालिकों का। प्रशासन के आग्रह पर अपनी नाव, मांझी व मजदूरों के साथ हर साल क्षेत्र के नाव मालिक राहत कार्य में लग जाते हैं। विपदा के समय पीडि़तों का तारणहार बने नाव मालिक, मांझी व मजदूर विपदा के बाद प्रशासन की लापरवाही के कारण स्वयं पीडि़त हैं। स्थिति यह है कि रोज कमाने-खाने वाले मजदूरों ने बाढ़ की विषम परिस्थिति में अपने पारिश्रमिक की परवाह किए बगैर अपनी सेवा दी और आज उसे भुगतान के लिए दौड़ाया जा रहा है। जिन नाविकों ने आपदा में जीवन संकट से जूझ रहे लोगों को बचाया, आज उनकी जीवन-यापन की नाव खुद मंझधार में है। नाव मालिक तो और परेशान हैं। मजदूर व नाविक उनसे अपना भुगतान मांग रहे हैं जबकि उनका भुगतान उन्हें प्रशासन दे नहीं रहा। ऐसे में, जो नाव मालिक सक्षम हैं उन्होंने तो नाविकों व श्रमिकों का भुगतान कर दिया है लेकिन कुछ नाव मालिक इस इंतजार में हैं कि जब उनका भुगतान होगा तब वे नाविकों व मजदूरों का भुगतान करेंगे। ऐसे में, नाविकों व मजदूरों के सामने तो और भी विषम परिस्थिति है। वहीं, नाव मालिकों की इस दशा का अंचल के अधिकारी व कर्मी लुत्फ उठा रहे हैं।
भुगतान के लिए अंचल कार्यालय पहुंचे मुस्सेपुर के मुखिया मुन्ना कुमार राय ने अपनी पीड़ा कुछ इस तरह व्यक्त की- प्रशासन के कहने पर नेहाल टोला व पुरवारी बलुआ में भाड़े पर नाव लगायी। नाविक शेष राय व रूदल राय उनसे अपना पारिश्रमिक मांग रहे हैं। वर्ष 2008 व 2011 में नावें चली थीं, भुगतान के लिए अब तक चक्कर लगा रहा हूं। किसी तरह मजदूरों का भुगतान तो कर दिया लेकिन नाविकों का भुगतान कहां से करूं? अधिकारियों की मंशा क्या है, यह मेरी समझ से बाहर है...। भुगतान के लिए अंचल कार्यालय का चक्कर लगाना पंचायत प्रतिनिधियों, नाव मालिकों की दिनचर्या में शामिल हो गया है। अंचल कार्यालय में ही बड़हरा महाजी के मुखिया सुदर्शन महतो बिफर पड़े- पहले तो प्रशासन कहता है कि नावों का प्रबंध कीजिए। जब नावों का प्रबंध कर दिए तो अब भुगतान के लिए हाथ-पाव जोड़वाया जा रहा है। यह तो खूब सिला मिल रहा है आपदा के समय राहत कार्य चलाने का..? महाराजगंज के मुखिया रमेश प्रसाद यादव की सुनिए- बाढ़ में जो नावें चली थीं, उसके भुगतान के लिए अंचल कार्यालय का चक्कर काटते-काटते थक गया मैं तो। इधर नाविकों व मजदूरों की स्थिति नहीं देखी गयी तो अपनी जेब से उनका भुगतान किया। अब तो मैंने संतोष-सा कर लिया है कि चाहे तो प्रशासन भुगतान दे या नहीं। लेकिन, ऐसी ही स्थिति रही तो आगे से विपदा के समय नाविकों व मजदूरों की मदद न तो मुझ जैसे लोगों को मिल पाएगी और न ही प्रशासन को। फिर, यदि विपदा के समय प्रशासन ने मुझसे नावों के लिए कहा तो मेरे पास भी वैसी ही लाचारगी होगी, जैसी कि अभी भुगतान के लिए अंचल के अधिकारी दिखा रहे हैं। बाढ़ में राहत कार्य व घटना के समय शव खोजने में अपनी नाव, मांझी व मजदूर देने वाले चिरांद के नाव मालिक भी अगस्त 2011 से अंचल आने-जाने को दिनचर्या मान चुके हैं, मगर भुगतान आज तक लंबित है।
तीन वर्षों बाद भी भुगतान नहीं हो पाने के पीछे अंचलाधिकारी रघुनाथ तिवारी, सीआई अभय कुमार व तत्कालीन अंचल कर्मी हरेन्द्र साह की लापरवाही को जिम्मेदार मान रहे हैं नाव मालिक। सीआई अभय कुमार जो बाढ़ के समय चलाये जा रहे बचाव कार्य के दौरान मौके पर उपस्थित भी देखे गए थे, से जब यह पूछा गया कि कितनी नावों का भुगतान लंबित है तो वे यह भी ठीक-ठीक नहीं बता सके। इससे स्थिति का आकलन किया जा सकता है। सीओ से लेकर सीआई तक लापरवाही की पराकाष्ठा यह कि सदर अनुमंडलाधिकारी विनय कुमार पांडेय भी भुगतान के लिए कई बार निर्देशित कर चुके हैं, लेकिन कर्तव्यहीनता की रोज नई कथा लिख रहे हैं ये दोनों अधिकारी और पिस रहे हैं नाव मालिक। बहरहाल, यदि जिले के वरीय अधिकारियों ने अब भी हस्तक्षेप न किया तो आगे से विपदा के समय नाव मालिकों से वे किस मुंह से बचाव व राहत कार्य में मदद लेंगे, यह तो वे ही जानें।

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