हम भी भक्त है, हाँ, तुम बड़े वाले हो!
कन्हैया जेल से सबका उद्धार करने आया है। खास बात यह कि अब वो पहले वाला नौसिखुआ टाइप नेता नहीं रहा। परिपक्व हो गया है। जेल की हवा ही ऐसी है शायद, नेताओं को तो एक बार राजनीति चमकाने के लिए जाना ही पड़ता है। और कन्हैया का क्या कहना, ये तो शुरुआत ही वही से कर रहा है। अब उसके बोल बदल गए है, अंदाज-ए-बयां भी जुदा है। बहुत अच्छी पढ़ाई होती है जेएनयू में लेकिन जेल की तो हवा ही काफी है उसके एक स्टूडेंट को देश का 'उद्धारक' और नेता बनाने के लिए। देश विरोधी नारे लगाकर वह 'क्रांतिकारी' तो पहले ही बन गया था, अब देश का 'पुरोधा' बनेगा। और कहना ही क्या, रोहित वेमुला को गुरु बनाकर दलित कार्ड भी खेल दिया उसने। जेल में एक देश द्रोही गया था, बाहर एक 'नेता' आया है। और उसका जय बोलने वे सारे सामने आ गए हैं, जो भक्त शब्द से डरते हैं। उन्हें भक्त में बंधन दिखता है, ये बंधन तोड़कर मुक्त होना चाहते हैं। लेकिन, ये तो उन्हें भी नहीं पता कि वे तब भी भक्त ही हैं, रहेंगे, देश का भक्त न होकर कन्हैया जैसों के भक्त होंगे। नारे वे तब भी लगाएंगे, भारत माता की जय नहीं कहेंगे, रोहित वेमुला जिंदाबाद कहेंगे। ये मुक्त होने के चक्कर में कटी पतंग की तरह उड़ेंगे और गिरेंगे भी, लेकिन उसके पहले एक बार उड़ेंगे, एक बड़ी उड़ान। उड़ रहे हैं, उड़ने दो इन्हें क्योंकि जितना ऊपर उड़ेंगे, गिरने पर चोट उतनी ही गहरी लगेगी। और गिरना तो इन्हें है ही, इनकी पतंग की डोर देश से कट चुकी है। हाँ, ये तब भी देश के आकाश में ही उड़ेंगे, कहीं और उड़े तो मारकर किसी ड्रोन की तरह गिरा दिए जाएंगे। ये उसी देश में रहेंगे, उसी देश के के आकाश में उड़ेंगे, जिसके मुर्दाबाद के नारे लगाकर शोहरत बटोरने में लगे हैं। आखिर ये भी इसी माँ के लाल हैं, इसी देश में पैदा हुए हैं। गलती से ही सही। जैसा कि कन्हैया ने कहा कि वो गलती से पैदा हो गया...। तो उड़ने दो इन्हें, इसी आकाश में ताकि गिरें भी इसी जमीं पर। तो उड़ने दो इन्हें, बहुत ऊपर तक, बहुत नीचे गिरने के लिए।
देश की जय बोलने वाले सारे लोग 'भक्त' साबित कर दिए गए हैं, ऐसे में जो इस कतार से बाहर रहना चाहते हैं उन्हें कन्हैया के झंडे तले आना ही है। देश की व्यवस्था से संतुष्ट कौन है? हम भी नहीं हैं। हम व्यवस्था बदलना चाहते हैं, लेकिन देश तो यही है, यही रहेगा। हम व्यवस्था से असंतुष्ट है, तुम देश से ही हो। हम देश के लिए व्यवस्था से लड़ रहे हैं, तुम देश से ही लड़ रहे हो, बता नहीं पाओगे किसके लिए। देश के लिए लड़ना और देश से लड़ना दोनों बहुत अलग है। बहुत अंतर है। तुम भी जानते हो, समझते हो पर तुम अलग दिखना चाहते हो, भीड़ से अलग चलने की कोशिश में हो। जल्दी इतनी है कि भेड़िया धसान हो गया है। एक तरफ मुंह कर चल दिए हो, देखे बिना की जा कहाँ रहे। हम तुम दोनों इसी देश में रहते हैं, रहना भी है। हम इस देश को छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहते, तुम जा नहीं सकते। क्योंकि जिस किसी भी देश में रहोगे, उस देश का होकर तो रहना ही पड़ेगा। और ये तुम्हें गंवारा नहीं, गंवार कहलाने लगोगे। तुम इस देश से ही संतुष्ट नहीं हो लेकिन यहीं हो, हमारे साथ। यकीनन, साथ रहते हो हमारे, लेकिन साथ रहकर भी हम, तुम नहीं हो सकते क्योंकि हम अपने देश से संतुष्ट हैं और उसकी जय भी बोलेंगे। तुम देश को मुर्दाबाद कहकर क्रांतिकारी कहलाओ, हम जिंदाबाद कहकर भक्त कहलाना पसंद करेंगे। तुम लहराओ पाकिस्तान के झंडे, हम तिरंगे से संतुष्ट हैं। तुम पाक जिंदाबाद कहो, हम भारत माता की जय कहते हुए कभी नहीं थकेंगे। तुम अफजल को गुरु बनाओ, हम अपने भारत को गुरु बनाएंगे। कह सकते हो कि गुरु तो युगों से बना रहे हो, बना पाए क्या? तो भाई मेरे भारत को गुरु बनाना अफजल को गुरु बनाना नहीं है...। खैर, तुम भी भक्त हो चुके हो किसी के, इसलिए तुमसे क्या कहें, तुम हमारी क्यों सुनोगे। बस आओ मिलकर जयकारा लगाते हैं। तुम उसकी लगाओ जिसमें खुद को देखते हो या देखना पसंद करते हो। हम उसकी जय बोलेंगे, जिसकी जय बोलते आए हैं, तबसे जब बोलना भी नहीं सिखा था। और हाँ, ये न कहना कि तुम भक्त नहीं हो। भक्त न कहलाने की चाहत में तुम हमसे बड़े भक्त हो, बल्कि अंधभक्त हो। तो बोलो ना जय। खुलकर बोलो।

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