कौन नारंग? वो तो हिन्दू था न?
#डॉ_नारंग तो देश के नागरिक थे और पेशे से एक #डॉक्टर, हत्या के बाद वे सिर्फ#हिन्दू रह गए हैं। इसके लिए सिर्फ उन्हें दोष देना गलत है जिन्होंने नारंग को हिन्दू बनाया है। #अफजल को आतंकवादी से #मुसलमान और #रोहित_वेमुला को एक छात्र से #दलित बनाने वाले कहाँ हैं? ऐसी घटिया और घातक सोच रखने वाले अचानक संत की भूमिका में आ गए हैं, लेकिन ठीक से देखें तो दोगलेपन की शुरुआत तो वहीं से इन्हीं नेताओं ने की थी।
हर आतंकी को मुस्लिम बताकर #वोट_बैंक के लिए उनका बचाव करने का प्रचलन सा चल पड़ा। मेनन, अफजल जैसे आतंकियों को गुरु बनाने वाले #क्रान्तिकारी कहे जाने लगे। आतंकी घटनाओं के समय ये कहा जाता रहा कि #आतंक की कोई जात नहीं होती, किसी #धर्म_विशेष को बदनाम न करें। लेकिन, यही लोग किसी आतंकी की सजा पर उसे मुस्लिम और किसी छात्र की आत्महत्या को दलित की हत्या बताकर घड़ियाली आंसू बहाने लगे। जरा ठीक से देखें तो ऐसे ही लोग हर मुस्लिम को अपने मतलब के लिए आतंकी भी साबित करते गए। क्योंकि ये हर बार किसी आतंकी का बचाव सिर्फ मुस्लिम कहकर करते गए। यूनिवर्सिटी में गाय मांस की पार्टी देने और आतंकियों के समर्थन में नारे को अभिव्यक्ति की आज़ादी बताते रहे। बाद में उन्हें कामरेड और दलित बना दिया। ये सब वही कर रहे हैं, करते आ रहे हैं और यदि आज एक नागरिक की हत्या के बाद वह सिर्फ हिन्दू रह गया है तो इसके लिए भी सबसे अधिक जिम्मेदार वही हैं।
याद रखिए, जब आग लगाई जाती है तो उसमें सिर्फ वही नहीं जलते, जिनके लिए लगाई जाती है, वे भी जल जाते हैं, जो आस पास होते हैं। इस आग की चपेट में अब सब आ चुके हैं, क्या हिन्दू, क्या मुस्लिम, क्या सवर्ण, क्या दलित। और इसके लिए सबसे अधिक दोषी जाति, धर्म की राजनीति करने वाले नेता और उसके नाम पर वोट देने वाली जनता है।
हम सब एक देश में रहते हैं, और देश में संविधान, कानून व्यवस्था में हमारी सिर्फ यही पहचान होनी चाहिए। जब देश के नेता, सरकार, कानून और यहां तक कि संविधान भी हिन्दू, मुस्लिम, ब्राह्मण, दलित के रूप में हमें जानने-पहचानने लगे तो इस माहौल पर आश्चर्य कैसा? देश में एक दलित को थप्पड़ मारना गैर जमानतीय, और सवर्ण को थप्पड़ मारना आई-गई बात? कानून है या कोई मजाक? किसानों की आत्महत्या पर कोई बहस नहीं, एक दलित की आत्महत्या देश का सबसे बड़ा इशू है? रेपिस्ट और हत्यारे धनञ्जय की फांसी न्याय है, (है भी) और सैकड़ों लाशें बिछाने वाले याकूब, अफजल पर जुल्म है? हत्या की सूचना पर मौके पर तत्काल पहुँचना पुलिस को नहीं आता, लेकिन हिन्दू-मुस्लिम विवाद की अफवाह पर डीएम साहब खुद पहुँच जाते हैं? (यही कारण है कि जब कोई पिटाई भी कर दे तो पुलिस को सूचना अक्सर लूट की मिलती है।
आपसी विवाद में भी साम्प्रदायिक विवाद की अफवाह फैलती है। यह सब कानून व्यवस्था का ध्यान खींचने के लिए होता है जो आम मामलों पर अपने कान बंद कर रखी है।) लखनऊ में यूनिवर्सिटी की प्रताड़ना के बाद ब्राह्मण छात्र की आत्महत्या पर कोई चर्चा नहीं होती, जेएनयू में देश विरोधी नारे का समर्थन करते राहुल गांधी पहुंच जाते हैं? कश्मीर में ब्राह्मणों का पलायन, उनकी हत्या पर कभी सोचते नहीं, और जाति, धर्म के नाम पर दूसरों को मुफ़्त में जमीन देकर घर बनवाते हैं? अरे जब सबकुछ जाति, धर्म के नाम पर ही हो रहा है तो फिर एक हत्यारे में यदि मुस्लिम और पीड़ित में हिन्दू देखा जा रहा है तो आश्चर्य क्यों? ऐसा ही चलता रहा तो जब भी किसी की हत्या होगी, मृतक को हिन्दू, मुस्लिम, ब्राह्मण, दलित की नजर से देखा जाएगा और दूसरे जाति, धर्म में उसके हत्यारे ढूंढे जाएंगे। और ऐसे माहौल के लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं, आप-हम सब जानते हैं।
देश में रोज कितनों की हत्या, आत्महत्या होती है लेकिन सन्नाटा नहीं टूटता। नेता सिर्फ तब सुनते हैं जब किसी धर्म, जाति विशेष के साथ कोई वारदात हो। क्या ऐसा नहीं लगता कि नेताओं की इस सोच ने जनता की सोच बदल दी है? जिसको भी न्याय पाना है, सिर्फ नागरिक के रूप में मिल पाना आसान नहीं, उसके लिए किसी धर्म, जाति का होना होगा? क्या दिल्ली में एक मामूली डॉक्टर की हत्या कभी इतनी बड़ी सनसनी बन पाती, जितनी बड़ी एक हिन्दू की हत्या है? क्या इतनी तादाद में लोग उसे न्याय दिलाने के लिए खड़े होते, जितने कि अभी हैं? क्या इसके लिए सिर्फ वो लोग दोषी हैं, जो डॉक्टर को हिन्दू और हत्यारों को मुसलमान बता रहे हैं? क्या वो दोषी नहीं जो इसके पहले हर हत्या को मुस्लिम, दलित के रूप में देखते रहे हैं? क्या सबको इसी नजर से देखने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा? यदि एक नागरिक या डॉक्टर सिर्फ हिन्दू बनकर रह गया है तो इस माहौल के लिए कौन दोषी है? बताइए।

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