'जैसा दाम, वैसा काम' शिक्षकों के साथ क्यों नहीं?

यह अजीब बात दिखती है, जो हम पता नहीं कब से देख रहे हैं और हमें कब तक देखना पड़ेगा। सरकारें बदलती हैं, उनके बोल बदलते हैं, नहीं बदलती तो शिक्षा की दशा। अब तो व्यक्ति से राष्ट्रहित को ऊपर बताने वाला एक स्वयंसेवक देश का प्रधानमंत्री है, हैरत है, तब भी वही सब देखने को मिल रहा है। वही किताबी बातें, बिल्कुल वही खोखला भाषण, सिर्फ भाषण और थोड़ा-बहुत जो प्रयास, वह भी हमेशा की तरह गलत दिशा में। यह विडंबना है किंतु गजब की समानता है कि देश के प्रधानमंत्री, राज्यों के मुख्यमंत्री, और प्राय: हर नेता इस संबंध में एक-सी सोच रखता है और आचरण भी एक जैसा करता है। यूपी हो या बिहार, या फिर देश का कोई और राज्य, बातें शिक्षा की दशा सुधारने के लिए होती हैं तो शिक्षकों की दुर्दशा उसमें शामिल नहीं हो पाती। यकीनन, शिक्षा की दुर्दशा के लिए हमारे शिक्षक बहुत हद तक जिम्मेदार हैं लेकिन उनकी दुर्दशा के लिए? क्या सरकारें अपनी जिम्मेदारी निभाती हैं? प्रधानमंत्रीजी कहते हैं कि हमारा देश विश्व को शिक्षक दे सकता है, लेकिन वे यह नहीं बताते कि देश (सरकार) शिक्षक को क्या दे सकता है? सिर्फ भाषण, आश्वासन, तानें, अनादर...? जिस शिक्षक की दुर्दशा के बारे में कोई नहीं सोचता, वह शिक्षक शिक्षा की दशा के बारे में सोचता रहे, कैसी अपेक्षा है यह? कैसा स्वार्थ है यह? कैसा कंट्रास्ट है? संभव है यह?
बिहार के एक शिक्षक का कल फेसबुक स्टेटस अजीब लगा। लिखा था कि 30 और 31 मार्च को सभी साथी शिक्षक पॉकेट में मिर्चा पाउडर लेकर चलें, नीतीश सरकार में यदि लाठियां बरसाईं गईं तो उसका जवाब दिया जाएगा। दरअसल, बिहार सरकार का हक की मांग कर रहे शिक्षकों पर लाठियां बरसवाना, उन्हें सही वेतन देने से कहीं मुफीद जान पड़ता है। शिक्षकों पर लाठियां बरसवाने का सरकार का लम्बा अनुभव रहा है, इसलिए ही शायद उस शिक्षक ने सरकार से इसी तरह की अपेक्षा करते हुए बचाव में मिर्चा पाउडर पॉकेट में लेकर चलने का आह्वान किया होगा। चारों तरफ अजीब दृश्य नजर आ रहे हैं। बिहार में छपरा स्थित जयप्रकाश विश्वविद्यालय में हक के लिए हड़ताल चल रहा है। यूपी में शिक्षकों ने बोर्ड की कॉपियां जांचने से इनकार कर दिया है और धरने पर हैं। ऐसी स्थितियों के लिए क्या हम शिक्षकों को दोष दें? इस जगत में क्या शिक्षक ही सबसे कम स्कील्ड (अपने प्रधानमंत्रीजी की बात है) जान पड़ते हैं जो उनकी तनख्वाह देते समय सरकारों के खजाने खाली दिखाए जाने लगते हैं और हाथ तंग हो जाते हैं? हर साल लाखों से करोड़ों-अरबों तक के घोटाले कर लिए जाने के बाद अगले साल फिर ऐसे घोटाले जारी रहते हैं, खजाने तब खाली नहीं होते, काम लेकर वेतन दिए जाने के वक्त यह खजाने खाली हो जाते हैं? कांट्रैक्ट पर शिक्षक बहाल किए जाते हैं कि उन्हें वेतन न देना पड़े, मानदेय से काम चल जाए। देश की न्यायपालिका चीखती रहती है कि जब पद रिक्त है तो ठेकेदारी क्यों करते हो? नियुक्तियां क्यों नहीं करते? सरकारें अपने खाली खजाने का रोना रो लेती हैं शिक्षा पर ठेकेदारी चलती रहती है।
अजीब हालात है कि मंचों से सरकार में शामिल नेता शिक्षकों के सम्मान की बात करते हैं, समाज उनकी गरिमा की चिंता में ऐसा हो गया लगता है जैसे आजकल सो ही नहीं रहा हो, लेकिन, सार्वजनिक तौर पर अपने हक के लिए लोकतांत्रिक ढंग से धरना-प्रदर्शन करने वाले शिक्षकों पर यही सरकारें लाठियां बरसवाती हैं और यही समाज अपने मुंह पर ताले जड़ लेता है। किसी एक शिक्षक की चोरी भी सुर्खियां बन जाती है, उसके घर जब चूल्हे नहीं जलते तो कोई शोर नहीं होता। इस अर्थजगत में सिर्फ खोखले सम्मान की जरूरत शिक्षकों को नहीं है, उन्हें सम्मानजनक वेतन चाहिए जिससे कि वह अपना, अपने परिवार को सम्मानजनक जीवन दे सकें। एक मजदूर की न्यूनतम मजदूरी तय कर दी गई है, शिक्षकों के संबंध में घोर चुप्पी साध रखी है सरकार और समाज ने। शिक्षकों की सेवा का मूल्य समझकर, उन्हें देने के लिए तैयार रहना चाहिए। हम सब, चाहें जिस क्षेत्र में भी काम करते हैं, काम करते-करते एकाध बार कह ही देते हैं कि जैसा दाम, वैसा काम। शिक्षकों को इस नजर से क्यों नहीं देखते? जैसा मूल्य दोगे, वैसी सेवा मिलेगी। हमें अच्छी शिक्षा चाहिए तो शिक्षकों को अच्छा वेतन चाहिए। इस दिशा में हमें सोचना ही होगा। 

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