हैरान न हों, यह रोग पुराना है

बिहार में हो रही बोर्ड परीक्षा की तस्वीरें राष्ट्रीय मीडिया में आने के बाद लोग हैरान हैं। नकल के लिए भी यदि वर्ल्ड रिकॉर्ड दर्ज किए जाते तो बिहार के लिए काफी गुंजाइश बन जाती।
खैर, न तो इस खबर ने और न ही तस्वीर ने हमें चौकाया। इनसे एक दशक तक मेरा वास्ता होता रहा है। और, यह भी गौरतलब है कि परीक्षा में नकल के यह दृश्य लालू के कथित जंगल राज से नहीं प्रकट हुए हैं, यह नीतीश के कथित सुशासन के दृश्य हैं। बिहार की शिक्षा लगातार रसातल में जा रही है और इसके कारणों पर चर्चा तक के लिए उस प्रदेश में किसी को फुरसत नहीं। उस राज्य में छात्र भविष्य नहीं समझे जा रहे, शिक्षक राष्ट्र निर्माता नहीं माने जा रहे, छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों को सिर्फ वोट बैंक के नजरिए से देखा जा रहा है। सरकारी विद्यालयों में योजनाओं की भरमार है, प्रधानाचार्य ठेकेदार की शक्ल में हैं तो शिक्षक लेखा-जोखा करने में ही परेशान हैं। कांट्रैक्ट पर शिक्षक बहाल किए जा रहे हैं और फिर उन्हें नियमित करने का प्रलोभन दिया जा रहा है। एक ही बार नियमित नियुक्ति क्यों नहीं करते, जबकि पद रिक्त पड़े हुए हैं? इन नियुक्तियों के लिए भी रिश्वतखोरी की एक अलग कथा है। मार्क्स के आधार पर नौकरी दिए जाने के कारण अभिभावक और छात्र दोनों ही इसलिए मर रहे हैं कि किसी तरह अधिक से अधिक मार्क्स आ जाए। सेंटरों पर परीक्षा को कदाचारमुक्त कराने के लिए वीक्षक की भूमिका में तैनात शिक्षक, नौकरी के दौरान 'इन्वेस्ट' किए अपने रुपए ब्याज के साथ वसूल कर रहे हैं। सिपाही 10-10 के नोटों पर पुर्जियां पहुंचा रहे हैं। उनकी कमाई के लिए होली-दिवाली के अलावा यह एक अलग सीजन चल रहा है। अभिभावक को भी बेटे-बेटियों के लिए नौकरियां चाहिए और बिहार सरकार को नौकरियों के लिए बस मेधा अंक चाहिए, सो वे नकल की पुर्जियां पहुंचाने के लिए रुपए खर्च कर रहे हैं, खिड़कियों पर लटक जा रहे हैं, दीवारों पर रेंग रहे हैं, हर तरह का रिस्क ले रहे हैं। मुझे याद हैं, जब हम छपरा में थे, उस समय मैट्रिक की परीक्षा में नकल कराने एक लड़की के पिता छत पर चढ़ गए थे और अफरातफरी में नीचे गिरकर उनकी मौत हो गई थी। बिहार की बोर्ड परीक्षा में ऐसे मातम वाले दृश्य भी हमने देखे।
बिहार में नकल का रोग अब नासूर बन चुका है और इसके कारणों में छात्र, अभिभावक, समाज, शिक्षक, पुलिस, सरकार सबकी अलग-अलग भूमिका है। उपचार के लिए दवा भी कहीं और से नहीं आएगी, इन्हीं सबको मिलकर ढूंढना होगा।   

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