अपनी हद न भूले आदमी, खुदा न बने आदमी...!
फिल्म शोले में रामगढ़ वालों ने जितना खौफ गब्बर का माना था, वास्तविक जीवन में उससे थोड़ा भी कम डर शहाबुद्दीन का सिवान वालों ने भी नहीं माना। एके-47, 56 जैसे अत्याधुनिक हथियार और शूटरों की बड़ी फौज की बदौलत लंबे अर्से तक सिवान में किसी तानाशाह की तरह मो. शहाबुद्दीन राज करते रहे। बिहार में जंगल राज का प्रतिनिधित्व शहाबुद्दीन जैसे लोग ही करते रहे। अधिकारियों के जनता दरबार तो बहुत बाद में लगने शुरू हुए, तब सिवान में सिर्फ शहाबु का ही दरबार लगता था और उस दरबार में प्रशासन, पुलिस के अधिकारियों तक की हाजिरी लगती थी, आम आदमी की औकात ही क्या?
एक उच्चके से शहाबु धीरे—धीरे सिवान में खौफ का दूसरा नाम बन गए। एक दौर तो वह भी आया जब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के सिवान को शहाबु का सिवान कहा जाने लगा था...। तब शहाबु के नाम से सिवान में सुबह और शाम तय हुआ करती थी कि वह खूनी होगी या खुशनुमा। डॉक्टर अपनी क्लीनिक में बैठकर इलाज करता था लेकिन उसकी फीस तक शहाबुद्दीन तय करते थे। पत्रकार, अधिकारी कोई भी हो, सिवान में पोस्टिंग नहीं चाहता था। व्यापारी, डॉक्टर और संभ्रांत लोग डर से सिवान से पलायित करने लगे थे। सिवान दूसरा कश्मीर बनने की तरफ बढ़ रहा था...। लेकिन, जातिगत समीकरण के कारण न तो बिहार में और न ही उसके बाहर राजनीतिक गलियारों में, शहाबु का खुलकर विरोध करने की किसी की हिम्मत हुई। इस कारण शहाबु का दुस्साहस बढ़ता ही चला गया। ईश्वर ने जिसकी तकदीर में जो लिखा हो, यह शख्स अपनी मर्जी से लोगों की तकदीर के पन्ने फाड़ता और लिखता रहा...।
... आज उस शहाबुद्दीन की भी तकदीर लिख ही दी गई। शहाबु की कहानी एक सीख है उन लोगों के लिए जो अपराध के बाद सत्ता की राह पकड़ समझ बैठते हैं कि अब उनके सारे गुनाह माफ कर दिए गए। शक्ति आते ही खुद को इंसान से ज्यादा समझ बैठते हैं। यह अहंकार एक दिन उस मुकाम पर ला खड़ा कर देता है कि इंसान, खुदा तो क्या इंसान भी नहीं रह जाता। इसलिए, आदमी को कभी अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिए। चाहे कितनी भी शक्ति हाथ में आ जाए, उसे फैसले आदमी वाले ही लेने चाहिए, खुदा वाले नहीं।
... आज उस शहाबुद्दीन की भी तकदीर लिख ही दी गई। शहाबु की कहानी एक सीख है उन लोगों के लिए जो अपराध के बाद सत्ता की राह पकड़ समझ बैठते हैं कि अब उनके सारे गुनाह माफ कर दिए गए। शक्ति आते ही खुद को इंसान से ज्यादा समझ बैठते हैं। यह अहंकार एक दिन उस मुकाम पर ला खड़ा कर देता है कि इंसान, खुदा तो क्या इंसान भी नहीं रह जाता। इसलिए, आदमी को कभी अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिए। चाहे कितनी भी शक्ति हाथ में आ जाए, उसे फैसले आदमी वाले ही लेने चाहिए, खुदा वाले नहीं।

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