आंखों देखी! पंचायत चुनाव के पहले की एक रात।


कल रात दिवाली के बाद फिर मां लक्ष्मी सबके घर आईं थी. इस बार किसी को उनकी प्रतीक्षा नहीं थी, लेकिन उन्होंने किसी को निराश भी नहीं किया. आधी रात सबके दरवाजे पर चुपके से दस्तक दीं. नींद से जगाया और हर मुराद पूरी कर गईं. बिना किसी शोर के ख्वाहिशों के पटाखे फूटते रहे, घी के दीये जलते रहे और रात के सन्नाटे में एक 'दिवाली' हर गांव में मनती रही. यह रात क्या गुजरी, आज सुबह तक पंचायत चुनाव के सारे समीकरण पलट चुके थे.
यूं तो वोटरों की हर रात और दिन को खुशनुमा बनाने की कोशिश लगातार होती रही लेकिन मंगल की रात को वोटरों के लिए सबसे अधिक मंगलमय बनाने वाला ही बुधवार यानी आज का गुरु साबित होगा!

रखवाली, सेंधमारी साथ-साथ
कल शाम से ही गांवों ने कोहरे की चादर ओढ़ रखी थी. इसके बीच गर्म चादर ओढ़े प्रत्याशी, समर्थक रातभर अपनी जीत पक्की करने में लगे रहे. अपने वोटों की रखवाली के साथ दूसरे के वोटों में सेंधमारी होती रही. घने कोहरे के बीच रात में हल्की-सी हवा भी देह को छू ले तो सिहरन दौड़ जाती थी लेकिन, मजाल कि यह ठंड इन्हें लग जाए? इसी ठंड के बीच प्रत्याशी, समर्थकों की पूरी रात गांव की गलियों में गुजर गई.

वोटिंग के पहले होती रही काउंटिंग
आज को होने वाली वोटिंग के पहले ही कल प्रत्याशियों और उनके लोगों की जुबान पर एक-एक वोट की काउंटिंग हो चुकी थी. कल रात से आज सुबह तक हर वोट पर 'चोट' की गई. अब तक बचे हर तरीके आजमाए गए. आधा गांव सोता रहा, आधा गांव जगता रहा. प्रत्याशी और उनके लोगों की नींद तो गायब थी ही, उनके घरों की बत्तियां भी नहीं बुझी. एक पंचायत से कई-कई प्रत्याशी और सभी की एक ही चाहत, बस किसी तरह जीत जाएं. इस चाहत को पूरी करने के लिए हर एक की चाहत पूरी की जाती रही.

पिक की 'पिकनिक'
वोटरलिस्ट में मौजूद लगभग हर नाम सुबह तक गांव में मौजूद हो गया था. रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड तक प्रत्याशियों की गाडिय़ां दौड़ती रहीं. परदेस में रहने वाले वोटर पिक किए जाते रहे. रास्ते में उनके चाय-नाश्ते की भी व्यवस्था थी. वोटरों के अपने घर पहुंचने से पहले प्रत्याशी अपने 'आतिथ्य' से उन्हें खुश कर चुके होते थे. आज सुबह एक बार फिर गिनती होती रही. कौन आया, कौन नहीं, क्यों नहीं? अंत-अंत तक वोटरलिस्ट में नाम मार्क किए जाते रहे, बचे हर नाम पर कॉल जाती रही.

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