दिल्ली चुनाव परिणाम के बहाने



दिल्ली में आप की ऐतिहासिक जीत हुई है। वहां आप की सरकार बनने जा रही है, इसमें रंच मात्र भी संदेह नहीं। भाजपा बुरी तरह हार चुकी है, बाकी पार्टियां तो शुरू से ही इस लड़ाई में नहीं मानी जा रही थी। बहरहाल, यह खबर सुबह से लेकर अब तक लाखों-करोड़ों दफा दुहरायी जा चुकी है और परिणाम पूरी तरह देश के सामने आ चुका है।
दिल्ली हमेशा से देश को संबोधित करने का माध्यम रही है। चुनाव परिणाम के माध्यम से भी दिल्ली ने देश को संबोधित किया है, उसे अपना संदेश दिया है। इस संदेश से किसी की भी सेहत पर फर्क पड़ सकता है, इसलिए इसे समझना, सुनना और तदनुसार अमल करना सभी राजनीतिक दलों के लिए आवश्यक है, बल्कि मजबूरी बन चुकी है। दिल्ली ने जो कुछ कहा है, वह है तो सबके लिए लेकिन चूंकि बिहार में आने वाले सात-आठ महीनों में ही विधानसभा चुनाव होना है, इसलिए उसे इस संदेश को सबसे पहले समझ लेना होगा।
कुछ बातों को छोड़ दें तो बिहार में दिल्ली वाली सारी चुनौतियां मौजूद हैं, जो दिल्ली में भाजपा की हार का कारण बनीं। भाजपा को दिल्ली में अपने नेता पर भरोसा नहीं था और इसलिए उसने किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। भरोसा शब्द हम इसलिए कह रहे हैं कि इसके पहले भी दिल्ली में चुनाव हुए थे, भाजपा जीती थी, जाहिर है  दिल्ली में पार्टी में नेताओं की ऐसी भी कमी नहीं पड़ गई थी कि बाहर से बुलाकर किसी को ताज सौंपने की तैयारी कर ली जाए। ऐसे फैसलों के दो परिणाम तत्काल होते हैं- पहला, नेताओं-कार्यकर्ताओं का मनोबल घटता है। दूसरा, जनता ऐसे निर्णयों को शक की दृष्टि से देखती है सत्ता-लालच में लिया गया निर्णय मानती है। पहले परिणाम के तहत जब कार्यकर्ताओं का मनोबल तो घटना ही है शीर्ष नेतृत्व पर उनका भरोसा भी खत्म होता है और वे अपने भविष्य के लिए आशंकित हो जाते हैं। भविष्य की आशंका भी हम इसलिए कह रहे हैं कि अर्थ जगत में हर कार्यकर्ता, हर व्यक्ति सिर्फ सेवा के लिए पार्टी से नहीं जुड़ता। उसके भी अपने सपने होते हैं। उसकी इच्छा-महात्वाकांक्षा होती है और उसी की पूर्ति के लिए वह लगातार प्रयास करता है लेकिन जब उसके सपनों को कोई चोंट पहुंचाता है तो उसके पूरी होने की उम्मीद कम होती जाती है और फलत: उसके प्रयास में भी स्वाभाविक रूप से कमी आ जाती है- ठीक, कंपनियों में नौकरी कर रहे युवाओं की तरह। यह ध्यान देने वाली बात है कि कोरे सपने सिर्फ रात के अंधेरे में बेचे जा सकते हैं, दिन के उजाले में उसका सच नजर आ जाता है और जब खुली आंखों से सच दिखता है तो बंद आंखों से रात के अंधेरे में देखे-दिखाए सपनों से भरोसा उठ जाता है। भरोसा उठता है अपने शीर्ष नेतृत्व पर से कार्यकर्ताओं का और राजनीतिक दलों- नेताओं से जनता का।
दिल्ली के परिणामों से जान-बुझकर अब तक बेखबर बन रही भाजपा बिहार में भी कुछ इसी प्रयोग के मूड में दिख रही थी। बिहार भाजपा में नेताओं की कोई कमी नहीं, लेकिन हाल के दिनों में जदयू के बागी जीतन राम मांझी को पार्टी शह देती नजर आई।  इसमें कोई संदेश नहीं कि बिहार में जो ड्रामा चल रहा है, उसमें भाजपा की पूरी भूमिका है और वह यह सब महज मनोरंजन के लिए नहीं कर रही थी बल्कि एक योजना के तहत आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर उसकी नई चाल थी। गौर करें कि जब भी ऐसे ड्रामे होते हैं, कार्यकर्ताओं का मन विचलित होता है। पूरे ड्रामे के दौरान कार्यकर्ता एकाग्र नहीं होते और तरह-तरह की संभावनाएं-आशंकाएं उनके मन को उत्साहित-निरुत्साहित करती रहती हैं। जनता भी बस तमाशे नहीं देखा करती, समीक्षा करना उसे भी आता है। 'वेट एंड वाच' की भूमिका में उसे रहना अब पसंद नहीं रहा। इन सबसे अनजान जब पार्टी नेतृत्व निर्णय लेता है, तो परिणाम चौंकाने वाले ही होते हैं। आश्चर्य इस बात का कि सबक फिर भी नहीं लिए जाते। कहा नहीं जा सकता कि बिहार में भाजपा कुछ ऐसा निर्णय नहीं लेगी लेकिन दिल्ली की आवाज पर कान दी जाए तो उसे ऐसा नहीं करना चाहिए।
बिहार में विधानसभा उप-चुनाव हुए थे। उस समय हम छपरा में थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक स्वयंसेवक डॉ. सीएन गुप्ता को पार्टी की ओर से टिकट दिए जाने का संकेत मिला और उन्होंने तैयारियां शुरू कर दी। लोगों से चंदे लिए, कर्ज लिए, बैंक से अपने रुपए निकाले- पता नहीं कितने-कितने जतन किए। नामांकन की अंतिम तारीख नजदीक आती जा रही थी लेकिन भाजपा उनके नाम की घोषणा नहीं कर रही थी। हालांकि, इस दौरान आम लोगों के साथ भाजपा के कार्यकर्ता भी यह मान चुके थे कि वही भाजपा की ओर से प्रत्याशी होंगे। जनसम्पर्क होने लगा, आरएसएस के साथ-साथ भाजपा कार्यकर्ता साथ हो लिए थे। इसी बीच, राजद ने महाराजगंज के पूर्व सांसद प्रभुनाथ सिंह के बेटे रणधीर को मैदान में उतार दिया। जातिगत रूप से छपरा में राजपूत और यादवों की संख्या अधिक है जबकि सी.एन. गुप्ता वैश्य समुदाय से आते हैं। राजपूत वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए भाजपा ने मतगणना तिथि खत्म होने के एक-दो दिन ही पूर्व डॉ. सीएन गुप्ता की जगह एक नये चेहरे कन्हैया सिंह के नाम की घोषणा कर दी। कार्यकर्ताओं ने सतही तौर पर निर्णय का बहिष्कार कर दिया। आरएसएस के स्वयंसेवकों ने तो खुलकर डॉ. सीएन गुप्ता को समर्थन दिया और उन्हें निर्दलीय लड़ा दिया। वे जीते तो नहीं लेकिन हारे भी नहीं। उन्होंने भाजपा के आधे वोट ले लिए और भाजपा बुरी तरह से हारी, जबकि उस समय मोदी मैजिक पूरी तरह हावी था। अभी तो जादू का असर भी वैसा नहीं है।
बिहार में भी भाजपा को अपने नेताओं पर भरोसा नहीं। कोढ़ में खाज यह कि सचमुच बिहार भाजपा में इस समय कोई सर्वमान्य नेता नहीं है। भाजपा-जदयू सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे सुशील कुमार मोदी पर कार्यकर्ताओं में कई फाड़ हैं तो दल के नेताओं के भी अलग-अलग सुर हैं। अधिसंख्य भाजपा समर्थक भी उनके नेतृत्व पर भरोसा करते नजर नहीं आते। फायर ब्रांड समझे जाने वाले गिरिराज सिंह और अश्विनी कुमारी चौबे भाजपा से अधिक आरएसएस के माने जाते हैं और अपने धर्म संबंधी विचारों से विवाद खड़ा करते रहते हैं। शाहनवाज हुसैन और रविशंकर जैसे सुलझे हुए नेताओं पर प्रदेश नेतृत्व चुप ही रहता है। डा. सीपी ठाकुर और उस श्रेणी के नेताओं को रिटायर माना जा चुका है। झारखण्ड में मोदी को सामने रखकर हुए चुनाव के बाद बिहार में भी इसी तरह की संभावनाएं इसीलिए व्यक्त की गई थीं क्योंकि बिहार भाजपा लगातार नेतृत्व संकट से जूझ रही है। अब जब वहां कुछ महीनों में चुनाव होना है तब पार्टी को याद आएगा कि अरे, वहां मुख्यमंत्री के लिए अच्छा दावेदार कौन हो सकता है? यदि वर्तमान स्थिति के मद्देनजर कोई नाम सटीक न लगा तो बाहर से नाम थोप दिए जाएंगे, यह जाने बगैर कि उसका असर सुदूर गांव-गली में काम करने वाले कार्यकर्ताओं पर क्या होगा, समर्थक क्या सोचेंगे। नेतृत्व की जो सोच ऐन चुनाव के वक्त होती है, वह कुछ पहले क्यों नहीं होती? क्यों नहीं पहले ही हर प्रदेश में, विस-लोस क्षेत्र में ऐसे नेता तैयार किए जाते, जिन पर पार्टी भरोसा कर सके और जिन पर जनता भरोसा करती हो? बहुत छोटा उदाहरण होगा लेकिन माफ करें, एक विद्यार्थी भी परीक्षा के महीनों पहले से तैयारियां शुरू कर देता है लेकिन पार्टियां चुनाव के मुहाने पर, एक-दो माह पहले अपने नेता बदल देती हैं।
खैर, जीत-हार के कई कारण होते हैं और इस समय भी हैं। लेकिन, कभी भी पार्टियां अपने नेताओं पर पता नहीं क्यों वह भरोसा नहीं कर पातीं, जो उन्हें करना चाहिए। जो पार्टी अपने ही नेता-कार्यकर्ता की क्षमता नहीं जानती, उसे विकसित करना नहीं जानती, उसका उपयोग नहीं जानती या नहीं कर पाती, उससे यह अपेक्षा क्या की जाए कि वह नागरिकों को जान पाएगी, उसकी जरूरतें महसूस कर पाएंगी, उसके निदान का प्रयास करेगी? इस विषय में सभी पार्टियों को सोचना चाहिए। सिर्फ भाषणों में कार्यकर्ताओं को पार्टी की रीढ़ कह देनेभर से उनका सम्मान नहीं होगा, उन्हें उनका हक देना होगा।   

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