सत्ता चली गांव की ओर...???
सत्ता को गांव अचरज से ही देखते रहे हैं। वह गांवों में तभी दिखती है जब उसके वजूद की बात हो, यानी ऐन चुनाव के समय। सत्ता गांवों तक पहुंचे, यही तो सभी चाहते हैं। गांधीजी का भी यही सपना था। नेताओं के सुविधानुसार सत्ता का केन्द्र हमेशा शहर ही होते हैं, देश या राज्यों की राजधानी। चुनाव के समय शहरी और ग्रामीण वोटर एक जैसे ही दिखते हैं लेकिन उसके बाद उनमें भेद दिखने लगता है पार्टियों को। काश, कि देश की बड़ी आबादी का यह सपना पूरा हो पाता।
उत्तर-प्रदेश में इस समय अखिलेश यादव की युवा सरकार है। गोरखपुर में रोज कई कार्यक्रम होते हैं, जिनका नाम होता है - 'सत्ता चली गांव की ओर'। पहली बार जब यह पढ़ा तो सुखद अनुभूति हुई युवा सरकार की सोच पर, लेकिन सुख का वह लम्हा टिक न सका क्योंकि, इस कार्यक्रम के तहत भी वही होता दिख रहा है, जो चुनावी कार्यक्रमों में होता है। अभियान के नाम पर जनता को घोषणाओं, वादों, दावों की घुट्टी पिलाई जा रही है, इस बात से बेफिक्र की जनता अब यह कड़वा घूंट और न पी सकेगी। पहले देश और अब दिल्ली ने इस बात का प्रमाण तक दे दिया है पर नेताओं को काम करने में मेहनत करनी पड़ती है और घोषणाओं, वादों से काम चलाना आसान लगता है, सो जारी हैं...।
'सत्ता चली गांव की ओर' के नाम से यह जनता को धोखा ही तो दिया जा रहा है क्योंकि, सत्ता के गांव की ओर चलने का मतलब होता है मौके पर ही गांवों की समस्याओं का निदान हो जाए, उन्हें अधिकारियों के चौखट न चूमने पड़े, अपनी समस्या सुनवाने के लिए आत्मदाह की धमकी न देनी पड़ी और न ही इसकी नौबत आए। सत्ता के गांव की ओर चलने का मतलब सु-शासन भी है। पर, क्या ऐसा है? पिछले तीन माह में ही गोरखपुर क्षेत्र में लगातार लोगों को आत्मदाह करते देख रहा हूं। किसी की बात नहीं सुनी गई तो उसने शरीर में आग लगा ली, किसी ने जहर खा लिया, कोई अनशन कर रहा है, धरने पर बैठा है, प्रदर्शन कर रहा है, प्रजा कराह रही है, निजाम अपनी मस्ती में है।
दरअसल, इस कार्यक्रम को तौलने के बाद हमने जाना कि 'सपा चली गांव की ओर' को गलती से 'सत्ता चली गांव की ओर' नाम दे दिया गया है।
उत्तर-प्रदेश में इस समय अखिलेश यादव की युवा सरकार है। गोरखपुर में रोज कई कार्यक्रम होते हैं, जिनका नाम होता है - 'सत्ता चली गांव की ओर'। पहली बार जब यह पढ़ा तो सुखद अनुभूति हुई युवा सरकार की सोच पर, लेकिन सुख का वह लम्हा टिक न सका क्योंकि, इस कार्यक्रम के तहत भी वही होता दिख रहा है, जो चुनावी कार्यक्रमों में होता है। अभियान के नाम पर जनता को घोषणाओं, वादों, दावों की घुट्टी पिलाई जा रही है, इस बात से बेफिक्र की जनता अब यह कड़वा घूंट और न पी सकेगी। पहले देश और अब दिल्ली ने इस बात का प्रमाण तक दे दिया है पर नेताओं को काम करने में मेहनत करनी पड़ती है और घोषणाओं, वादों से काम चलाना आसान लगता है, सो जारी हैं...।
'सत्ता चली गांव की ओर' के नाम से यह जनता को धोखा ही तो दिया जा रहा है क्योंकि, सत्ता के गांव की ओर चलने का मतलब होता है मौके पर ही गांवों की समस्याओं का निदान हो जाए, उन्हें अधिकारियों के चौखट न चूमने पड़े, अपनी समस्या सुनवाने के लिए आत्मदाह की धमकी न देनी पड़ी और न ही इसकी नौबत आए। सत्ता के गांव की ओर चलने का मतलब सु-शासन भी है। पर, क्या ऐसा है? पिछले तीन माह में ही गोरखपुर क्षेत्र में लगातार लोगों को आत्मदाह करते देख रहा हूं। किसी की बात नहीं सुनी गई तो उसने शरीर में आग लगा ली, किसी ने जहर खा लिया, कोई अनशन कर रहा है, धरने पर बैठा है, प्रदर्शन कर रहा है, प्रजा कराह रही है, निजाम अपनी मस्ती में है।
दरअसल, इस कार्यक्रम को तौलने के बाद हमने जाना कि 'सपा चली गांव की ओर' को गलती से 'सत्ता चली गांव की ओर' नाम दे दिया गया है।
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