यहां गोरखपुर में सांड़ हैं, वहां बनारस बदनाम है...

रांड़, सांड़, सीढ़ी, संयासी
इनसे बचे तो सेवै काशी।
इन पंक्तियों में बनारस की प्रसिद्धि है, इसके कुछ शब्दों से उसकी बदनामी भी। अपना गोरखपुर भी कुछ कम नहीं है। नए बनारस में सांड़ न दिखे, गोरखपुर चले आइए। जोखिम है लेकिन दर्शन हो जाएगा इसकी गारंटी भी।
जोखिम इतना कि यदि आप यहां सांड़ से होने वाले हादसों से पूरी तरह परिचित हो जाएं, तो शहर में प्रवेश होने के साथ ही आपकी नजरें सांड़ को ढूंढने लगेंगी। उससे बचने के लिए या उसको देखने के लिए।
पहली बार इस शहर में सांड़ दिखने का इतिहास किसी को पता नहीं तो आखिरी बार दिखने के बारे में भी कोई नहीं बता सकता क्योंकि नगर के मोहल्लों में कहीं न कहीं, कभी न कभी, किसी न किसी का सामना सांड़ से हो ही जाता है। हां, यह मुलाकात महज एक बहाना नहीं होती, वह कुछ यादें देकर जाती है। जाहिर है, मिली यादें कड़वी ही होती हैं।
कुछ आंकड़ों से गवाही ले लीजिए ताकि हमारी बात की तस्दीक हो जाए।
राजघाट थानाक्षेत्र के गीता प्रेस रोड स्थित दीवान दयाराम मोहल्ला के सुशील श्रीवास्तव आठ जनवरी को दुनिया छोड़ गए। एक दिन पहले शहर में एक सांड़ ने उन्हें मार दिया था। सांड़ से मौत का सबसे ताजा मामला है, पुराने आंकड़ें तो समस्या के भी सांड़ होने की भी गवाही देंगे। नरसिंहपुर वार्ड निवासी व्यापारी बाबू राम की जान गई। लाल डिग्गी निवासी राम बदन निषाद घायल हुए और उनकी मौत हो गई। नरसिंहपुर वार्ड निवासी संजीत गुप्ता के पुत्र अंकित गुप्ता की एक आंख चली गई...।
शहर में सांड़ का सबसे कुख्याल हमला 7 वर्ष पूर्व हुआ था जब पूर्व कुलपति प्रो. विश्वम्भर शरण पाठक की मौत हो गई थी।
गोरखपुर नगर निगम परिक्षेत्र में 3000 से अधिक आवारा पशु हैं। अब यह न पूछिए यह गिनती किसने की। खुद नगर आयुक्त राजेश त्यागी एक सर्वे के हवाले बताते हैं कि यहां 1900 आवारा पशु हैं। इस तरह का सर्वे कितना सच होता है, यह भी न पूछिए और इन आवारा पशुओं में सांड़ कितने हैं, यह तो न ही पूछिए। उनके रिकॉर्ड देखकर सर्वे कौन करेगा। हमें किसी ने बताया यहां दो से तीन सौ सांड़ हैं। किसने बताया, मत पूछो।
हां, आपको उछलने का इतना ही मन है तो आवारा पशुओं की गिनती का मसला छोड़, उनके नाम पर खर्च होने वाली राशि वाली बात बता देते हैं। नगर निगम प्रतिमाह 1.12 लाख रुपए आवारा पशुओं को पकड़ने पर खर्च कर रहा है। यह रकम कैसे खर्च होता है, कितने आवारा पशु पकड़े जाते हैं, कहां रखे जाते हैं- कुछ भी न पूछिए। अरे, एक जरुरी बात तो हम बताना ही भूल गए। शहर में घूम रहे पशुओं को पकड़ने के लिए आउटसोर्सिंग के जरिए 15 कर्मचारी भी लगाए गए हैं। ये कहां दिखते हैं, कहां रहते हैं- बिल्कुल न पूछिए।
सांड़ों की बात चली है तो एक नागरिक के बयान से बावास्ता करा देते हैं, शायद आपके सवालों पर कुछ मरहम लग जाए। इसी शहर में पूर्व पार्षद राम नारायण भी हैं। सुशील श्रीवास्तव की मौत के बाद उनका बयान था- एक किलोमीटर के दायरे में 20 से अधिक खतरनाक सांड़ हैं...। अब एक किमी. क्षेत्र में यह संख्या है तो गोरखपुर के क्षेत्रफल के आधार पर गुणनफल निकालने की कोशिश भी न करें क्योंकि सांड़ से सामना जैसे उसके आंकड़े भी खतरनाक हैं हुजूर!

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