ये रिश्‍ता टूटे ना

फकत एक नजर तो है मेरे पास
क्‍यों देखें जिंदगी को दूसरों की नजर से हम,
माना कि चमन को गुलजार ना कर सके
कुछ खार तो कम कर दें गुजरे जिधर से हम...।

रिश्‍तों में दरारें बढ़ती ही जा रही हैं। अपनी जिंदगी को दूसरों की नजर से देखने के कारण रिश्‍तों में जहां अविश्‍वास पैदा हो रहा है वहीं रिश्‍तें टूट रहे हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि यदि रिश्‍तों को हम ठीक ढंग से जी नहीं पा रहे तो कम से कम अपनी गलतफहमियां तो दूर कर लें। जिंदगी की इस तेज रफ़तार में यह मौका भी कोई किसी को नहीं दे रहा। यदि किसी को अपने से कोई शिकायत है तो वह इसे मन में रखकर खुद ही घुटता रहता है और फिर एक दिन रिश्‍ता तोड़ने का ऐलान कर देता है, सच्‍चाई जाने बगैर। भला ऐसा भी कहीं होता है। यदि हम रिश्‍तों को निभा नहीं सकते तो कम से कम तोड़ने का प्रयास तो न करे। पिछले कुछ वर्षों में तलाक शब्‍द ने जो ख्‍याति पाई है वह शायद ही किसी और शब्‍द को मिली हो। गांवों में पहले लोग या तो यह शब्‍द ही नहीं सुने थे या फिर अधिकतर इस शब्‍द के अर्थ से अनजान थे। लेकिन अब तो मैरेज के साथ ही डाइवोर्स शब्‍द जुड़ गया है। कुछ ऐसा जैसे दोनों एक-दूसरे के पर्याय हो। मैरेज के बाद कोई दिक्‍कत हो तो डाइवोर्स का कितना बेहतर आप्‍शन है। कायरों की इस दुनियां में वाकई रिश्‍तों को निभाने का साहस तो कोई-कोई ही कर सकता है। रिश्‍ते निभाना इतना आसान नहीं, तोड़ना कितना आसान हो गया है। रिश्‍ते जोड़ना भी मुश्किल नहीं लेकिन निभाना तो जैसे मुसीबत है। एक से रिश्‍ते तोड़कर दूसरे से जोड़ने वाले क्‍या यह बता सकेंगे कि क्‍या गारंटी है कि नये रिश्‍तेदार से भी उनके रिश्‍ते जीवनभर के होंगे।
आज कल की सबसे बड़ी मुसीबत माता-पिता की गलत सीख भी बन रही है। पहले जब बेटियां अपने ससुराल की शिकायत लेकर मायके पहुंचती थीं तो उन्‍हें उनकी मां सिखाती थीं- बेटा एडजस्‍ट करो, सबकुछ ठीक हो जाएगा। शुरू-शुरू में थोड़ी परेशानी तो होती ही है।लड़के के भी माता-पिता अपने बच्‍चे को समझाते थे- कि जैसे तुम्‍हानी बहन किसी और के घर गयी है, वैसे ही बहूं भी इस घर में आयी है। वह सबको छोड़कर तुम्‍हारे लिए आयी है, उसकी परेशानियां भी तुम्‍हारी है, उसे समझने का प्रयास करो। वक्‍त लगेगा, लेकिन सबकुछ ठीक हो जाएगा। और अब... ससुराल की शिकायत मायके पहुंचती है तो फिर पूरा घर इस पोजिशन में आ जाता है कि जैसे उनकी बेटी पाकिस्‍तान से लौटकर आ रही हो। ...यह तो अच्‍छा हुआ कि बेटी वहां से आ गयी नहीं तो पता नहीं जालिम क्‍या करते... तुम चिंता मत करो यदि वे लोग नहीं सुधरते हैं तो फिर क्‍या दुनियां में लड़कों की कमी है, तुम्‍हारी शादी कहीं और कर देंगे। कुछ अति उत्‍साही मगर बगैर दिल वाले समझाते हैं- दहेज कानून में फंसा दो, बहुत फुदक रहे हैं। दिमाग ठिकाने आ जाएगा। फिर कोई रिश्‍तेदार तलाक के हथियार इस्‍तेमाल करने की सीख दे डालता है और फिर कितना सस्‍ता है तलाक लेना-देना। घर के भाई-पिता बेटी-बहन की तलाश के फाइल को लेकर कुछ यूं उत्‍साह से चलते हैं कि शायद ही कभी उसके शादी के कार्ड को इतने उत्‍साह से कहीं पहुंचाया हो। जितना उत्‍साह उसे तलाक दिलाने में दिखाते हैं, काश कि दोनों के परिवार वाले इस रिश्‍ते को फिर से जोड़ने में उतनी कोशिश करते तो फिर ऐसी नौबत ही नहीं आती। वे इस बिखराव को कभी दूर करने की कोशिश नहीं करते। इसमें उनकी मर्दानगी को चोट पहुंचने लगती है। ... हम भला क्‍यों माफी मांगे, गलती उसकी है। अरे, यदि हमने गलती नहीं भी की है लेकिन यदि कोई गलतफहमी हो गयी है तो उसे दूर करने में क्‍या जाता है। एक बार कुछ बुरा हो जाने के बाद दंपत्ति कभी पुराने दिनों को याद करने की भी कोशिश नहीं करते... जब उनमें से एक बीमार होता था और दूसरे की नींद गायब हो जाती थी। उन्‍हें सिर्फ अपना झूठा अहंकार दिखता है। और अपने अहम को बरकरार रखने की चाह में वे अपना रिश्‍ता बरकरार नहीं रख पाते। लोगों का यह समझना चाहिए कि उनका अहम इस बात में है कि उनका रिश्‍ता बना रहे, लोग उनके रिश्‍ते का उदाहरण दिया करें। उनका अहम इस मायने में नहीं है कि उनके नहीं झूकने के कारण उनका रिश्‍ता ही टूट जाये। रिश्‍तों की कीमत पर अहम को बरकरार रखना कहां की समझदारी है। और किस बात का अहम। जो लोग अपना रिश्‍ता तक नहीं निभा सकते, उन्‍हें किस बात का घमंड हो जाता है। जिंदगी कोई कंपनी की तरह नहीं है कि उसमें आज किसी और को जगह दे दें और अपना काम निकल जाए तो फिर किसी और कर्मचारी को रख लिया जाए। जिंदगी तो बस एक ही है और इस राह में चलने वाला साथी हमसफर भी एक ही होना चाहिए। लोगों को इस बात की खुदा से बहुत शिकायत है कि उनकी आयु छोटी होती जा रही है। लेकिन एक बार को जरा सोचे, कि जो लोग इतनी छोटी जिंदगी में अपना रिश्‍ता निभा नहीं पाते, क्‍या हो यदि उनकी जिंदगी बड़ी हो जाए। तब तो केवल रिश्‍ते ही बदलेंगे, टूटेंगे और दिल सड़क पर यूं पड़े मिलेंगे जैसे कुचले हुए टमाटर, आलू मिलते हैं। ना तो जिदंगी दो बार मिलती है, ना ही दिल दो होता है फिर चाहत कैसे बदलती रहती है, आज उसे चाहते हैं, कल किसी और को और परसो कोई दूसरा साथी हो जाता है। जो अपने पुराने रिश्‍ते को बरकरार नहीं रख सकता वह क्‍या दूसरे नये रिश्‍ते को निभा पाएगा। माना कि तेज रफ़तार की इस जिंदगी में लोगों को फुरसत नहीं कि वे एडजस्‍ट कर पाए लेकिन क्‍या रिश्‍ते तोड़कर फिर से जोड़ने वाले यह दावा करने को तैयार हैं कि उनके नये रिश्‍ते में कोई समझौता नहीं है। दरअसल ऐसे लोग रिश्‍ते को समझौते से अधिक कुछ समझते ही नहीं। रिश्‍ता टूटा मतलब समझौता टूटा और नया रिश्‍ता मतलब नया समझौता। हिंदू विवाह अधिनियम में तलाक संबंधी नए कानून पर लोग ऐसे खुश हुए जैसे उन्‍हें दूसरी आजादी प्राप्‍त हुई हो। कई जगहों पर तो‍ मिठाईयां बांटी गयी। रिश्‍ते तोड़ने की इतनी खुशी, हमने पहले कभी नहीं देखा। रिश्‍ते जुड़ने पर तो खुशी होती है लेकिन रिश्‍ता टूटने पर भी लोग खुश होते है, आज ही के युग में संभव है।
मां-पिता को भी अपने लाडलों के रिश्‍ते तोड़ने की कितनी जल्‍दी है, इसका एक उदाहरण आपको हतप्रभ कर देगा। बिहार के मुजफ़फरपुर की मधु की शादी 30 साल पहले 1974 में ललित बाधवा के साथ हुई थी। लेकिन इस बीच उनमें कुछ मनमुटाव हो गया और मधु ने तलाक का फैसला लिया। मधु के इस फैसले में उसकी 70 वर्षीय मां प्रेमलता ने उसका भरपूर साथ दिया। लेकिन मधु के पिता 72 वर्षीय चन्‍द्र नरूला ने इसका विरोध करते हुए दामाद का पक्ष लिया यानी उन्‍होंने रिश्‍ते को तोड़ने की बजाय जोड़ने की वकालत की। इससे मधु के माता-पिता के बीच इतनी तकरार बढ़ी कि अंत में उन्होंने भी तलाक के लिए सहारनपुर के उसी कोर्ट में मामला दायर कर दिया जिसमें बेटी ने दायर किया था। अब दोनों मामले कोर्ट में लंबित हैं। यह उदाहरण था इस बात का कि एक बेटी किस तरह खुद के रिश्‍ते को तो नहीं निभा पायी अपने माता-पिता के रिश्‍ते को भी खराब कर दिया। हम इस बात के भी पक्षधर नहीं कि किसी लड़की या लड़के का शोषण होने लगे और वे रिश्‍ता बनाये रखे। लेकिन छोटी-छोटी बातों को अहम का विषय बनाकर झगड़ना और इसके तलाक के अंजाम तक पहुंचाना देना तो गलत है ही। यदि कभी हमारी गलती नहीं भी है और हमारा साथी हमसे नाराज हो जाता है तो उससे माफी मांग लेने में क्‍या चला जाता है। हम किसी गैर से तो माफी नहीं मांग रहे, अपने से माफी मांगने में शर्म आने लगे और अहम बिगड़ने लगे तो फिर रिश्‍ता तो यूं ही नहीं रह जाता है। हमारी तो बस एक ही विनती है कि रिश्‍ता चाहे माता-पिता से हो, भाई-बहन का हो, मित्र का हो या फिर पति-पत्‍नी का, इसमे कोर्ट को बीच में न लाएं। रिश्‍ते की बात आपस की बात है और आपस में ही सुलझ जानी चाहिए। बाकी हमारी शुभकामनाएं उन सभी के साथ है जो कुछ परेशानियां आने के बाद भी अपने रिश्‍तों को कभी नहीं तोड़े, कभी टूटा भी तो उनकी सांस के साथ।

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