आयोग बताए, ऐसे में कैसे मुमकिन है निष्पक्ष चुनाव?
चुनाव आयोग का रटा—रटाया जुमला है— शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव। निश्चित ही अब चुनाव शांतिपूर्ण होने लगे हैं मगर, निष्पक्ष भी? संशय है। बल्कि कहिए कि वर्तमान व्यवस्था में तो मुमकिन ही नहीं। उदाहरण, हम खुद हैं। उत्तर प्रदेश में हाल ही में क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्यों का चुनाव संपन्न हुआ है। गांव से कई फोन आए... वोट देने नहीं आइएगा? चुनाव के दिन छुट्टी की समस्या अपनी जगह, घर पर बात हुई तो पता चला कि वोटरलिस्ट में तो हमारा नाम ही नहीं है। बहुत आश्चर्य नहीं हुआ, लगा कि हम गांव नहीं रहते तो हो सकता है कि जांच के दौरान नाम काट दिया गया हो लेकिन, जब पता चला कि हमारे साथ परिवार के सभी सदस्यों के नाम ही गायब हैं, तो दिमाग में हलचल मच गई? जो सदस्य वर्षों से गांव में ही रहते हैं, हर बार के चुनाव में मतदान भी किया है, उनके नाम कैसे कट सकते हैं? घर वालों ने बताया कि हमारे ही नहीं, कई परिवारों के लोगों के नाम गायब हैं। यह काम फलां प्रत्याशी ने कराया है। उसे लगा कि जो लोग उसे वोट नहीं देंगे, उनके नाम उसने लिस्ट से गायब करा दिए...।
दिमाग का कोलाहल आज तब और बढ़ गया जब फिर घर बात हुई। पता चला कि अब सारे लोगों के नाम वोटरलिस्ट में जोड़ दिए गए हैं। ... यह कैसे हुआ? हम लोगों ने तो कोई कोशिश भी नहीं की? पता चला यह काम प्रधान पद का चुनाव लड़ने वाले एक व्यक्ति ने किया है। दरअसल, अब प्रधान पद के लिए चुनाव होना है। बहुत खूब...! किसी को लगा कि हम उसे वोट नहीं देंगे तो उसने नाम कटवा दिया, किसी को लगता है कि हमारा वोट उसे मिल सकता है तो उसने नाम जोड़वा दिया...? अब इसमें वोटर की मर्जी कहां बची रह गई? जिसने नाम जोड़वाया, उसके प्रति कृतज्ञ तो होना ही पड़ेगा ना? हम कृतघ्न हो भी जाएं तो क्या? इस व्यवस्था में निष्पक्षता तो हरगिज मुमकिन नहीं है।

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