लो आ गए राहुल भैया, नाचो ता थईया ता थईया ता थईया...


राजनीति भी अजीब है और उससे भी अजीब प्राणी हैं राजनीति करने वाले। इन्हें समझना आसान नहीं। अब राहुल गांधी को ही लीजिए। जनाब! 49 दिन बाद प्रकट हुए हैं। अंतर्ध्यान हुए तो खबर बने, प्रकट हुए तो अखबारों में मोटे प्वाइंट में लीड बन गए और बीच के 49 दिन भी छपते-दिखते रहे। वे यहां नहीं थे, यह भी पता नहीं- कहां थे पर, वे छपते रहे- दिखते रहे। यानी वह तब भी थे, जब नहीं थे।
लोग परेशान रहे राहुल बाबा कहां चले गए। जितनी उनकी मां परेशान नहीं थीं, उससे अधिक राहुल भैया के 'छोटे भाई' लोग थे। भैया-भैया कहकर राम के भरत जैसे विलाप कर रहे थे। अब भैया आ गए, चरण पादुका वापस कर देंगे जैसे...। बैठकों से लेकर चौक-चौराहों की दुकानें तक उन्हें ढूंढ रही थीं। कहां गए होंगे, क्या कर रहे होंगे, क्यों चले गए...? सवालों का अंत न था। एक सांसद इतने दिनों तक गायब कैसे रह सकता है? जैसे कि गायब नहीं होने पर हर सांसद अपने क्षेत्र में ही रहता हो। सुरक्षा एजेंसियां क्या कर रही हैं? बेतुके सवाल और खूब बकवास। पूरा ड्रामा चलता रहा।
पार्टी के लोगों से लेकर विरोधी पार्टियों और आम आदमी से लेकर खास तक में राहुल चर्चा में रहे। मीडिया की कितनी ही माइकें उनकी आवाज सुनने-सुनाने को बेहाल हो गई थीं, भले ही रहने पर वह उन माइकों पर नहीं बोलते हों पर उन्हें भी उनका जाना अखर रहा था। कितने कलमों की स्याही सूख रही थी। आएंगे तो जैसे देश में सबकुछ ठीक हो जाएगा।
सोचते हैं, क्या होता यदि राहुल गांधी 49 दिन पहले यह बता दिए होते कि वे फलां जगह, फलां काम के लिए जा रहे हैं और फलां तारीख तक आ जाएंगे? उस दिन जरूर एक खबर बनती, चैनलों पर ब्रेकिंग चलता लेकिन 49 दिन बेहद शांति से गुजर जाते। बस थोड़ी-मोड़ी बतकुचन हो जाती कभी-कभार राहुल पर लेकिन, वे लगातार सुर्खियों में नहीं रह पाते। राहुल तो बिना कुछ कहे चले ही गए, न तो उनकी पार्टी के किसी पदाधिकारी और न उनकी मां सोनिया ने ही कुछ स्पष्ट जानकारी दी कि कहां चले गए राहुल बाबा। यहां तक कि बेबात, बात गढ़ने वाले दिग्विजय सिंह भी रहस्य ही गहराते रहे, इस पर कुछ साफ नहीं कहा। ऐसा लग रहा है, जैसे सबकुछ सुनियोजित तरीके से किया गया और यह नि:संदेह सफल रहा। राहुल देश में नहीं रहे लेकिन मीडिया के जरिए वे लगातार देश में बने भी रहे।  

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