आजकल होमगडवे सीओ बाड़न...

सोमवार, 13.04.2015
सायं 4:00-4:15 बजे (धर्मशाला से तरंग ओवरब्रिज)
चित्र साभार : गूगल 

'आजकल होमगडवे सीओ बाड़न' बिल्कुल यही शब्द थे उस युवा चालक के, जिसके ऑटो पर बैठकर हम उससे बात कर रहे थे। गोरखपुर स्टेशन की ओर से हम एक परिचित की बाइक से धर्मशाला पहुंचे और यहां उस ऑटो की पहली सवारी बन गए। इशारा करते ही खाली दौड़ रहा ऑटो (टेम्पो) साइड होकर रूक गया था। उस पर हम जैसे ही बैठे, एक होमगार्ड पास पहुंचा। उसका हाथ बड़ी ही सहजता के साथ चालक की तरफ बढ़ा। चालक का दाहिना हाथ भी किसी स्वचालित यंत्र की तरह उसकी ओर बढ़ गया। मेरे बैठने के दौरान उसने पता नहीं कब 10 के एक नोट को माचिस की तीली बना ली थी। होमगार्ड से बात करते हुए उसने बड़े आराम से वह तीली उसे थमा दी। दोनों के हाथ बेहद आत्मीयता से मिले, बेहद अभ्यस्त लगे। बिल्कुल ऐसे, जैसे हम चौक-चौराहों पर मिले किसी परिचित से हाथ मिलाते हैं। दोनों में बात भी कुछ उसी तरह हो रही थी। ... जैसे ही होमगार्ड चालक के पास पहुंचा, चालक ने पूछा- आजकल लउकत नाहीं बाट? कहीं अउर ड्यूटी बाटे? ... नाहीं, सुबहिए से ईहे हैं ...कब तक रहब? ... 5 बजे तक बाटीं। यहीं पर दोनों की बात खत्म हो गई। इसी 'औपचारिक' बातचीत के दरम्यान दोनों के हाथ मिले, एक के हाथ से नोट दूसरे के हाथ पहुंच गया। ऑटो आगे बढ़ गया।
शहर में ऑटो चालकों से हो रही वसूली के खिलाफ उनका एसोसिएशन विरोध कर रहा है। दो-तीन दिनों से उनके विरोध की खबरें छप रही हैं। दिमाग में जो सूरत बनी थी वह यह कि पुलिस ऑटो चालक से जबरन रुपए वसूल रही है, नहीं देने पर उन्हें पीटती है-प्रताडि़त करती है। हाल ही में एक पुलिस वाले ने एक ऑटो चालक का हाथ तोड़ दिया था, इस खबर ने और माहौल बना दिया था।... यह सारे दृश्य अब हवा हो चुके थे। अभी-अभी जो हाथ रुपए देने के लिए ऑटो से बाहर निकला था, वह कांप नहीं रहा था। सहज था, अभ्यस्त था। ऐसा लगा कि लेने वाला और देने वाला दोनों एक डोर से बंधे हैं, जरूरत दोनों की है...।
ऑटो बढ़ते ही हमने चालक से पूछा- ये लोग अब भी वसूली कर रहे हैं क्या? अभी तो सख्ती चल रही है ना? आप लोग भी विरोध कर रहे हैं। ... विरोध होता रहता है, वसूली कभी थोड़ी खत्म होगी। ... लेकिन अभी तो उसने आपसे पैसे मांगे भी नहीं, आपने खुद दे दिया? ... जान-पहचान का है, इन लोगों से जान-पहचान बनानी पड़ती है। ... फायदा? ... अरे भइया, आजकल होमगडवे सीओ बाड़न समझ ल। दूसर जने पकड़ लीहे त छोड़बो नाई करीहें। कउनो अधिकारी पकड़ लीहन त ई सब मदद भी कर देलन। पैरवी भी कर देते हैं सब। पकड़े जाने पर कभी फिरिए में छोड़वा देते हैं तो कभी पैसा भी देना पड़ जाता है। यह जान-पहचान का है इसलिए दे दिए, दूसरा होता तो नहीं देते तो भी काम चल जाता। (कभी हिंदी तो कभी भोजपुरी बोलते हुए)
जाम से जूझता हुआ ऑटो तरंग ओवरब्रिज के नीचे पहुंच चुका था। सवारियां बिठाने के लिए चालक ने ऑटो रोक दिया। यहां और सवारियों के बैठ जाने के बाद इस मुद्दे पर उससे बात नहीं हो पाई लेकिन दिमाग में एक बात तो साफ हो गई कि ऑटो चालकों का विरोध अपनी जगह है और वसूली को मौन समर्थन, उसमें उनका सहयोग अपनी जगह। विरोध करने वाला वर्ग दूसरा है, प्रताडि़त होने वाला भी एक वर्ग है, मगर इनसे अलग एक वर्ग साझा कार्यक्रम के तहत इसमें शामिल है। हम सोचते रहे। यह तो समझ लिए कि वसूली का धंधा सिर्फ वसूलने वालों की गरज से नहीं चल रहा, देने वालों की भी अपनी गरज है लेकिन यह नहीं समझ पाए कि रुपए की तीली पकड़ने वाले अधिक दोषी हैं या उसे थमाने वाले।

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