मां के लिए एक ही दिन क्यों...?


आज मदर्स डे है, यानी मातृ दिवस। मेरी मां ये सब बातें नहीं समझतीं इसलिए मैं उन्‍हें इसकी शुभकामना भी नहीं दे सका। मेरी मां प्रेम की ये औपचारिकताएं नहीं समझतीं। हां, वह बेटे का मूक प्रेम अवश्‍य समझती हैं। मुझे भी उन्‍हें फोन पर शुभकामना देना अजीब लगता है। सो, उन्‍हें फोन कर तो नहीं बोल सका लेकिन घर के मोबाइल नंबर पर हैप्‍पी मदर्स डे का मैसेज अवश्‍य कर दिया। बहन ने मां को बताया होगा। 

इस मातृ दिवस पर आस-पास बच्‍चों का उत्‍साह देखकर अच्‍छा अहसास हुआ। चलों, आज सबको मां की फिक्र तो है। गिफ़ट कार्नरों, मिठाई की दुकानों पर लगी भीड़ किसी उत्‍सव की याद दिला रही थी। बच्‍चे अपने पापा के साथ मां को गिफ़ट भेंट करने के लिए इन दुकानों पर धमाचौकड़ी कर रहे थे। सिर्फ अपने लिए चिंता करने वाले बच्‍चों की जुबान पर आज सिर्फ मां थी। मां को ये देंगे, मां को वो देंगे, ये वाला दिखाना जरा...। 

छोटे बच्‍चों में मां के लिए यह प्रेम काफी सुखद अहसास देने वाला था। लेकिन, इस प्रेम ने घाव भी दिए। मन में एक टीस जगी कि यह प्रेम आज ही क्‍यों? घर में भी बड़े, छोटे बच्‍चों को समझा रहे थे- बेटा आज मां को तंग नहीं करते। मां के मुंह में मिठाई खिलाते बच्‍चे, उन्‍हें प्‍यार करते.... आज मां बेटे के रूप में थीं और बेटे उनकी मां बनकर उनकी देखभाल कर रहे थे। मां तुम रहने दो, मैं करता हूं..., चलो आराम करो..., आज मंदिर चलते हैं...। मां को यह शब्‍द आज ही सुनने को मिल रहे थे। मां बस अवाक थीं या कहें कि बच्‍चों के स्‍नेह से अभिभूत थीं। उन्‍हें आज ये बच्‍चे बहुत बड़े दिखाई दे रहे थे जो हर बात में उनकी फिक्र कर रहे थे। मां वास्‍तव में आज ही मां होने के गर्व का अहसास कर रही थीं। लेकिन, मां के मुंह से भी निकल ही जा रहा था- काश तुम लोग रोज ऐसे ही रहते...। 

मां तो मां है ना, तो उसे इसका अहसास सिर्फ आज ही क्‍यों हो रहा है? वह तो हमेशा मां है, तो यह अहसास भी तो उसे हमेशा होना चाहिए ना। सवाल यह उठता है कि मां को यह सम्‍मान सिर्फ एक ही दिन क्‍यों? क्‍या हम इसे सिलसिले का रूप नहीं दे सकते? मां सिर्फ किसी एक दिन के लिए मां तो नहीं होती ना, वह तो हमेशा हमारी मां ही होती है। तब भी, जब हम उनकी गोद में होते हैं, तब भी जब हम बच्‍चे होते हैं, तब भी जब हम युवा होते हैं और तब भी जब हम बूढ़े हो जाते हैं, या खुद मां-पिता बन जाते हैं। लेकिन, मां को उसके मां होने का अहसास हर दिन क्‍यों नहीं होता? हम हर दिन मां का इतना ख्‍याल क्‍यों नहीं रखते? जो बच्‍चे आज इतनी मेहनत कर दुकानों से अपनी पाकेट मनी से मां के लिए उपहार खरीद रहे थे, मिठाईयां खरीद रहे थे, वह सब तो इसलिए ही था न कि उन्‍हें बताया गया था कि आज मदर्स डे है? तो फिर क्‍या उन्‍हें यह सीख दी जाए कि मां का सदैव सम्‍मान करना चाहिए, उन्‍हें दुख नहीं देना चाहिए, वे पूजनीय हैं, तो बच्‍चे ये बात नहीं मानेंगे? हमें लगता है कि मदर्स डे का आयोजन मां को सम्‍मान देने के लिए एक दिवस का उपहार है, लेकिन उन्‍हें उनका वास्‍तविक सम्‍मान हम तभी दे पाएंगे जब उन्‍हें हर दिन यह सोचना पड़ जाए कि कहीं आज मदर्स डे तो नहीं। 

समस्‍त माताओं को मेरा सादर चरण स्‍पर्श। मातृ दिवस की अनंत शुभकामनाएं...!

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