इतना भी 'सोशल' न हो जाइए कि अपना कुछ रहे ही नहीं



सबसे पहले आपको दोस्ती के वसूल याद दिला दे रहे हैं ताकि जो लिखने जा रहे हैं, उसे पढ़कर आप हमें अपना दुश्मन न समझ लें। फेसबुक पर ही सही, आप हमारे फ्रेंड लिस्ट में हैं। ... तो वसूल ये कि अच्छा दोस्त आपकी बुराइयों को आपके मुंह पर कह देता है। यानी हम आपके अच्छे दोस्त बनने जा रहे हैं। (वो अलग बात है कि इसमें लाइक, कम्मेंट का कुछ स्वार्थ मेरा भी है।) हम आपकी बात आपके मुंह पर कहने जा रहे हैं। वो बात आपमें से ही किसी न किसी के बारे में हैं, तो प्लीज वो बुरा नहीं मानेंगे। ... हाँ, तो अब शुरू करते हैं।

... तीन-चार दिन पहले एक दोस्त की प्रोफाइल पिक देखी। गंजी पहनकर रात में सेल्फी लिए थे और उसे प्रोफाइल पिक बना दिया। अब उन्होंने ऐसा किस दबाव में किया होगा, भगवान जाने या फेसबुक जाने। ... हम अपने चौराहे पर भी जाते हैं तो शर्ट जरूर डाल लेते हैं। फेसबुक तो पूरी दुनिया है। पापा हैं... बिटिया है... उसके भी दोस्त हैं... बॉस हैं... अधिकारी हैं...। मोहल्ले वाले और नाते- रिश्तेदार सब। कभी जाएंगे ससुराल गंजी पहनकर? साली के सामने तो शर्मा ही जाएंगे न? तो फिर फेसबुक पर, जहाँ सब हैं, वहां इस नग्नता की क्या जरुरत है? इसके लिए अलग से कपड़े न पहनिए, जब पहने रहिए तभी एक फ़ोटो ले लीजिए।... बुरा लगे तो सॉरी लेकिन हमें आपको इस तरह देखकर बुरा लगा इसलिए कह दे रहे हैं।

... बेड पर पति-पत्नी। रात का समय। सोने ही जा रहे हैं। एक-दूसरे की बाँहों में हैं। हाँ, ये पल यहीं ठहर जाएं तो अच्छा...। लेकिन, एक सेल्फी हो जाए तो कितना अच्छा। और इतने प्यारे क्षण को कुछ लाइक न मिले, तो फिर कैसा क्षण, कैसी ख़ुशी? फिर, क्या फायदा पत्नी को बाँहों में लेने का? क्या फायदा ऐसे पल का...? क्या है यार ये...? पत्नी से प्यार करना है कि फ़िल्म बनानी है? फेसबुकिया फ्रेंड्स को गुड नाईट कहने के और भी तरीके हैं। इसमें भाभी जी को क्यों घसीट रहे हो? कुछ तो अपने लिए भी रखो, अपने तक ही रखो। ... उफ्फ ये सेल्फी... ये फेसबुक... और ये इसका नशा।

... गर्ल्स हॉस्टल में तीन लड़कियां बेड पर लेटी हैं। (ख्याल अभी से आने लगे होंगे, हम समझ सकते हैं।😊) एक के हाथ में पैग है। एक सिगरेट ली है। तीसरी अपने होठों को चोच बनाकर एक सेल्फी लेती है। फेसबुक पर स्टेटस है... एन्जॉय विथ...। अबे तो करो न एन्जॉय, कौन रोकता है? खुलेआम अश्लीलता तो न फैलाओ। तुम्हारे हाथ में पैग और इस उम्र में ये हरकत कभी भी खराब ही मानी जाएगी, वो लाइक चाहे जितनी बटोर ले। ... और दोस्त ऐसी तस्वीरों को फेसबुक पर लाइक करने से पहले एक ठीक ठाक आदमी कभी का अपने दिलोंदिमाग में डिस्लाइक कर चुका होता है...। मेरे कहने का मतलब ये है कि जो बुरा है, वो बुरा है और रहेगा। आप यदि इस तरह की हरकत करते हैं तो आप बुरे हो चुके हैं और मजबूर भी। लेकिन, इसका खुलेआम प्रदर्शन तो न कीजिए। हमें माफ़ कीजिए, लेकिन इस तरह की तस्वीरों को हमने कभी लाइक किया भी होगा तो सिर्फ फेसबुकिया ग्लैमर में पड़कर, दोस्त के नाते तो हम आज मुखातिब हो रहे हैं।

... और खतरनाक तरीके से लाइक बटोरने वाले आप तो अश्लीलता फैलाकर लाइक बटोरने वालों से भी गए-गुजरे हैं। उनके पास तो गलतियों को सुधारने के लिए जिंदगी है, और आप तो उसे ही दांव पर लगा चुके हैं। ... तेज रफ़्तार दौड़ती ट्रेन। गेट को एक हाथ से पकड़े हुए फेसबुक की पैदाइश अपने पूरे शरीर को ट्रेन से बाहर झूला रहा है। दूसरे हाथ में मोबाइल। सेल्फी की पोज। घर से पिता फ़ोन कर रहे हैं कि न जाने बेटे को ट्रेन में सीट मिली की नहीं। बेटा सीट पर बैग रखकर खुद हवा में झूल रहा है। पिता के फोन को बार बार काट दे रहा है कि क्या बेचैनी हैं इनको। एक सेल्फी नहीं लेने देते...। ...बेटा, जीते रहे तो कुछ ही लाइक मिलेंगे, ऊपर गए तो अख़बार में खबर भी बन जाओगे। और, तुम्हारे वाल पर rip, दुखद और श्रद्धांजलि लिखने वालों की तो बाढ़ आ जाएगी। ... तुम तो छोडो, तुम्हारे दोस्त भी तुम्हारी एक फ़ोटो अपने वाल पर चिपकाकर तुम्हारे दुःख का रोना रोकर 100 से अधिक लाइक बटोर ले जाएंगे, जितने उनके अपने पिक के लिए नहीं मिले होंगे। ... लेकिन पिता के आंसुओं को पोछने इस फेसबुक से कोई नहीं जाएगा। बुरा न मानना, लेकिन हम भी नहीं जाएंगे। 

... लाइक लेने और देने वाले, दोनों से ही हमें कुछ कहना है। पहले, लाइक लेने वालों से...। भाई, निजी जिंदगी में अच्छे न बन सके तो फेसबुक पर ढेर सारे लाइक भी तुम्हारी तकदीर नहीं बना पाएंगे। सिर्फ लाइक लेने के लिए कुछ भी मत कर दो। वही करो, जो करना चाहिए। वह चाहे फ़ेसबुक हो या जिंदगी। और, तब भी वही करो, जब लाइक न मिलता हो।

... और, हर पोस्ट को लाइक करने वाले, आपसे भी कुछ कहना है। आप कुँए में कूदते हुए व्यक्ति को क्या सच में लाइक करते हैं, किसी की ख़ुदकुशी को? ... तो फिर fb पर क्यों करते हैं? कहीं आप उसको यही सब करने के लिए प्रोत्साहित तो नहीं कर रहे न? बहुत नहीं कहना, बस यही कहना है कि जो रियल में पसंद नहीं करते, उसे फेसबुक पर क्यों पसंद करते हैं? आप सच में झूठे हैं, या फेसबुक पर? दो तरह की पसंद क्यों है आपकी? एक बनिए, नेक बनिए। फेसबुक का बहुत लोड मत लीजिए लेकिन बहुत हलके में भी मत लीजिए। निजी नहीं तो सार्वजनिक जीवन हमेशा आदर्श ही होना चाहिए, उसका तो छीछालेदर मत कीजिए। ... प्लीज।

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