हमीं चुनते हैं नेता! हमें तो यकीन नहीं, क्या आपको है?
लोकतंत्र की खासियत तो यही है न कि इसमें अपनी सरकार का चुनाव हम स्वयं करते हैं? और यदि यही नहीं कर पाएं तो...? ... तो न तो अपनी खूबियों के साथ लोकतंत्र कायम रह पाएगा और न ही इस तंत्र से जनता खुश रह पाएगी। ... और शायद है भी नहीं। अक्सर जब अपने देश के शासन या नेताओं पर बात होती है तो यह गुस्सा सामने आता भी है। इस दौरान कई बार हम यह भी कहते हैं कि हम कौन से धुले हुए हैं। इस व्यवस्था के लिए क्या हम जिम्मेदार नहीं हैं? आखिर इन नेताओं का चुनाव हम ही तो करते हैं!
क्या वाकई...? क्या वाकई लोकतंत्र में अपने नेताओं का चुनाव हमीं करते हैं? आज अचानक यह सवाल त्हमें खुद से पूछना पड़ गया। अपनी समझ से हमने अपने ही सवाल का जवाब देने की बहुत कोशिश की। कभी हां, कभी ना कहते रहे। बहुत कोशिश की कि यह कह दें कि 'हां, हम ही अपने बीच से किसी को अपनी तकदीर सौंपते हैं और इसके लिए पूरी तरह हम यानी देश की जनता ही जिम्मेदार है।' लेकिन, कुछ दृश्य सामने आते रहे, कुछ सवाल कौंधते रहे, और हम बहुत सोचने के बाद भी हां-ना की स्थिति में ही बने रहे। हां इसलिए, क्योंकि हम सचमुच मतदान करते हैं, यह अधिकार हमें प्राप्त है। ना इसलिए, क्योंकि मतदान के अधिकार तक हमारे पहुंचने की प्रक्रिया भी कमोबेश उन्हीं हाथों में पहुंच चुकी है, जिनका चुनाव हम चाहते या फिर ना चाहते हुए भी करते हैं। कैसे? आपको भी बताते हैं।
उत्तर प्रदेश में अभी पंचायत चुनाव तो बिहार में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ी हुई है। अभी हम यूपी के गोरखपुर शहर में हैं और यहां पंचायत चुनाव से संबंधित रोज आ रहीं खबरों के माध्यम से चुनावी प्रक्रिया से पुन: वाकिफ हो रहे हैं। इन खबरों से बावास्ता ही हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अपने नेताओं का चुनाव हम स्वयं कुछ हद तक ही करते हैं, अपने चुनाव का निर्धारण बहुत हद तक तो वे खुद कर चुके होते हैं। पूरी चुनाव प्रक्रिया में इतने छेद हैं, इतनी खामियां हैं कि हमारे नेताओं के लिए मनमाना करने के लिए हर जगह मौके ही मौके हैं। जनता के हाथ सिर्फ एक वोटर आईकार्ड और नेता के लिए खेलते रहने के लिए कई सारे कार्ड। मतदाता सूची के निर्माण से लेकर मतगणना तक की पूरी प्रक्रिया के दौरान ये नेता खेलते ही तो रहते हैं। कभी अपनी ही बनाई व्यवस्था से तो कभी उस जनता के अरमानों से, जिसे पूरी करने के लिए वे 'नेताजी' बनते हैं।
मतदाता सूची में अंकित नाम ही वोट हैं। यदि सूची गलत हुई तो सबकुछ गलत होना तय है। बावजूद, इस सूची के निर्माण में लापरवाहियों का कोई ओर-छोर नहीं है। यूपी में पंचायत चुनाव के लिए बनाई गई मतदाता सूची में इतनी खामियां हैं कि दिनभर काम के बाद रात में बिजली नहीं रहने पर जेनरेटर चलाकर सूची दुरुस्त करनी पड़ रही है। क्या यह उम्मीद कर ली जाए कि सूची पूरी तरह दुरुस्त हो जाएगी? निश्चित रूप से नहीं। क्योंकि सूची को सुधारने में भी कमोबेश वही लोग हैं, या वैसे ही लोग हैं जिनकी देखरेख में सूची बनी है। सूची में फर्जी नाम होने का मतलब बूथों पर नेता विशेष के पक्ष में अधिक वोट पड़ना। जितने नाम फर्जी, उतने मनमाने वोट।
सिर्फ मतदाता सूची ही लापरवाही के साथ नहीं तैयार होती, वोटरों के पहचान पत्र भी ऐसे तैयार किए जाते हैं जैसे चुनाव बाद उनका काम ही क्या है। वोटर आईकार्ड पर नाम किसी का, फोटो किसी का। इस पर लिखी जन्मतिथि तो इतनी फर्जी होती है कि ये आईकार्ड एड्रेस प्रूफ के रूप में तो मान्य हैं लेकिन उम्र के लिए हमें अलग से मैट्रिक का सर्टिफिकेट देना होता है। कितनी बड़ी बात है कि एक नौकरी के लिए पक्की उम्र चाहिए लेकिन देश की तकदीर चुनने के लिए फर्जी उम्र भी चलेगी। मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए उम्र का बड़ा महत्व है और यही सही नहीं लिखी जाती तो फिर नाम सही कैसे होंगे? इस समय पंचायतों में घमासान मचा है। लोग सूची में अपना नाम ढूंढ रहे हैं। कच्ची उम्र वालों के नाम जुड़ गए हैं और पक्की वालों के नाम काट दिए गए हैं। बेहिसाब लापरवाही की गई है और इसलिए कई जगह पर तो प्रधान, एडीओ, बीएलओ पीटे तक जा रहे हैं।
खैर, आगे बढ़ते हैं और सीटों के आरक्षण की प्रक्रिया पर बात करते हैं। इस समय विकास भवन पर देर रात तक भीड़ लगी दिख रही है। यहां इस बात की सेटिंग हो रही है कि कैसे अमुक सीट को आरक्षित करा दी जाए, या अमुक को अनारक्षित। दबी जुबां इसके लिए 25000 से लेकर सवा लाख रुपए तक का रेट भी निर्धारित होने की बात कही जा रही है। ये चर्चाएं यदि पूरी तरह नहीं, थोड़ी भी सच हैं तब भी लब्बोलुआब तो यही हुआ कि नेताओं के लिए गुंजाइश यहां भी है।
आइए! अब, बूथों पर चलते हैं, जहां वोट डाले जाते हैं। घर से निकलकर बूथ तक पहुंचने की राह में नेताजी नहीं तो उनके समर्थक तो जरूर मिल जाते हैं। बाइक, कार से वोटर ढोए जाते हैं। पैसा, मुर्गा, जाम...। बूथों पर भी यह बताने वाले लोग कि माताजी, बहनजी, भैयाजी, याद है न! ऊपर से...नंबर। यहां कई वोटर नहीं पहुंच पाते लेकिन उनमें से काफी लोगों के नाम पर वोट पड़ जाते हैं। इवीएम ने यह गुंजाइश कम की है, लेकिन पूरी तरह अंकुश तभी लग पाएगा जब इसके पहले की प्रक्रिया दुरुस्त हो।
अब कहने के लिए शायद कुछ बचता नहीं। हमें लगता है कि आप भी जरूर यह समझ गए होंगे कि क्यों नेताजी का चुनाव जीतना सिर्फ हमीं तय नहीं करते, हमसे ज्यादा वे खुद सुनिश्चित करते हैं। इसीलिए तो चुनाव परिणाम आने के बाद हर हारा हुआ प्रत्याशी यह आरोप लगाने की स्थिति में होता है कि मतदाता सूची, मतदान या मतगणना में धांधली की गई है। कई बार वह कोर्ट तक पहुंचता है। दोबारा चुनाव कराने का फैसला होता है और परिणाम बदल भी जाता है। ... तो क्या मानें कि जो पहले चुनाव में जीता था, उसे जनता ने चुना था या फिर, जो दुबारा कराए गए चुनाव में विजयी हुआ, उसे?
हम तब तक निष्पक्ष चुनाव परिणाम के लिए निश्चिंत नहीं हो सकते जब तक कि इसकी पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष न रही हो। और तब तक भले ही मतदान का अधिकार हमें मिलता रहे, देश की तकदीर तो अपने आप बनती-बिगड़ती रहेगी।

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