वो जिस आग को बुझाने के लिए रो रही थी, बाबा तो उसे ही हवा देने निकले हैं...


#राहुल_गांधी गोरखपुर में थे। मेडिकल की एक छात्रा राहुल बाबा के पैरों पर गिर पड़ी। दर्द था कि तीन साल से तैयारी करते रहने के बाद भी उसे मेडिकल में #एडमिशन नहीं मिल रहा। सिर्फ इसलिए क्योंकि वह आरक्षित वर्ग से नहीं आती। उससे भी कम मार्क्स पाने वाले#आरक्षित वर्ग के छात्र एडमिशन ले रहे हैं। अब तो बाबा उसे एडमिशन दिला दें, या फिर मौत...। बाबा कुछ न कर सके। इसलिए क्योंकि वे कुछ नहीं कर सकते थे। वे आगे भी कुछ न कर सकेंगे, इसलिए क्योंकि वे या उनके जैसे बाकी नेता कुछ करना ही नहीं चाहते।
राहुल ही नहीं, कोई भी बड़ा नेता हो, उसे #देवरिया#गोरखपुर जैसे छोटे शहर तभी याद आते हैं जब याद आता है कि #दिल्ली के बराबर ही यहां के वोट की भी कीमत है। सिर्फ और सिर्फ सत्ता की चाह ऐसे नेताओं को गोरखपुर खींच लाती है, वरना उनके पाँव तो पब्लिक के लिए #संसद की सीढ़ियां तक नहीं चढ़ना चाहते। बेेकार के विवाद में चाहे संसद के कितने दिन निकल जाए, जनता के मुद्दों पर चुप्पी इनकी आदत है। ... जाहिर है, उस लड़की को बाबा क्या जवाब देते? वे तो खुद इस आग को और बढ़ाने निकले हैं, जिसमें जलने से बचाने के लिए वह छात्रा गिड़गिड़ा रही थी। बात जाति आधारित #आरक्षण ख़त्म करने की हो रही है और बाबा अब बाबाओं को भी आरक्षण देंगे। यानी आग को आग से बुझाएंगे, जिसका मतलब है इस#आग को और भड़काएंगे। जब वह लड़की अपने पैरों पर खड़ा न हो पाने के कारण कर्ज के बोझ तले दब जाएगी, तब बाबा उसके कर्ज माफ करने जरूर आएँगे।
.... जाति आधारित आरक्षण के चलते एक तरफ समाज में विद्वेष फ़ैल रहा है तो दूसरी तरफ आर्थिक सामाजिक असमानता की खाई बढ़ती ही जा रही, जिसे पाटने के लिए आरक्षण लाया गया। एक युवा अपने ही साथ वाले युवा को विद्वेष सेे देखता है, क्योंकि उसे लगता है कि उसने उसका हक छीन लिया। अब भला हक छीनने वाले को देखने के लिए वो भाईचारे की दृष्टि कहाँ से लाए? पूरे देश को #जनरल#एससी#एसटी#पिछड़ा में बांटकर वे अनेकता में एकता का भाषण बड़ी खूबी के साथ देते हैं। चारों तरफ हतास, निराश युवाओं की भीड़ है लेकिन नेताओं को तो यह भी एक अवसर जैसा लगता है। खुुद प्रधानमंत्री #मोदी इन युवाओं को गिनकर देश को सबसे युवा देश बताते नहीं अघाते, लेकिन आरक्षण के खेल का शिकार हुए युवाओं की गिनती करने या उनका दर्द सुनने की हिम्मत वे भी नहीं कर पाते। भाषण में सब #लोहिया,#जेपी के ही चेले हैं जो जाति नहीं समाज बनाने निकले हैं लेकिन ये सब वैसे ही चेले हैं जैसे जनेऊ तोड़ो वाले जेपी के चेले जाति के नाम पर ही बिहार में सरकार बनाते हैं। नेताओं की करनी, कथनी का ये फर्क इस देश को कभी युवा नहीं होने देगा, चाहे युवाओं की संख्या कितनी भी हो जाए। हताश, निराश, भविष्य के प्रति आशंकित और एक दूसरे को विद्वेष की भावना से देखने वाले युवा भला किस काम के? ... #भाजपा हो या #कांग्रेस, मोदी हो या राहुल, #सत्ता के खेल में बस मोहरे चले जा रहे हैं, #पब्लिक के मुद्दे नहीं। वह तो खुद एक#मोहरा बनकर रह गई है इस खेल में।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट