यह चुनावी सवाल हैं जनाब!


एक ही आंदोलन की उपज दो नेता आमने-सामने हैं और इसलिए दिल्ली की राजनीतिक लड़ाई काफी दिलचस्प हो चली है। दिल्ली में दिलचस्पी तो यूं भी आम बात है, देश की राजधानी होने के नाते, लेकिन कभी साथ रहीं दो शख्सियतों के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी होने के बाद का परिणाम देखना भी काफी दिलचस्प होगा। इसलिए भी कि यह परिणाम कई परिणामों को तय करेगा।
खाकी के बाद खादी की भूमिका निभाने को बेताब किरण बेदी ने अरविंद केजरीवाल से कई सवाल पूछे हैं। सवाल नं. एक...., दो..., तीन...। सवालों की लंबी फेहरिस्त। इन सवालों को सुन-देखकर एक सवाल अपने भी मन में आ रहा है कि क्या नेताओं की तरह उनके सवाल भी चुनावी होते हैं? जो चुनाव आने पर ही किए जाते हैं और चुनाव तक ही जिनका वजूद होता है? यह न तो चुनाव से पहले पूछे जाते हैं और न उसके बाद।
हमें नहीं लगता कि यह सवाल चुनाव के साथ ही अनायास प्रकट हो जाते होंगे, यानी सवाल पहले से मौजूं होते हैं लेकिन पूछे नहीं जाते। हां, एक बात और- ऐसा नहीं है कि सवाल पूछने वाले नेता ही इस 'खास पीरियड' की अहमियत समझते हैं, अपने वोटर भी कम होशियार नहीं। वे 'खास पीरियड' में पूछे जाने वाले सवालों का जवाब नहीं ढूंढते और अपने नेताओं का पूरा सहयोग करते हैं सवालों को सवाल बने देने रहने में...।

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