पब्लिक के बीच के इन पॉलिटिशियन से जरा बच के...।
भाई, कोई हिन्दू है तो भी वोटर है, मुसलमान है तो भी। दोनों हैं तो देश के नागरिक ही और दोनों को ही अपने जाति धर्म का नेता नहीं बल्कि विकास चाहिए। ऐसे में यदि वे अपनी जाति-धर्म से बाहर जाकर किसी विकास करने वाले नेता पर भरोसा करते हैं तो क्या दिक्कत है? और यदि वे अपने जाति-धर्म से ही किसी विकास करने वाले का चुनाव करते हैं तब भी दिक्कत क्यों है? इसमें भी किसी समीक्षा की जरुरत है क्या? दिक्कत तो तब होनी चाहिए ना, जब वह सिर्फ जाति-धर्म देखकर ही चुनाव करे? लेकिन यह दिक्कत यदि हर समय है तब तो भाई यह आपकी, खुद की दिक्कत है...।
... भाजपा ने मुसलमान को टिकट नहीं दिया फिर भी मुसलमान ने उसे वोट दिया। मतलब यह कहना चाहते हो कि मुसलमान को सिर्फ मुसलमान को ही वोट देना चाहिए? और कभी यदि किसी मुसलमान बहुल क्षेत्र में मुसलमान नेता चुन लिया जाए, तुम्हें तो तब भी दिक्कत है। कहोगे कि मुसलमान है तो मुसलमान ही चुनेगा ना? भाई खोट हिन्दू या मुसलमान में नहीं, खोट तुम जैसों की सोच में है जो सबकुछ हिन्दू, मुसलमान बनकर ही सोचते हो। कभी देश का नागरिक भी बन जाया करो, नेता चुनने के लिए पब्लिक बन जाया करो...।
मेरी राय में न तो किसी पार्टी द्वारा जाति-धर्म देखकर किसी को टिकट दिया जाना चाहिए, न किसी वोटर द्वारा, किसी कैंडिडेट को जाति-धर्म के आधार पर वोट किया जाना चाहिए। पार्टी उसे टिकट दे जो उसका सबसे अच्छा कार्यकर्त्ता है, वोटर उसे वोट दे जो उसकी उम्मीदों पर खरा उतरता है। लेकिन यहां तो चुनाव परिणाम आते ही हिन्दू-मुसलमान शुरू हो गया है। चुनाव के पहले नेताओं ने हिन्दू-मुसलमान किया, अब पब्लिक कर रही है, क्या अंतर है तुममें और उनमें? अरे भाई, कभी तो आदमी को आदमी की नजर से देखिए, कभी तो वोटर को सिर्फ वोटर, नेता को सिर्फ नेता समझिए। अपने रीति रिवाज, कर्म काण्ड जरूर जाति-धर्म देखकर पूरा कीजिए, लेकिन सरकार तो बस पब्लिक बनकर ही चुनिए। पब्लिक में छुपे इस टाइप के लोग जो भौंक रहे हैं, उन्हें भौंकने दीजिए। आप बस सही नेता चुनिए, फिर चाहें वह हिन्दू हो या मुसलमान।

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