भावनाओं से खेलने पर बैन होना ही चाहिए...
जिन्हें एतराज है, उन्हें है...
हम तो बिहार में भी फ़िल्म पद्मावती के बैन का समर्थन करते हैं।
... कोई फिल्म कभी मजाक नहीं होती, वह आईना होती है वर्तमान में इतिहास का और भविष्य में वर्तमान के इतिहास का भी। यह जीवन बनाती है, बिगड़ती है, किसी का चरित्र तक तय कर देती है। आजकल अखबार, साहित्य से भी अधिक हमारे जीवन को सिनेमा प्रभावित कर रहा है। हां, यह मनोरंजन का साधन भी है लेकिन सिर्फ मनोरंजन नहीं है। जो जिम्मेदारी एक अखबार के साथ है, उससे कम जिम्मेदारी फिल्मों के साथ भी नहीं है। आज जिस समाज में हम हैं, उसे किसी अखबार से भी अधिक सिनेमा ने बनाया है। जो सिनेमा इतना प्रभावशाली है उसे महज मनोरंजन कैसे कह दिया जाए? और कैसा मनोरंजन भी? जिस फ़िल्म की रिलीजिंग से भी पहले देश में माहौल तनावपूर्ण हो जाए, वह फ़िल्म किसका मनोरंजन कर रही है? क्या कुछ लोगों के तनाव से भी कुछ लोगों का मनोरंजन होने लगा है? ऐसी फिल्म जो ठीक से इतिहास नहीं बता रही, मनोरंजन भी नहीं कर रही, किसी विषय पर हमें शिक्षित-जागरूक नहीं कर रही तो यह क्यों रिलीज होनी चाहिए और क्यों मिलनी चाहिए ऐसी फिल्म बनाने की किसी को आजादी?
क्या यह आजादी इसलिए चाहिए कि जब जिसका जी चाहे, अपनी कुंठा देश में फैला सके? सच को झूठ बना सके? किसी का चरित्र बदल सके? इतिहास बना-बिगाड़ सके। वर्तमान को संवारने की कोई जिम्मेदारी नहीं फिल्मकारों पर? विज्ञान को प्रोत्साहित करती जैसी फिल्में हॉलीवुड में बनती हैं, वैसी बॉलीवुड में क्यों नहीं बनाते? अश्लीलता (नया शब्द- आजादी) दिखाने में तो कभी पीछे नहीं रहे? फिर अपनी जिम्मेदारी वाली फिल्में बनाने में नानी क्यों याद आ जाती है? इसलिए कि ऐसा करना जिम्मेदारी है और बवाल कराने वाली, देश-समाज को बिगाड़ने वाली फिल्मों से धंधा होता है? धंधा करना ठीक है और सभी को इसकी आजादी मिलनी चाहिए लेकिन 'गन्दा है पर धंधा है' ऐसा धंधा नहीं चलने वाला। जो लोग इस मानसिकता को जी रहे हैं; वे जीएं, हम गंदा धंधा करने और करने वालों के खिलाफ हैं... हमेशा रहेंगे।
इस समय अखबारों के संपादकीय देख लीजिए, पत्रिकाओं के लेख देख लीजिए, टीवी चैनलों के डिबेट देख लीजिए; एक विवाद पैदा करने वाली फिल्म के बैन लग्नेभर से लगता है जैसे सबकी आजादी छिन गई है। निसंदेह हर व्यक्ति की आजादी है लेकिन जिम्मेदारी से परे नहीं है कोई आजादी। जो भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहा, उन सबकी आजादी 'सेंसर' के दायरे में होनी ही चाहिए; फिर चाहे वह लेखक हो, कवि हो, पत्रकार, साहित्यकार या फिल्मकार हो...। यह सब रो रहे हैं क्योंकि इनकी वह आजादी छिनती नजर आ रही है जिसके जरिए यह सबकी आजादी छीनते आए हैं। सबकी भावनाएं रौंदते आए हैं...। जिन्हें ऐसी आजादी चाहिए, वे बैन का विरोध करें लेकिन हमें तो आजादी के साथ अनुशासन का होना भी जरूरी लगता है। ऐसी आजादी का होना ही अच्छा लगता है जिससे किसी की भावनाएं आहत न हो, और अन्य की भी आजादी बनी रहे। अतः फ़िल्म के बैन को एक बार फिर मेरा 100 प्रतिशत समर्थन है। जब तक पद्मावती फ़िल्म के किरदार के बारे में देश को तनाव देने वाले हर दृश्य स्पष्ट नहीं हो जाता, विवाद का समाधान नहीं हो जाता; तब तक यह फ़िल्म रील से बाहर नहीं आनी चाहिए...! हम तो यह भी मानते हैं कि बैन का यह कदम देर से उठाया गया। यदि यह बैन का यह कदम विरोध की शुरुआत में ही उठाया गया होता तो न लोगों का धैर्य जवाब देता और न किसी की नाक कटने की सुपारी दी गई होती और न ही कोई पद्मावती के लिए जान देता। लेकिन जैसा कि सरकारों का चरित्र है कि वे शांतिपूर्ण मांगों को हमेशा अनसुनी ही क़रती हैं और एक तरह से उग्र प्रदर्शन पर विवश कर ही देती हैं; इस मामले में भी यह चरित्र कायम रहा...।
खैर, नीतीश कुमार भी देर आए मगर दुरुस्त आए। नीतीश कुमार के साथ ही; आम आदमी की भावनाओं को समझकर फ़िल्म पर बैन लगाने वाले अन्य सभी दलों, नेताओं का आभार! उन सभी व्यक्तियों को भी बधाई जो अपने इतिहास के लिए 'वर्तमान' से भिड़े, वर्तमान में लड़े और तमाम भटकाने वाली ताकतों की सक्रियता के बाद भी संघर्षरत रहे। इतिहास को सुरक्षित रखने के लिए आवाज उठाने वाले हर शख्स को बधाई और अपेक्षा है कि आगे भी अपने ऐतिहासिक चरित्रों, धार्मिक प्रतीकों, अपनी संस्कृति, आस्था पर यह गंभीरता बनी रहेगी ताकि किसी को हमारे पूजनीय चरित्रों को मनोरंजन का साधन बनाने की हिम्मत न हो। स्वाभिमान के लिए जीवन आहूत करने वाली पद्मिनी के चरित्र से कोई खेल न सके; जिस राधे को हम राधे मां कहते हैं, उन्हें कोई 'सेक्सी राधा' न कह सके...!
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