किसी को मारना है तो रोटी छीन लीजिए... यही हो रहा है!
लालू प्रसाद यादव (तब नाम में यादव भी था) ने कभी नारा दिया था- 'भूरा बाल' साफ करो। यह नारा एक कट्टर जाति वाले शख्स की अन्य सामान्य जातियों से उसकी घृणा की हद को दर्शाता ही है, यह बताता है कि उसकी राजनीतिक दिशा, सोच क्या रही होगी, और मौका मिले तो आज भी क्या है! 'भूरा बाल' साफ करने का अर्थ था- 'भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला (कायस्थ)' को समाप्त करना। लेकिन, लालू को यह भी चिंता सताती रही कि अन्य जातियों से जो कुछ प्रतिशत वोट उनको हासिल होता है, वह भी न मिलेगा तो उन्होंने खुद में सुधार लाया और बाद में पिछड़ों की उन्नति की बात तो करते रहे लेकिन सवर्ण जातियों के सफाये को भूला दिया...।
यूपी में मुलायम, मायावती की पूरी राजनीति बस यही है। सवर्णों के सफाए की कोशिश माया ने भी खूब की लेकिन जब राजनीतिक जमीन खिसकती महसूस हुई तब उन्हें लगा कि यह देश विविधताओं का है, सभी जातियों का है और नारा दिया- 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है।' लेकिन यह नारा बस राजनीतिक हित साधने तक ही था, मायावती की सोच आज भी कट्टर जातिवादी ही है। इतनी कि अम्बेडकर को भी इस कदर जाति में बांधा कि वह महापुरुष से एक विशेष जाति के प्रतीक बनकर रह गए। 'हरिजन एक्ट' सामान्य जातियों से घृणा, जातिगत कुंठा निकालने का ही हथियार था/है...। हां मुलायम के बाद अखिलेश वाली पीढ़ी सिर्फ जातिगत न रहकर, सर्वांगीण विकास को भी जरूर तवज्जो देती रही है।
गुजरात में इस समय चुनाव होना है, मुद्दा सिर्फ राजनीति है। हार्दिक पटेल जाति और आरक्षण की ही उपज हैं तो बड़े और प्रभावी ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर भी हार्दिक के समानांतर 'अपनों' के लिए आंदोलन कर रहे हैं। मांग है कि पटेलों को आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। अल्पेश ठाकुर ओबीसी, एससी-एसटी एकता मंच और गुजरात क्षत्रिय ठाकुर सेना के अध्यक्ष हैं। उन्हें भी 'अधिकार' चाहिए। सबका बस एक मकसद है- आरक्षण। जो आरक्षण देगा, उसी की सरकार...।
चलते हैं पुनः बिहार। 2005 के विधानसभा चुनाव में लगा कि बिहार की सोच विकासवादी हो गई लेकिन 2010 में बिहार पुरानी लीक पकड़ा और 2015 में तो बह ही चला। नीतीश पनपे तो विकास की राजनीति से ही, लेकिन उनके अंदर भी जाति का कीड़ा कुलबुलाता रहा। अपनी जाति के आईएएस, पीसीएस अधिकारियों को ढूंढ-ढूंढकर बिहार बुलवाया और तैनात कराया लेकिन यह कीड़ा अब बड़ा हो चुका है। उसे उस बीजेपी का भी साथ मिल चुका है जो बाहर से तो खुद को 'सबका साथ-सबका विकास' का नारा देती है लेकिन अंदर की सोच बस यही है कि जैसे भी हो सत्ता हासिल होनी चाहिए और यह इस सोच की पराकाष्ठा का दौर है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने बिहार चुनाव के समय 'आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए' इतनाभर ही कहा था; बीजेपी को भारी नुकसान उठाना पड़ा। बीजेपी जानती है कि किसी एक जाति का ठप्पा लेकर वह 'भारत विजय' नहीं कर सकती इसलिए खुद को सबका हिमायती दिखाने की कोशिश जारी है लेकिन हर जातिगत नेता को अपने पाले में लेकर उसके वोट को अपना बना लेने का जो हथकंडा बीजेपी के पास है, वह किसी के पास नहीं। अभी नीतीश का साथ उसी बीजेपी से है...!
नीतीश अभी काफी शक्तिशाली हैं, लालू अपने बुरे दौर में इसलिए नीतीश अभी अपने मूल चरित्र में घोर जातिवादी सोच के दौर में जी रहे हैं। आदमी का असली चरित्र तभी सामने होता है जब वह शक्तिशाली हो, किसी का भय न सताए। बस क्या, नीतीश ने अब उस निजी क्षेत्र को भी आरक्षण की आग में झोंक दिया, जो सवर्णों का एकमात्र सहारा है। और बीजेपी को भला इससे क्या एतराज हो सकता है, जिसे सिर्फ सत्ता से मतलब है? सवर्ण तो उसे फिर भी वोट देंग और पिछड़ी जातियों का वोट नीतीश दिलाएंगे ही, इसी तरह राजनीति चल रही है। सत्ता मिल रही है। प्रदेशों से लेकर देश तक की राजनीति धर्म, जाति-आरक्षण आधारित हो गई है। विकास सिर्फ नारा है। वह सिर्फ मंचों से बोलने के लिए है। जाति, आरक्षण के नाम पर जिस तरह देश को बांटने का खेल चल रहा है, धीरे-धीरे हर प्रदेश कश्मीर नजर आएगा। ऐसी शक्तियां प्रबल होती जाएंगी तो अन्य धर्म, जातियों का सफाया तय ही है। आजकल किसी के सफाये के लिए उसे मारने की क्या आवश्यकता है? बस उसके हाथ से जीवन यापन का तरीका छीन लीजिए। उसे सामने से रोटी छीन लीजिए, भूखा ही मर जाएगा। आजकल यही हो रहा है...।
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