सरकार, सरकार कोई दुकानदार नहीं है... समझिए!
राजीव चौक दिल्ली का सबसे बड़ा मेट्रो स्टेशन है लेकिन यहां पर वेंडिंग मशीनों का हाल देख लीजिए। सब की सब खराब पड़ी हैं बिल्कुल भारतीय रेल की वेंडिंग मशीनों की तरह...।
जंतर मंतर से हम राजीव चौक पहुंचे। मेट्रो कार्ड इस्तेमाल किए लेकिन वह काम नहीं कर रहा था। हम समझ गए कि महंगे किराया ने एक-दो बार के अप-डाउन में ही 200 वाले कार्ड की हवा निकाल दी है। कार्ड फेल होने पर हमने टिकट काउंटर की तरफ देखा तो वहां लंबी लाइन थी इसलिए हम वेंडिंग मशीनों की तरफ चले गए...। लेकिन आधा दर्जन मशीनों में एक भी काम नहीं कर रही थीं। कस्टमर केयर काउंटर पर भी वैसी ही भीड़। हमने पेटीएम से अपना मेट्रो कार्ड रिचार्ज करने की कोशिश की लेकिन दिल्ली मेट्रो के खराब सर्वर के चलते पेमेंट वापस आ गया। अब कोई चारा न बचा...। जिस लाइन से बचने के लिए मेट्रो कार्ड ले रखा है; उस लाइन में आखिर लगना ही पड़ा। कार्ड रिचार्ज कराकर जब आगे बढ़े तो तमाम एग्जिट पॉइंट पर तकनीशियन पेचकस लिए भिड़े हुए थे। एक-दो ही डोर से लोग निकल पा रहे थे और इस कारण यहां भी लाइन...। मेट्रो में चढ़ने के लिए लाइन और अंदर सीट न मिलने पर खड़ा होने वाली दिक्कत तो छोड़ ही दीजिए...।
जब मेट्रो शुरू हुई थी तो दिल्ली की जिन्दगी को जैसे रफ्तार मिल गई थी। किराया कम होने और अन्य परिवहन साधनों की अपेक्षा अच्छी गति के कारण यह खूब लोकप्रिय हुई। लेकिन, जिन खूबियों के चलते लोग मेट्रो पसंद करते हैं अब दिल्ली मेट्रो उसके विपरीत जा रही है। एक तो किराया बढ़ा दिए जाने से यह महंगी हो गई है वही थोड़ी-थोड़ी दूर पर स्टेशन होने और कई बार भीड़ की वजह से एक मेट्रो में जगह नहीं मिल पाने पर दूसरी की प्रतीक्षा करने की मजबूरी और इस वजह से हो रही देरी ने मेट्रो को काफी नुकसान पहुंचाया है। लोग धीरे-धीरे पुनः कैब पर लौटने लगे हैं। हालत यह है कि रोज 3 लाख यात्री मेट्रो के कम हो गए हैं लेकिन 'महाराज' हैं कि किराया बढ़ाए ही जा रहे हैं। यदि किराया बढ़ ही गया है तो सुविधाएं भी बढ़नी नी चाहिए लेकिन उल्टे दिक्कतें ही बढ़ गई हैं...।
मेट्रो की व्यवस्था को देखकर कह सकते हैं कि केंद्र सरकार किस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह सोचने लगी है और यात्रियों की दिक्कतों से उसका कोई लेना-देना नहीं रह गया है। मेट्रो का किराया बढ़ाने के पीछे घाटे का तर्क दिया जा रहा है लेकिन जब केजरीवाल ने कहा कि किराया न बढ़ाओ और जो घाटा हो रहा है, आधा हम दे देंगे, आधा तुम दे देना... तो महाराज को रास नहीं आया। 'महाराज' के मुंह तो टैक्स और किराये का खून लग चुका है। किराया महंगा किए जाने के कारण यात्री घट गए लेकिन जिद है कि जो बच गए हैं उन्हीं से सारा पैसा वसूल करेंगे क्योंकि मेट्रो का कर्ज उतारना है। अरे भाई! आपकी इस सोच की वजह से आदमी जो कर्ज में जा रहा है, उसका क्या? आम आदमी टैक्स भी दे और आपके हर तरह के घाटे की भरपाई भी करे? माने सरकार चला रहे हैं कि दुकान खोलकर बैठ गए हैं? सिर्फ अपना घाटा, मुनाफा...? आदमी सिर्फ वोट दे, टैक्स भरे? और किसलिए भर रहे हैं आप टैक्स लेकर अपना खजाना? जब हर घाटा आदमी की जेब काटकर ही पूरी करनी है?... अच्छा उपाय ढूंढ लिया है। न कोई उद्योग लगाओ, न रोजगार सृजन करो, जब जरूरत हो पब्लिक सामने है टैक्स लगा दो- किराया बढ़ा दो...। अब मार ही डालो...। वैसे भी जिन्होंने आपको चुना है वे सजा के हकदार तो बनते ही हैं...! और गेहूँ के साथ घुन तो वैसे भी पिसता है...!
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