श्रीश्री की इस पहल का हम स्वागत करते हैं!
आश्चर्य नहीं हो रहा आपको? जिन्हें कश्मीर समस्या का भी हल बातचीत से सुलझ जाने वाला दिखता है; वे भी देश के अंदर के मुद्दे को बातचीत से सुलझाने के पक्षधर नहीं हैं? कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के एजेंट के रूप में बात ही नहीं, व्यवहार करने वाले नेता बन बैठे हैं और राम मंदिर के लिए पहल करने वाले सन्त को सरकार का एजेंट बताया जा रहा है? वह भी तब जबकि खुद सुप्रीम कोर्ट भी लगातार इस पक्ष में है कि यह मुद्दा बातचीत से सुलझ जाए...! अब इस पहल से जिसे दिक्कत हो रही हो, उसे हो... हम तो राम मंदिर के लिए बातचीत के सकारात्मक प्रयास के लिए श्री श्री के नाम में एक और श्री जोड़ देने के पक्षधर हैं...!
राम मंदिर मुद्दे पर श्री श्री के सामने आने के बाद सबके अंदर का कीड़ा यदि अचानक कुलबुलाने लगा है तो इसकी वजह है। सबको पता है यदि श्री श्री रविशंकर अपने प्रयास में सफल हुए तो तीन प्रमुख बातें होंगी...। ये तीन बातें ऐसी हैं जिनमें शामिल एक-एक बात को न होने देने के लिए कई-कई लोग परोक्ष-अपरोक्ष रूप से विरोध करेंगे; क्योंकि श्री श्री की पहल राम में श्रद्धा रखने वालों के लिए तो अच्छी बात है लेकिन सिर्फ मंदिर के समर्थन और विरोध की ही राजनीति कर राजनीतिक और धार्मिक नेताओं की देश में जो विशाल फौज खड़ी है, वह एक पल में मिट्टी में मिल जाएगी, सो इस फौज के लिए इससे बुरी बात हो नहीं सकती और इसलिए हिन्दू-मुस्लिम दोनों ही तरफ के नफरत के कीड़े मुंह के रास्ते शरीर की नली (नाली) नाली से बाहर जरूर निकलेंगे...।
आप बस ऐसे चेहरे देखिए; उन हंसकर बयान देने वाले चेहरों के पीछे 'कीड़े' का तनाव साफ नजर आएगा.. !
खैर, मेरी समझ से जो तीन प्रमुख बातें होंगी-
१. श्री श्री का प्रयास सफल रहा तो इसका राजनीतिक लाभ सीधे भाजपा को होगा इसलिए यहां तक दुष्प्रचारित किया जा रहा है कि श्री श्री, सरकार के एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं। यदि ऐसा है तब भी उन्हें इस मध्यस्थता के लिए बधाई ही दी जानी चाहिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने भी बार-बार इसी जरूरत पर बल दिया है; यही कहा है कि यदि यह मामला सभी पक्षों की सहमति से सुलझ जाए तो ज्यादा बेहतर है। लेकिन ऐसा हुआ तो फायदा किसे होगा और किसे नुकसान; यह सबको पता है इसलिए आप बस इस पहल का विरोध करने वालों के चेहरे देखते जाइए; अंदर के राजनीतिक कीड़े का अक्स खुद ही उभर आएगा...!
२. प्रयास सफल रहा तो राम मंदिर आंदोलन श्रृंखला में श्री श्री मुख्य नहीं तो प्रमुख सन्त अवश्य हो जाएंगे। तब वे आर्ट ऑफ लिविंग वालों के लिए ही नहीं, सम्पूर्ण देश के लिए परम् श्रद्धेय हो जाएंगे। अब इससे किसका नुकसान होगा... यह भी समझिए। इसलिए इस पहल का विरोध करने वाले सुंदर बनावटी हंसी लिए गेरुआधारी चेहरों पर भी गौर करें; उनके अंदर का द्वेष रूपी कीड़ा साफ नजर आएगा...।
३. तीसरे वे हैं; जिनके अंदर की कट्टरता कमजोर पड़ती नजर आने लगी है। राम मंदिर मुद्दा न होगा तो जब मन करे तब हिन्दू-हिन्दू, मुस्लिम-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद कर लेने का खेल कैसे होगा? कट्टर मुस्लिम बाबरी मस्जिद न बने, यह तो पचा जाएगा लेकिन राम मंदिर निर्माण पचाने से पहले उसका लिवर जवाब दे देगा। ऐसे कट्टरवादी हिन्दू, मुस्लिम; सत्ता, विपक्ष से लेकर आम आदमी के रूप में मौजूद हैं और सबसे अधिक संख्या इन्हीं की है। वैसे आप बस गौर फरमाइए, इन चेहरों से नफरत का कीड़ा खुद बोल उठेगा- मैं कट्टर हूं। फसाद चाहता हूं, समाधान नहीं...। कभी नहीं!
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