इस रेप की आजादी तो न दीजिए!

गाजियाबाद की बात है...। लड़की की इंजीनियर लड़के से शादी तय हो गई। जैसा कि अब गांवों तक में प्रचलन चल पड़ा है कि देखा-देखी की रश्म के बाद से ही लड़का-लड़की को बात करने की पूरी छूट दे दी जाती है; शहर का माहौल होने के कारण लड़का-लड़की को मिलने की भी छूट मिल गई। सगाई के बाद से ही इंजीनियर लड़की के घर आने-जाने लगा... दोनों घूमने-फिरने लगे। इसी बीच माहौल बदला। एक सप्ताह पहले, जब शादी के कुछ ही दिन शेष रह गए थे; लड़के वालों की तरफ से कार, हीरे की अंगूठी की मांग रख दी गई। पहले ही 18-20 लाख के सामान दे रहे लड़की के परिवार के लिए यह नई मांग पूरी कर पाना सम्भव नहीं था। लड़की को यह बात पता थी इसलिए उसने शादी से इनकार कर दिया लेकिन एक और बात थी जो सिर्फ लड़की को ही पता थी इसलिए उसने जान देने की कोशिश की...। लड़की का कहना था कि लड़ने ने उसके साथ कई बार घर आकर 'रेप' किया। यह निश्चित ही रेप नहीं था; सहमति से ही था लेकिन अब जब सहमति नहीं रही तो उसे रेप होना ही है। और रेप के बाद किसकी भावना आहत न होगी?

     वह भी जमाना था जब लड़का, शादी के दिन तक लड़की नहीं देख पाता था; हमने अच्छा किया यह दिन लेकर आए कि अब शादी के पहले दोनों एक-दूसरे को देख पाते हैं, बात कर पाते हैं, समझ पाते हैं लेकिन इसके बाद के दिन तो न ही दिखलाते तो अच्छा था! लड़के या लड़की को इससे आगे की आजादी किसलिए? ऐसा रिश्ता जो पैसे से ही तय होता है, उसमें कभी भी लेन-देन को लेकर कोई मनमुटाव हो सकता है; और भी कोई हालात हो सकते हैं जिससे शादी न हो पाए। तब? तब क्या होगा जबकि लड़के-लड़की में कुछ बचा ही न होगा? दोनों परिवार तो पैसे के नुकसान की भरपाई के साथ ही निश्चिन्त हो जाएंगे; थोड़ी प्रतिष्ठा की हानि भी हो सकती है लेकिन कभी उस बिटिया का सोचा है? जो बहुत आधुनिक होने के बाद भी हर बात माता-पिता से नहीं कह पाती। वह नहीं बता पाती कि जब लड़का मिलता है तो क्या कहता है, क्या करता है। वह कभी राजी हो जाती है, कभी मजबूर हो जाती है लड़के की हर इच्छा पूरी करने के लिए यह सोचकर कि कहीं वह नाराज न हो जाए या किसी वजह से यह शादी टूट न जाए, पापा की इज्जत न चली जाए। इस तरह वह शादी के पहले ही एक पत्नी बन जाती है और शादी न होने पर जैसे विधवा। वह क्या सोचती है, सिर्फ वही जान सकती है और यदि हम भी जानना चाहते हैं तो जान लें कि जिस घटना के बाद वह जान दे रही है, वह घटना उसके लिए कितनी भयावह है...!

     आधुनिकता में बहते महामानवों, जरा रुकिए! जरा दम लीजिए! यह बेतहाशा दौड़ सही नहीं है! इस तरह दौड़ेंगे तो जब थक जाएंगे तो सुस्ताने की लिए कहीं कोई छांव तक न बची होगी...दम घुट जाएगा...। दम घुटने से पहले जरा दम लीजिए...! दहेज की कुरीति तो आप-हम रोक नहीं पाए, यह कौन सी नई रीति लेकर आ गए? जिससे परिवार का सम्मान ही न जाए, लड़की की भावनाएं भी आहत हो जाए, उसकी आने वाली जिंदगी भी नरक हो जाए? जब सबकुछ देख-भालकर ही शादी तय हो रही है और शादी की एक तारीख तय है तो उस तारीख के पहले ही लड़के-लड़की को हम पति-पत्नी कैसे मान लेते हैं? वही आजादी कैसे दे देते हैं? दहेज देना बहुत हद तक मजबूरी भी है लेकिन इस तरह यह रेप तो रुक सकता था न? रुक सकता है न? अब भी कोशिश कीजिए कि ताकि आगे किसी बिटिया के साथ ऐसा न हो...।

     फिर बात उसी आजादी की है जिसकी दुहाई हर जगह दी जा रही है और फिर मेरा वही सवाल है कि आजादी ठीक है लेकिन कहाँ, कब, किसको, कितनी... ?
सोचिए...!

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