इस तरह लिखे वन्दे मातरम के तो हम भी विरोधी हैं...
किसी भी राष्ट्र में रहने वाला व्यक्ति उस राष्ट्र की सोच से परे नहीं रह सकता है और यदि उसकी सोच में राष्ट्र नहीं तो वह उस राष्ट्र का नागरिक भी कैसे हो सकता है? यदि वह अपने राष्ट्र, उसके नाम, उसके प्रतीकों पर गौरव नहीं कर पाता, अपने पूर्वजों के इतिहास, विरासतों को संरक्षित नहीं कर पाता तो आदमी तो है लेकिन जंगल में रहने वाला हो सकता है, राष्ट्र उसका निवास स्थल नहीं हो सकता...। हम अपनी बात करें तो अपने अंदर इतना राष्ट्रवाद रखते हैं, इतना 'वन्दे मातरम' के प्रति चाहत रखते हैं कि हर घर, संस्थान, दीवार पर वन्दे मातरम लिखा, हर जगह तिरंगा फहरता देखना चाहते हैं। हमें तो वन्दे मातरम इतना प्रिय है कि एक समय फेसबुक पर मेरा नाम 'वन्दे मातरम' ही हुआ करता था। 2014 में हिंदुस्तान अखबार गोरखपुर में जब हमने नौकरी शुरू की थी तब वहाँ सम्पादक थे श्री दिनेश पाठक। हमने अपने 'वन्दे मातरम' वाले फेसबुक आईडी से उन्हें फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजा। कई दिन तक एक्सेप्ट नहीं हुआ। हमने सोचा सम्पादक जी हैं, कर्मचारी का 'फ्रेंड रिक्वेस्ट' एक्सेप्ट भी क्यों करें भला? एक दिन शाम की मीटिंग में सबके सामने उन्होंने पूछा- "अच्छा... वो वन्दे मातरम तुम्हीं हो क्या?" हमने कहा- "जी सर"। संपादक जी बोले- "पहले अपने वास्तविक नाम-पहचान के साथ सामने आओ तब एक्सेप्ट करेंगे।" हमें भी यह वाक्य अच्छा लगा- 'अपने वास्तविक नाम-पहचान के साथ सामने आओ'। तबसे फेसबुक पर भी मेरा वही नाम है जो है। ... कहने का मतलब वन्दे मातरम हमें उतना ही प्रिय है, जितना मेरा खुद का नाम लेकिन तब भी वह मेरा नाम मिटाकर नहीं लिखा जा सकता। और इसलिए वन्दे मातरम, वन्दे भारतम के प्रेमी होने के बाद भी आज एक जगह लिखे 'वन्दे मातरम' के हम खिलाफ हैं और उस जगह का पता है- दयाल सिंह कॉलेज दिल्ली।
कोई भी राष्ट्र तभी है जब नागरिक हैं; और तभी राष्ट्रवाद भी है। नागरिक के कल्याण में ही किसी राष्ट्र का कल्याण है और नागरिक का कल्याण ही किसी राष्ट्र का धर्म है। नागरिक का अपने राष्ट्र के प्रति सम्मान, प्रेम, निष्ठा और त्याग की भावना ही राष्ट्रवाद है न कि किसी का नाम मिटाकर वन्दे मातरम लिख दिया जाना राष्ट्रवाद है। भारत राष्ट्र में स्वभाव से हर किसी को वन्दे मातरम कहना चाहिए। हर व्यक्ति को इस शब्द का सम्मान करना चाहिए। हर नागरिक के दिल में, जिह्वा पर वन्दे मातरम होना चाहिए न कि किसी नागरिक का नाम मिटाकर वन्दे मातरम लिखा जाना चाहिए। नागरिक है तभी राष्ट्रवाद है; नागरिक का अस्तित्व समाप्त कर कोई राष्ट्रवाद नहीं लिखा जा सकता; उसका नाम मिटाकर कोई वन्दे मातरम नहीं लिखा जा सकता। मातरम का वन्दे नागरिक ही करता है, उसका ही नाम मिटाया जाने लगे तो फिर वन्दे मातरम क्यों? कैसे? और कौन करेगा? मां दुर्गा के मंदिर पर 'श्री दुर्गा मंदिर, की जगह 'वन्दे मातरम' लिखना कितना सही होगा? हां, भारत माता का एक मंदिर और बन जाए तो यह तो बहुत ही अच्छी बात है! किसी हनुमान मंदिर से पताका हटाकर तिरंगा फहरा दिया जाए तो कैसा लगेगा? हां, उस मंदिर पर साथ में तिरंगा भी फहरे तो कितनी प्यारी बात होगी! एक पहचान मिटाकर, दूसरे को कायम करने की कोशिश; जबकि दोनों ही पहचान अपने हैं, दोनों ही नाम अपने हैं, दोनों ही प्रतीक अपने हैं, क्या उचित है? यदि इतना ही प्रेम है वन्दे मातरम से तो वन्दे मातरम के नाम पर एक नया कॉलेज खुलना चाहिए ताकि दिल्ली को एक और शैक्षणिक संस्थान मिल जाए, न कि दयाल सिंह कॉलेज को वंदेमातरम कॉलेज कर दिया जाए...।
राष्ट्र के किसी सत्यनिष्ठ नागरिक; जिसने राष्ट्र के शिक्षण संस्थान के लिए योगदान किया हो, उस नागरिक का, उस शिक्षण संस्थान से नाम मिटाकर, कोरा वन्दे मातरम लिखे जाने से कौन सा राष्ट्रवाद हो जाएगा? मेरी समझ में उस संस्थान पर दयाल सिंह के नाम में जो राष्ट्रवाद है, वहां वह भाव उस वन्दे मातरम में नहीं है जो उनका नाम मिटाकर लिख दिया गया है और भावविहीन 'वन्दे मातरम' दो शब्द मात्र हैं जिनका कोई मोल नहीं।
आप अपने आस-पास देख लीजिए। आज भी तमाम विद्यालय मिलेंगे जो भूमिहीन हैं। क्यों? देश को आजाद हुए इतने साल हो गए, हर विद्यालय को आज तक अपनी जमीन क्यों नहीं मिल पाई? वह इसलिए कि विलासी सत्ता अपने लिए हर शहर में सर्किट हाउस, गेस्ट हाउस का निर्माण तो कर लेती है लेकिन जब विद्यालय के निर्माण की बात आती है तो जमीन के लिए दानदाता ढूंढती है। तमाम शैक्षणिक संस्थान आम आदमी की जमीन पर ही बने हैं; आम आदमी ने ही बनाए हैं। सरकारों ने सिर्फ उसका सरकारीकरण किया है। जिसने भी जमीनें दान की, रुपए दिए, श्रम दान किया, चंदे एकत्र किए, उस व्यक्ति के नाम पर उस संस्थान का नाम रखा गया। अब भी सरकार यह लालच देती है कि आप जमीन दीजिए, आपके अनुसार संस्थान का नामकरण कर दिया जाएगा लेकिन तब भी विरले ही सामने आते हैं। कितने ही संस्थानों के लिए अब भी दाताओं की प्रतीक्षा है लेकिन इस तरह कोई कैसे दान दे? आज हम दान दें कि मेरे दादा के नाम पर कॉलेज का नामकरण कर दीजिए और जब दादा न हों, हम न हों, तब कोई सरकार उसका नाम 'वन्दे मातरम' कर दे? जिन भी संस्थानों पर किसी व्यक्ति का नाम लिखा है वह सिर्फ किसी व्यक्ति का ही नाम नहीं है, वह नाम है- दान, समर्पण, विरासत, विश्वास, त्याग का; वह नाम ही उस संस्थान का इतिहास है और उस नाम का मिटाया जाना इतिहास का मिटाया जाना है। उस नाम का मिटाया जाना पूर्वजों के योगदान को भुलाया जाना है...। इसे मिटाकर कोई भी और नाम नहीं लिखा जा सकता। किसी को भी ऐसा करने का अधिकार नहीं है। यदि देश समाज के लिए किसी का कोई योगदान है और उसके सम्मानस्वरूप उसका नाम कहीं अंकित है तो उस नाम को मिटाया जाना उस सम्मान का छीना जाना है, अपमानित किया जाना है। यह अपने ही नागरिकों के साथ एक धोखा है, न कि राष्ट्रवाद...।
कॉलेज प्रबंध समिति के चेयरमैन अमिताभ सिन्हा इस समय स्वयं को महान राष्ट्रवादी घोषित करने में लगे हैं। वह इतने 'चतुर' हैं कि कॉलेज का नाम बदले जाने के स्वाभाविक विरोध को वन्दे मातरम का विरोध बताने लगे हैं। इस बहाने वह सिखों को राष्ट्रभक्ति भी सिखाने लगे हैं। दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी महासचिव व भाजपा विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा ने स्पष्ट किया है कि वे या कोई सिख, वन्दे मातरम के खिलाफ नहीं है बल्कि दयाल सिंह मजीठिया का इतिहास मिटाए जाने के खिलाफ है। मनजिंदर सिंह ने सही कहा है। इस विरोध को वन्दे मातरम के विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और यदि देखा जा रहा है तो एक विरोधी हमें भी समझ लीजिए...!
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