आदमी की भूख पहचानती हैं पक्षियां

शायद,
आदमी की 'भूख' को,
जानती-पहचानती हैं ये पक्षियां भी;
नहीं भाती इन्हें दूरियां,
लेकिन,
इन्हें डराती हैं हमारी नजदीकियां भी...
शायद,
सोचती हैं पक्षियां,
हाथ में लेकर,
कब प्यार करे,
कब गर्दन मरोड़ दे;
आदमी होते हैं जालिम,
क्या पता?
उन्हें मारें कि जिंदा छोड़ दें...!
चहक रही थीं,
खूब चहचहा रही थीं;
हमें मुस्कुराता देख,
पक्षियां भी मुस्कुरा रही थीं...
लेकिन,
जब भी कोशिश की,
इन्हें छू लेने की;
अपने पंख फैलाकर,
फुर्र हो जा रही थीं...

(जंतर मंतर के पास से मेरी खींची तस्वीर।)

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