बड़ी मासूम हो तुम... यह न जानो तो ही अच्छा!

बड़ी मासूम हो तुम,
समझ नहीं पाती,
पुरुष, पहले पुरुष है,
फिर विद्वान, साहित्यकार
अथवा पत्रकार...
रहने दो,
यह न जानो,
तुम न जानो तो ही अच्छा...!

जब भी बनती हो,
किसी पृष्ठ का आवरण;
किस-किस, कितने स्तर पर
उतरता है तुम्हारा आवरण...
रहने दो,
यह न जानो
तुम न जानो तो ही अच्छा...!

बड़ी मासूम हो तुम,
खुश हो उठती हो
जब बन जाती हो
खबर या साहित्य का विषय;
क्यों नहीं समझती
तुम हमेशा ही हो,
भोग-विलास का विषय...
रहने दो,
यह न जानो,
तुम न जानो तो ही अच्छा...!

तुम खुद सोच लेती हो,
यह आदमी अच्छा है,
यह जगह अच्छी है,
अरे पगली,
साहित्य हो या अखबार
तुम छली जाती हो हर बार...
रहने दो,
यह न जानो,
तुम न जानो तो ही अच्छा...!

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