थोड़ा गुस्से में, थोड़ा कड़वा, मगर दिल से...

... माना कि पद्मावती फ़िल्म कोई साजिश है; यह भी मानने में हमें गुरेज नहीं कि चुनाव को लेकर मुद्दों से भटकाने की कोई कोशिश हो सकती है लेकिन अब इन सबको सही ठहराने के लिए यह कह दो कि पद्मावती चरित्र ही काल्पनिक है तो भाई हम भी आज जान गए कि क्यों कुछ विद्वानों के बाद भी भारत कभी विश्वगुरु था और क्यों आज विद्वानों की बाढ़ है; तब भी भारत के बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए विदेश जाना पड़ता है...।

    जो सच है, उसे मानने से कभी दिक्कत नहीं लेकिन झूठ परोसकर अपनी बात सही साबित करने की कोशिश करोगे तो वह बात सच साबित हो, न हो; तुम झूठे साबित अवश्य हो जाओगे। जिस जायसी का नाम लेकर चिल्ला रहे हो, वह जायसी जरूर खिलजी के बाद आए लेकिन यह मत कहो कि जायसी के साथ ही पद्मावती का चरित्र भी आया। जायसी ने जिस पद्मावती का जिक्र किया है वह बहुत हद तक उनकी रचना का काल्पनिक चरित्र था लेकिन जिस पद्मावती के साथ हम आज खड़े हैं, वह पूर्णरूपेण एक ऐतिहासिक चरित्र है। जायसी की पद्मावती को तो खिलजी ने देख भी लिया; भंसाली की पद्मावती को तो छू भी लिया लेकिन जिस इतिहास की बात हो रही है उस पद्मावती तक खिलजी का बाप भी नहीं पहुंचा था। जब खिलजी ने चित्तौड़गढ़ के दुर्ग में प्रवेश किया था तब वहां उसे पुरुषों की लाशें मिली थीं, महारानी पद्मावती के नेतृत्व में महिलाएं जौहर हो चुकी थीं...।
    
     अपनी जमीन, अपनी प्रतिष्ठा के लिए जीवन आहूत कर देने वाले किसी भी चरित्र की प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करोगे तो इतिहास तो माफ नहीं ही करेगा, वर्तमान भी धिक्कारेगा तुम्हें। किसी के भी चरित्र से खेलने का तुम्हें कोई हक नहीं, चाहे वह जीवित पात्र हो, या ऐतिहासिक। दीपिका पादुकोण और पद्मावती में कोई तुलना नहीं; फिर भी झांक कर देखो अपने अंदर...। दीपिका की नाक काटने की बात कहने भर से ही तुमने सभी राजपूतों को छिछोरा करार दे दिया तो उस राजपूत के पूजनीय चरित्र की नाक काटने वाले के लिए उसके छिछोरे बोल कैसे होने चाहिए? नाक तो सबकी है ना? पादुकोण की ही दिखती है? पद्मावती की नहीं...? इतनी विद्वता कहां से लाते हो कि जो देखना चाहो, वही तक पाते हो...?

   अपना भी चरित्र तय न कर पाने वालों, तुम्हारे लिए पद्मावती का चरित्र सच में काल्पनिक ही है क्योंकि तुम जो चरित्र जी रहे हो, वहां से ऐसे चरित्र काल्पनिक ही लगेंगे। अरे तुम तो अपनी कल्पना में भी वह चरित्र न जी पाओ, तो तुम क्या तय करोगे पद्मावती का चरित्र? तुम अपनी सांस जीते हो, उसी के साथ खत्म हो जाओगे, पद्मावती जैसे चरित्र एक की धड़कन से दूसरे की धड़कन तक पहुंचते हैं और तब तक धड़केंगे जब तक किसी एक की भी धड़कन बची रहेगी...। और जब तक बचे हैं हम, बची है हमारी धड़कन; अक्षुण्ण रहेगा इतिहास हमारा...। ...और हां, जब कभी किसी अन्याय, गलत का विरोध हो तो यह तर्क न दिया करो कि यह हुआ, तब कहां थे, वह हुआ तब कहां थे? जब जागा तभी सवेरा... और क्रांति रोज-रोज नहीं होती...। यदि आज कोई अपने इतिहास के साथ खड़ा है, अपने ऐतिहासिक चरित्र के साथ खड़ा है तो हम भी खड़े हैं उसके साथ इस वर्तमान में ताकि भविष्य में भी बचा रहे इतिहास हमारा...।

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