मजा किरकिरा हो जाता... 'इश्क' जब सिरफिरा हो जाता...
लिव इन...
माने
देह से देह का 'इश्क'
प्रेम बिन...
पश्चिम की सोच से
आजादी...
पूरब की सोच में
बर्बादी...
मां-बाप, समाज
सबसे बेपरवाह...
झुलसकर देह की आग में,
कर लेते खुद ही को खाक...
लगाते दांव पर खुद को
मेल हो या फीमेल...
होता भावनाओं से खेल
लगती रिश्तों की 'सेल'...
शादी हो गई,
'इश्क' हो जाता 'सेफ'...
शादी से मुकरना कहलाता,
'सालों तक रेप'...
बदलते जब 'पार्टनर'
होता और घिनौना खेल...
कोई बनता हत्यारा,
कोई जाता जेल...
यह सहमति, यह मजा
सब किरकिरा हो जाता...
यह लिव इन 'इश्क'
जब सिरफिरा हो जाता...
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