सबने गलती की, यह नहीं होना चाहिए था...


डीडीयू गोरखपुर में कल जो कुछ भी हुआ, वह नहीं होना चाहिए था। छात्रों को पुलिस ने यूं दौड़ा—दौड़ाकर पीटा, जैसे वे कोई आतंकी हों। एक—एक छात्र को घेरकर कई—कई पुलिस वालों ने पीटा। आप तस्वीरों में देख सकते हैं कि किस तरह एक—एक छात्र पर कई—कई लाठियां गिर रही हैं। इन छ़ात्रों ने न किसी की हत्या की थी, न कोई जुर्म किया था, बस अपना हक मांगा था। छात्र संघ चुनाव की मांग ही तो की थी...।

हां, यह गलत है कि छात्रों ने एडी बिल्डिंग में ताला लगा दिया जहां कर्मचारियों के साथ छात्र—छात्राएं भी फंस गए। सुना है कर्मचारियों को गालियां भी दीं। जिन छात्रों की लड़ाई छात्र नेता करते हैं, उनके साथ ही ज्यादती कर दी कि उन्हें बिल्डिंग में बंद कर दिया। बिल्डिंग की बिजली सप्लाई रोक दी। यह सब नहीं करना चाहिए था। विरोध का इस तरह का तरीका सही नहीं है। डिप्टी सीएम से निराश होने के बाद छात्र नेता सीएम से मिल सकते थे, यह अच्छी बात थी कि सीएम भी शहर में थे। एक प्रतिनिधिमंडल जाकर अपनी बात रख सकता था लेकिन छात्रों ने आपा खो दिया। इसी के साथ छात्र नेताओं को सीएम फ्लीट पर पथराव नहीं करना चाहिए था। यह उनकी बड़ी गलती थी। यदि फ्लीट में सीएम होते तो आप सोचिए कि क्या होता? तब पुलिस के डंडे नहीं, कमांडो की गोलियां भी चल सकती थीं इसलिए दोषी छात्र नेता भी कम नहीं हैं।

बेशक गलतियां हुईं छात्रों से लेकिन तब भी जिस बेरहमी से उन्हें पीटा ​गया, वह उनके अपराध से कई गुना ज्यादा था। पुलिस ने अपने धैर्य को ताख पर रख दिया और हालात को लाठी से नियंत्रित करने की कोशिश की। यदि मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारी से बात नहीं बन पा रही थी तो उन्हें बड़े अधिकारी को बुलाना चाहिए था। ​प्रशासनिक अधिकारियों को सूचना देनी चाहिए थी। लेकिन, आनन—फानन में सबकुछ निपटाने की कोशिश में पुलिस ने ज्यादती की इंतहा कर डाली। तस्वीर देख सकते हैं आप। किस कदर लाठियां भांजी गईं। पुलिस हॉस्टल में घुस गई, उसे इससे भी बचना चाहिए था क्योंकि हॉस्टल में सिर्फ वही नहीं थे, जिन्होंने पथराव किया। कई निर्दोष भी फंस गए। पुलिस कह सकती है कि हालात बेकाबू थे इसलिए उसे बल प्रयोग करना पड़ा लेकिन हालात बेकाबू हुए इसलिए क्योंकि पुलिस उसे संभाल नहीं पाई।

छात्रों ने अपना हक मांगा, उग्र हो गए। नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने बल प्रयोग किया लेकिन यह सारे हालात बनाने वाला विश्वविद्यालय प्रशासन है। सबसे बड़ी गलती विश्वविद्यालय प्रशासन ने की। विश्वविद्यालय प्रशासन, चुनाव अधिकारी की बचकाना हरकत ही कही जाएगी कि छात्र संघ चुनाव की तिथि घोषित किए जाने से पहले ही सारी सूचनाएं बाहर आ गई थीं। यहां तक कि प्रेस रिलीज तक जारी कर दिए गए। गोपनीयता नहीं बरती गई। विश्वविद्यालय स्वायत्त संस्था है, उसे अपने कैम्पस का चुनाव कराने का अधिकार है लेकिन विवि प्रशासन सरकार को खुश करने की कोशिश में लग गया। डिप्टी सीएम से चुनाव तिथि घोषित करवाने की कोशिश की और उन्होंने इसे टाल दिया।

वीसी साहब, चुनाव अधिकारी साहब, सरकार आपके द्वारा तय की गई तिथि घोषित भी क्यों करे? जब भी कोई फैसला उसके हाथ में जाएगा तो वह उसके राजनीतिक लाभ—हानि सोचेगी ही। छात्रों के हित की बात सोचना आपकी जिम्मेदारी थी। सबकुछ नियंत्रित था, चुनाव का माहौल बन गया था और बड़ी आसानी से चुनाव तिथि की घोषणा हो जाती लेकिन आपकी लापरवाही ने कैम्पस के अंदर की राजनीति में सत्ता को राजनी​ति करने का मौका दे दिया।

सबसे बड़ी लापरवाही कि जब डिप्टी सीएम से चुनाव की घोषणा करानी थी तो उनसे बात क्यों नहीं की गई थी? वे किसी कार्यक्रम में आए और अचानक उन्हें एक पर्चा थमा दिया कि सर, लगे हाथ छात्रसंघ चुनाव की घोषणा भी आप ही कर दें? मजाक है क्या? यदि डिप्टी सीएम से इतना ही अनुराग था तो उन्हें पहले ही इस बाबत भरोसे में क्यों नहीं लिया? आपने खुद ही कैसे सोच लिया कि चुनाव की यही तिथि डिप्टी सीएम को भी पसंद आ जाएगी? आप कहेंगे और वह घोषणा कर देंगे? इतना विश्वास कहां से लाते हैं? चमचई की भी हद होती है...।
चुनाव अधिकारी साहब, आप सबकी गलतियों का खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ा और पुलिस विलेन बन गई। कई छात्रों हॉस्पिटल में हैं, कई पर एफआईआर है। जिनको लाठियां लगी हैं, वे कई दिन विश्वविद्यालय नहीं जा सकते। जिन पर एफआईआर दर्ज है वे चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। और, किन पर एफआईआर है, इसकी सूची भी दिलचस्प है। आप सबकी नादानी ने कैम्पस की तो राजनीति ही खत्म कर दी। अब कैम्पस में राजनीति तो होगी लेकिन उसका नियंत्रण बाहर किसी के हाथ में होगा। पूरा मौका है। जिन्हें भी चुनाव नहीं लड़ने देना हो, जांच में उसका नाम एफआईआर में जुड़ जाएगा। आप क्या कर पाएंगे? आपने जो गलती की है, उसकी भरपाई आप कैसे कर पाएंगे?

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